भारत-यूरोप साझेदारी: उर्सुला की मोदी से बातचीत और ट्रम्प की मुश्किलें

भारत-यूरोप रिश्ते मज़बूत, उर्सुला ने मोदी से बातचीत में यूक्रेन युद्ध समाधान पर भरोसा जताया, जबकि ट्रम्प की टैरिफ़ रणनीति असफल साबित हो रही है।

प्रस्तावना: भारत की वैश्विक भूमिका पर नई रोशनी

आज अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत की भूमिका पहले से कहीं अधिक निर्णायक हो गई है। यूरोपियन यूनियन (EU) की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से संवाद इस बात का संकेत है कि विश्व की बड़ी ताक़तें अब भारत को केवल उभरती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि शांति और स्थिरता का वाहक मानने लगी हैं। उर्सुला ने खुलकर स्वीकार किया कि यूक्रेन-रूस युद्ध को समाप्त कराने में भारत की कूटनीति सबसे प्रभावी साबित हो सकती है। साथ ही उन्होंने भारत-EU फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) को लेकर आश्वासन दिया कि जल्द ही ठोस प्रगति होगी।

लेकिन यही वह समय है जब अमेरिकी राजनीति में डोनाल्ड ट्रम्प की रणनीतियाँ लगातार सवालों में घिरती जा रही हैं।

भारत-यूरोप साझेदारी: भरोसे और अवसर का संकेत

उर्सुला की मोदी से बातचीत

उर्सुला वॉन डेर ने साफ कहा कि भारत की कोशिशें सराहनीय हैं क्योंकि केवल भारत ही है जो यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लादिमीर ज़ेलेंस्की और रूस दोनों से संवाद की स्थिति बनाए हुए है। अमेरिका और यूरोप ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को “युद्ध अपराधी” घोषित किया है, जिससे सीधी बातचीत असंभव हो गई है। ऐसे में भारत की भूमिका एकमात्र विकल्प के रूप में सामने आती है।

फ्री ट्रेड एग्रीमेंट की संभावना

भारत और EU के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) वर्षों से अटका हुआ है। लेकिन उर्सुला का यह बयान संकेत देता है कि बदलते भू-राजनीतिक हालात में यूरोप अब भारत के साथ आर्थिक साझेदारी को मज़बूत करना चाहता है। इससे भारत को न केवल निवेश और निर्यात का अवसर मिलेगा, बल्कि यूरोप को भी एक भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार।

ट्रम्प की रणनीति क्यों असफल हुई?

टैरिफ़ युद्ध और घटता समर्थन

डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत पर कठोर टैरिफ़ लगाने की सलाह EU को दी थी। उनका मकसद था कि भारत पर आर्थिक दबाव बढ़ाकर उसे अमेरिका की ओर झुकाया जाए। शुरुआती दिनों में अमेरिकी जनता का 70% समर्थन ट्रम्प की टैरिफ़ नीति के साथ था, लेकिन जैसे ही उन्होंने अपने मित्र देशों पर भी यही दबाव डालना शुरू किया, समर्थन 52% तक गिर गया।

यानी अमेरिकी जनता ने समझ लिया कि यह रणनीति उनके हितों के खिलाफ है। SCO की बैठक के बाद चीन समर्थक मीडिया के हमलों ने ट्रम्प की स्थिति और कमजोर कर दी।

भारत की संप्रभुता पर गलत दांव

ट्रम्प और उनके सलाहकारों ने भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना को समझने में बड़ी भूल की। जब उनके सलाहकार पीटर नोवरो ने भारतीय समाज को ब्राह्मण विरोधी बयानबाज़ी से भड़काने की कोशिश की, तो उल्टा असर हुआ। भारत ने इसे गंभीरता से लेने के बजाय मज़ाक बना दिया।

भारत का संदेश साफ है: “हम भूखे रह सकते हैं, लेकिन संप्रभुता पर समझौता नहीं करेंगे।”

यूक्रेन संकट और भारत की निर्णायक भूमिका

ट्रम्प की गुप्त योजना और विफलता

‘द गार्डियन’ की रिपोर्ट ने बड़ा खुलासा किया कि ट्रम्प और उनके साथी जे.डी. वांस ने यूक्रेन के पूर्व सेनापति ज़ालुज़्नी को सत्ता पलटने के लिए उकसाया था। बदले में CIA के समर्थन से राष्ट्रपति पद का वादा किया गया था। लेकिन ज़ालुज़्नी ने इस साजिश का भंडाफोड़ कर दिया। इस घटना से ज़ेलेंस्की का भरोसा अमेरिका पर डगमगाया।

ज़ेलेंस्की की मजबूरी और भारत की अहमियत

ज़ेलेंस्की के पास विकल्प सीमित हैं:

• चीन और उत्तर कोरिया रूस के करीबी हैं।

• अमेरिका और यूरोप पुतिन से बात करने को तैयार नहीं।

• ट्रम्प पर भरोसा करना अब मुश्किल।

ऐसे में केवल भारत ही है जो तटस्थ रहते हुए रूस और यूक्रेन दोनों से संवाद कर सकता है। यही कारण है कि उर्सुला वॉन डेर ने भारत की सराहना की और ज़ेलेंस्की भी अब भारत की ओर उम्मीद से देख रहे हैं।

शतरंज की बिसात: भारत की चाल और ट्रम्प की गलतियाँ

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम में ट्रम्प ने दो बड़ी ग़लतियाँ कीं:

1. टैरिफ़ नीति के ज़रिये भारत को दबाने की कोशिश।

2. यूक्रेन संकट में गुप्त साजिश के ज़रिये नेतृत्व को अस्थिर करना।

इन दोनों गलतियों का फायदा भारत को मिला है। भारत ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और आत्मविश्वास से साबित किया है कि वह विश्व राजनीति में केवल दर्शक नहीं, बल्कि एक निर्णायक खिलाड़ी है।

निष्कर्ष: भारत का आत्मविश्वास और वैश्विक मान्यता

आज की दुनिया बहुध्रुवीय (Multipolar) हो रही है और भारत इस बदलाव का नेतृत्व करने की क्षमता दिखा रहा है। उर्सुला वॉन डेर का मोदी से संवाद केवल एक कूटनीतिक घटना नहीं, बल्कि इस बात का प्रतीक है कि विश्व भारत की मध्यस्थता और साझेदारी को मान्यता दे रहा है।

ट्रम्प की रणनीतियों ने अमेरिका को असहज स्थिति में ला खड़ा किया है, जबकि भारत अपने आत्मविश्वास और संतुलित कूटनीति से लाभ उठा रहा है। यदि हालात ऐसे ही रहे तो आने वाले वर्षों में भारत की भूमिका केवल एशिया तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वैश्विक राजनीति की दिशा तय करेगी।

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