भारत-चीन रिश्तों पर बदलती रणनीति, विश्व राजनीति में भारत की भूमिका और चीन की महत्वाकांक्षाओं का विश्लेषण।
प्रस्तावना: भारत-चीन संबंधों की जटिलता
भारत और चीन दो एशियाई दिग्गज आज वैश्विक राजनीति की धुरी बन चुके हैं। एक तरफ दोनों देशों का इतिहास सीमा विवादों और अविश्वास से भरा है, वहीं दूसरी तरफ व्यापार और वैश्विक मंचों पर सहयोग की संभावनाएँ भी दिखाई देती हैं। हाल के वर्षों में चीन के भारत के प्रति बयानों, नीतियों और कदमों ने विश्लेषकों को उलझन में डाल दिया है। कुछ लोग इसे साझेदारी का अवसर मानते हैं, तो कुछ इसे एक रणनीतिक जाल बताते हैं।
चीन का बदलता रुख और भारत पर असर
“हाथी और ड्रैगन साथ-साथ चलें” का संदेश
राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कई बार यह कहा है कि भारत (हाथी) और चीन (ड्रैगन) को साथ-साथ चलना चाहिए। इस बयान को कुछ विश्लेषक सकारात्मक संकेत मानते हैं। उनका तर्क है कि अमेरिकी दबदबे से मुक्ति पाने के लिए भारत के पास चीन से सहयोग करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है।
लेकिन क्या यह वास्तव में सहयोग का प्रस्ताव है या फिर एक बड़ी चाल?
चीन का असली मकसद
कई विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन का असली उद्देश्य भारत की अर्थव्यवस्था को मज़बूत करना नहीं है, बल्कि उसे अमेरिका से दूर करना है। चीन की रणनीति है कि वह एशिया में अमेरिका को अकेला कर दे और भारत को एक “एंटी-अमेरिका ब्लॉक” की तरफ खींच ले।
भारत-चीन व्यापारिक संबंध: अवसर या चुनौती?
भारत के लिए सीमित विकल्प
भारत का चीन को निर्यात मुख्यतः कच्चे माल तक सीमित है। वहीं चीन स्वयं बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग करता है। इसलिए चीन के साथ व्यापारिक संतुलन भारत के पक्ष में नहीं है।
• भारत चीन पर निर्भर है: रेयर अर्थ मिनरल्स, भारी मशीनरी और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में।
• चीन भारत पर निर्भर नहीं है: क्योंकि उसके पास पहले से ही घरेलू उत्पादन की क्षमता है।
अमेरिका-चीन टकराव का भारत पर प्रभाव
अमेरिका द्वारा चीनी सामान पर टैरिफ लगाए जाने से चीन नए बाजार तलाश रहा है। भारत इसमें एक संभावित विकल्प है, लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत वास्तव में चीन के लिए उस “बड़े बाजार” की भूमिका निभा सकता है?
भू-राजनीतिक समीकरण और रणनीतिक कमजोरियाँ
चीन की दो बड़ी कमजोर नसें
1. सिंजियांग क्षेत्र – मुस्लिम बहुल यह इलाका चीन के लिए हमेशा संवेदनशील रहा है। चीन को डर है कि संघर्ष की स्थिति में अमेरिका पाकिस्तान और तालिबान के सहयोग से यहाँ अस्थिरता फैला सकता है।
2. मलक्का जलडमरूमध्य – चीन की 70% तेल आपूर्ति इसी मार्ग से गुजरती है। भारत का अंडमान स्थित नौसैनिक अड्डा इस मार्ग को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
यही कारण है कि चीन भारत को अपने पक्ष में करने की कोशिशों में लगा है।
पाकिस्तान और ताइवान का खेल
• पाकिस्तान में अमेरिकी न्यूक्लियर अड्डों की संदिग्ध मौजूदगी और सैन्य गतिविधियाँ चीन को बेचैन करती हैं।
• ताइवान का मुद्दा चीन की सबसे बड़ी प्राथमिकता है। बीजिंग किसी भी हाल में ताइवान को अपने में मिलाना चाहता है और इसके लिए वह विश्व मंच पर हर रणनीतिक चाल चल रहा है।
रूस, अमेरिका और भारत की भूमिका
पुतिन और मोदी की रणनीतिक समझ
भारत और रूस के रिश्ते पुराने हैं, लेकिन आज दोनों के सामने चीन की बढ़ती ताकत एक साझा चुनौती बन गई है।
• रूस की स्थिति: यूक्रेन युद्ध के बाद आर्थिक रूप से कमजोर, और चीन पर निर्भर।
• भारत की स्थिति: चीन से सीमा विवाद और व्यापारिक असंतुलन, लेकिन वैश्विक मंचों पर बढ़ती भूमिका।
इसीलिए पुतिन और मोदी की मुलाकातें सिर्फ औपचारिक नहीं बल्कि गहरे रणनीतिक संदेश देती हैं।
अमेरिका और भारत: साझेदारी या दूरी?
अमेरिका भारत के लिए एक अहम साझेदार रहा है… चाहे वह रक्षा तकनीक हो या वैश्विक मंच पर समर्थन। लेकिन चीन चाहता है कि भारत और अमेरिका के रिश्ते कमजोर हों ताकि एशिया में उसकी रणनीतिक पकड़ मज़बूत हो सके।
चीन की विस्तारवादी महत्वाकांक्षाएँ
दक्षिण चीन सागर से पामीर तक
• दक्षिण चीन सागर: चीन वियतनाम, फिलीपींस और अन्य एशियाई देशों पर दबाव डालकर इस क्षेत्र को नियंत्रित करना चाहता है।
• पामीर क्षेत्र: ताजिकिस्तान के 35% हिस्से पर चीन की नजर है। इसका 10% भाग चीन पहले ही हड़प चुका है, और यह सब रूस की मजबूरी के कारण हुआ।
• ब्लादीवोस्तोक: रूस का एक महत्वपूर्ण बंदरगाह शहर, जिस पर चीन ने दावा ठोका हुआ है।
इन उदाहरणों से साफ है कि चीन सिर्फ पड़ोसी देशों से दोस्ती नहीं करना चाहता, बल्कि धीरे-धीरे उनका भूभाग और संसाधन हड़पने की रणनीति पर काम कर रहा है।
भारत के लिए आगे का रास्ता
मोदी सरकार की विदेश नीति
मोदी सरकार की विदेश नीति को अक्सर “मल्टी-एलायंस” रणनीति कहा जाता है।
• अमेरिका, रूस और जापान के साथ रिश्ते मज़बूत करना।
• चीन के साथ टकराव के बावजूद संवाद बनाए रखना।
• एशिया, अफ्रीका और मध्य एशिया में अपनी उपस्थिति बढ़ाना।
क्यों भारत आज अपरिहार्य है?
आज की वैश्विक राजनीति में भारत की अहमियत कई कारणों से बढ़ गई है:
1. रणनीतिक भूगोल – हिंद महासागर और मलक्का जलडमरूमध्य पर भारत का प्रभाव।
2. बड़ा बाजार – 1.4 अरब की आबादी के साथ विशाल उपभोक्ता शक्ति।
3. संतुलनकारी भूमिका – अमेरिका, रूस और चीन सभी भारत को अपने पक्ष में करना चाहते हैं।
निष्कर्ष: भारत की कूटनीति की जीत
चीन चाहे जितनी कोशिश कर ले, अमेरिका और चीन में वास्तविक दोस्ती संभव नहीं है। रूस की अपनी मजबूरियाँ हैं और अमेरिका भी भारत के बिना अपनी एशियाई रणनीति को सफल नहीं बना सकता।
इस बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की स्थिति मजबूत होती जा रही है। यह स्थिति किसी एक घटना या बयान का परिणाम नहीं, बल्कि पिछले कुछ वर्षों में अर्थनीति, विदेश नीति और रक्षा नीति के संतुलित संयोजन का परिणाम है।
भारत अब सिर्फ एक “रीजनल पॉवर” नहीं बल्कि एक वैश्विक शक्ति के रूप में उभर रहा है। यही कारण है कि विश्व राजनीति में हर बड़ी शक्ति को भारत की जरूरत है।
