भारत-फ्रांस वार्ता: रूस-यूक्रेन युद्ध में मोदी की अहम कूटनीतिक भूमिका

भारत-फ्रांस वार्ता में रूस-यूक्रेन युद्ध पर चर्चा। मोदी की कूटनीति से वैश्विक संतुलन, यूरोप और रूस के बीच भारत की बढ़ती भूमिका।

प्रस्तावना: भारत के हाथों में वैश्विक संतुलन की डोर

रूस-यूक्रेन युद्ध ने पूरी दुनिया की राजनीति को हिला कर रख दिया है। यूरोप थका हुआ है, अमेरिका नैतिक धरातल खो रहा है और रूस अपने ऐतिहासिक युद्ध-संकल्प पर डटा हुआ है। ऐसे समय में भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका केंद्र में आ गई है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रो ने प्रधानमंत्री मोदी से हालिया बातचीत में यही संकेत दिया कि वैश्विक राजनीति में भारत अब केवल “एक साझेदार” नहीं बल्कि “स्ट्रेटजिक की-प्लेयर” बन चुका है।

फ्रांस-भारत वार्ता: नए समीकरणों की झलक

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रो ने मोदी से लंबी बातचीत की और रूस-यूक्रेन युद्ध पर अपने प्रयासों की जानकारी साझा की। उन्होंने साफ कहा कि “भारत हमारा स्ट्रेटजिक पार्टनर है।”

• पिछले 20 दिनों में यह दूसरा अवसर है जब फ्रांस और भारत के बीच इस स्तर पर संवाद हुआ।

• मैक्रो का संदेश केवल भारत-फ्रांस साझेदारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बताता है कि यूरोप भारत की कूटनीति पर भरोसा कर रहा है।

रूस-यूक्रेन युद्ध: अमेरिका की रणनीति और विफलता

रूस-यूक्रेन युद्ध का मूल कारण अमेरिका और नाटो की आक्रामक नीतियां रही हैं।

• नाटो का विस्तार: नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन (NATO) एशिया तक पहुँच गया, जिसका मकसद रूस को घेरना था।

• रूस की प्रतिक्रिया: इतिहास गवाह है कि रूस लंबे युद्ध झेलने का आदी रहा है। उसने अमेरिकी नीयत पहचानकर सीधा मुकाबला करने का निर्णय लिया।

• अमेरिका की थकान: यूरोपियन यूनियन और अमेरिका ने रूस को किनारे लगाने की कोशिश की, लेकिन अब यह युद्ध उन्हें आर्थिक और राजनीतिक रूप से थका चुका है।

ट्रम्प की भूमिका और ज़ेलेंस्की का अविश्वास

यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की का अमेरिका पर भरोसा टूट चुका है।

• खबरों के अनुसार, ट्रम्प ने युद्ध के दौरान रूस के साथ मिलकर यूक्रेन की ज़मीन बाँटने की साज़िश की थी।

• इस रहस्योद्घाटन के बाद ज़ेलेंस्की ट्रम्प और अमेरिका पर विश्वास खो बैठे।

• ऐसे में अमेरिकी मध्यस्थता निष्प्रभावी हो गई और यूरोप की निगाहें भारत पर टिक गईं।

क्यों है भारत पर यूरोप का भरोसा?

पश्चिमी यूरोप और ज़ेलेंस्की दोनों मानते हैं कि यदि कोई नेता पुतिन के सामने उनकी बात मजबूती से रख सकता है, तो वह नरेंद्र मोदी ही हैं।

• भारत रूस का पुराना रणनीतिक साझेदार है।

• साथ ही, भारत ने यूक्रेन से भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष संवाद बनाए रखा है।

• यही “डुअल डिप्लोमेसी” भारत को शांति वार्ता के लिए सबसे उपयुक्त मध्यस्थ बनाती है।

भारत की कूटनीति: प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष संवाद

भारत ने हमेशा युद्ध से अधिक शांति और संवाद को महत्व दिया है।

• रूस से प्रत्यक्ष संपर्क: भारत ऊर्जा, रक्षा और रणनीतिक साझेदारी के कारण रूस से करीबी रिश्ते रखता है।

• यूक्रेन से अप्रत्यक्ष संवाद: मानवीय सहायता और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर समर्थन के जरिए भारत यूक्रेन के साथ जुड़ा रहा।

• ग्लोबल बैलेंस: भारत की यह संतुलित कूटनीति दोनों पक्षों को स्वीकार्य है, जबकि अमेरिका अब इस भूमिका से बाहर हो चुका है।

युद्ध के बाद का भविष्य: भारत को दोहरी उपलब्धि

यदि यह युद्ध भारत की मध्यस्थता से खत्म होता है, तो परिणाम बेहद दिलचस्प होंगे।

• अमेरिका रूस को भी खो देगा और यूक्रेन को भी।

• भारत दोनों देशों के साथ मजबूत संबंध बनाए रखेगा।

• यही वह स्थिति है जो भारत को वैश्विक शक्ति संतुलन का निर्णायक खिलाड़ी बना देगी।

यूरोप और भारत: रणनीतिक साझेदारी का विस्तार

भारत और फ्रांस की हालिया वार्ता सिर्फ युद्ध तक सीमित नहीं है।

• रक्षा सौदे, ऊर्जा सहयोग और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी भारत-यूरोप संबंधों को नई ऊंचाई दे रही है।

• फ्रांस और भारत की यह नज़दीकी यूरोप को संकेत देती है कि “नई विश्व व्यवस्था में भारत अपरिहार्य है।”

निष्कर्ष: भारत की ओर देखती दुनिया

रूस-यूक्रेन युद्ध ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति का चेहरा बदल दिया है। अमेरिका की पकड़ कमजोर हो रही है, यूरोप थक चुका है और रूस अपनी जगह अडिग है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत वह केंद्र बन गए हैं, जहां से समाधान निकल सकता है।

भारत अब केवल “उभरती शक्ति” नहीं बल्कि “निर्णायक शक्ति” बन चुका है। यह वही क्षण है जब दुनिया भारत की ओर उम्मीद से देख रही है और यह उम्मीद वाजिब भी है।

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