सिडनी टेस्ट विवाद 2008: हरभजन-साइमंड केस और ऑस्ट्रेलियाई बेशर्मी

Cricketer bowling during a match.

सिडनी टेस्ट विवाद 2008 में हरभजन सिंह और एंड्रयू साइमंड का झगड़ा क्रिकेट इतिहास का सबसे काला अध्याय बना। जानिए पूरी सच्चाई और ऑस्ट्रेलिया की बेशर्मी।

प्रस्तावना: क्रिकेट का सबसे काला दिन

क्रिकेट को हमेशा सज्जनों का खेल कहा गया है। लेकिन खेल के इतिहास में कुछ ऐसे पन्ने भी दर्ज हैं, जिन्होंने इस छवि को हमेशा के लिए दागदार कर दिया। सिडनी टेस्ट 2008 (India vs Australia) ठीक वैसा ही एक प्रकरण है। इस मैच के दौरान भारतीय गेंदबाज हरभजन सिंह और ऑस्ट्रेलियाई ऑलराउंडर एंड्रयू साइमंड के बीच हुआ विवाद केवल एक व्यक्तिगत झगड़ा नहीं था, बल्कि क्रिकेट की खेल भावना पर एक बड़ा धब्बा बन गया। यह घटना आज भी “Sydney Shame Test” के नाम से याद की जाती है।

सिडनी टेस्ट की पृष्ठभूमि

जनवरी 2008 में बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी का दूसरा टेस्ट मैच सिडनी क्रिकेट ग्राउंड पर खेला जा रहा था। पहला टेस्ट ऑस्ट्रेलिया जीत चुका था और दूसरा मैच भारत के लिए बेहद अहम था। भारतीय टीम अच्छी स्थिति में थी और हरभजन सिंह बल्ले और गेंद दोनों से शानदार प्रदर्शन कर रहे थे। उनकी आक्रामक बल्लेबाजी ने ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजों पर दबाव बना दिया था। यही बात मेजबान टीम को खटक रही थी और इसी से विवाद की जमीन तैयार हुई।

एंड्रयू साइमंड का उकसावा

एंड्रयू साइमंड उस दौर में अपनी आक्रामकता और sledging (गाली-गलौज व उकसावे की रणनीति) के लिए कुख्यात थे। जब हरभजन बल्लेबाजी कर रहे थे, तब उन्होंने लगातार उन्हें उकसाने का काम किया। कई बार वे उनके पास आकर कुछ कहते, बार-बार इशारे करते और माहौल बिगाड़ने की कोशिश करते।

सचिन तेंदुलकर उस समय हरभजन के साथ क्रीज़ पर थे। उन्होंने बार-बार भज्जी को समझाया कि वे साइमंड की बातों पर ध्यान न दें और खेल पर फोकस करें। लेकिन उकसावे की हद पार होने के बाद हरभजन से गाली निकल ही गई। पर इसमें नस्लवाद जैसा कोई तत्व नहीं था।

“Monkey” का आरोप और विवाद

यहीं से विवाद ने आग पकड़ ली। साइमंड ने यह आरोप लगाया कि हरभजन ने उन्हें “Monkey” (बंदर) कहा है। नस्लवादी टिप्पणी का यह आरोप बेहद गंभीर था, क्योंकि ICC के नियमों में इसे बड़ा अपराध माना गया था। हरभजन ने तुरंत इनकार कर दिया।

सचिन तेंदुलकर ने भी साफ गवाही दी कि हरभजन ने गाली दी, लेकिन “monkey” शब्द का प्रयोग नहीं किया। इसके बावजूद साइमंड और ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों ने इस आरोप को बढ़ा-चढ़ाकर मीडिया में फैलाया। देखते ही देखते यह विवाद पूरी दुनिया में सुर्खियाँ बनने लगा।

मैच रेफरी का विवादित फैसला

मैच के बाद रेफरी माइक प्रॉक्टर ने घंटों सुनवाई की। भारतीय टीम ने अपना पक्ष रखा और सचिन तेंदुलकर ने भी स्पष्ट गवाही दी। इसके बावजूद रेफरी ने हरभजन सिंह पर तीन टेस्ट मैचों का प्रतिबंध लगा दिया। यह फैसला पूरी तरह पक्षपाती माना गया।

क्रिकेट जगत में सवाल उठे कि जब किसी ठोस सबूत या गवाह ने नस्लवाद की पुष्टि नहीं की, तो इतनी बड़ी सज़ा कैसे दी जा सकती है। भारतीय प्रशंसक और मीडिया गुस्से में थे, वहीं ऑस्ट्रेलियाई खेमे में इसे जीत की रणनीति के रूप में देखा गया।

घटिया अम्पायरिंग और ऑस्ट्रेलियाई बेशर्मी

सिडनी टेस्ट केवल इस विवाद की वजह से नहीं, बल्कि घटिया अम्पायरिंग की वजह से भी बदनाम हुआ। भारतीय खिलाड़ियों को बार-बार गलत आउट दिया गया, जबकि ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजों को नॉट आउट करार दिया गया।

सबसे बड़ी गलती एंड्रयू साइमंड के मामले में हुई। जब वे 30 रन पर थे, तब उनका आउट होना साफ था, लेकिन अम्पायर ने नॉट आउट दे दिया। इसके बाद साइमंड ने 162 रन बनाए और मैच का पासा पलट गया। भारतीय बल्लेबाज राहुल द्रविड़, सौरव गांगुली और वीवीएस लक्ष्मण जैसे खिलाड़ियों को भी गलत फैसलों का शिकार होना पड़ा।

कप्तान अनिल कुंबले ने मैच के बाद कहा था—

“Only one team was playing in the spirit of the game.”

यह बयान इस मैच की असलियत बयान करने के लिए काफी था।

भारतीय टीम का मजबूत रुख

हरभजन पर बैन लगने के बाद भारतीय टीम ने एकजुट होकर इसका विरोध किया। कप्तान अनिल कुंबले और सचिन तेंदुलकर ने साफ कहा कि अगर बैन नहीं हटाया गया, तो टीम सीरीज़ बीच में छोड़कर भारत लौट आएगी। बीसीसीआई ने भी खिलाड़ियों का साथ दिया और ICC पर दबाव बनाया।

अंततः मामला दोबारा सुना गया और हरभजन का बैन हटा दिया गया। हालांकि उन्हें गाली-गलौज की वजह से मैच फीस पर जुर्माना देना पड़ा। लेकिन भारतीय टीम ने यह साफ कर दिया कि वे अपने खिलाड़ियों के साथ अन्याय बर्दाश्त नहीं करेंगे।

असली दोषी कौन था?

इस पूरे विवाद का मुख्य पात्र केवल एंड्रयू साइमंड नहीं थे। कप्तान रिकी पोंटिंग की भूमिका भी बेहद नकारात्मक थी। उन्होंने न केवल साइमंड का पक्ष लिया, बल्कि अम्पायरिंग के विवादित फैसलों को भी सही ठहराया। ऑस्ट्रेलियाई टीम का रवैया ऐसा था मानो खेल भावना से उनका कोई लेना-देना ही न हो।

यही कारण है कि क्रिकेट इतिहास में इस मैच को Sydney Shame Test कहा गया। यह सिर्फ एक मैच का हार-जीत का मामला नहीं था, बल्कि खेल की नैतिकता और ईमानदारी पर सीधा हमला था।

मीडिया और जनता की प्रतिक्रिया

इस विवाद ने पूरी दुनिया में हलचल मचा दी। भारतीय मीडिया ने हरभजन का पक्ष लिया और ऑस्ट्रेलियाई टीम की आलोचना की। क्रिकेट विशेषज्ञों और पूर्व खिलाड़ियों ने भी माना कि अम्पायरिंग और रेफरी का फैसला पक्षपाती था।

ऑस्ट्रेलियाई मीडिया ने हालांकि साइमंड का बचाव किया, लेकिन वैश्विक स्तर पर उनकी छवि धूमिल हो गई। भारतीय प्रशंसकों का गुस्सा इतना बढ़ा कि उन्होंने इस घटना को क्रिकेट पर “कलंक” करार दिया।

विवाद का असर

सिडनी टेस्ट विवाद का असर केवल उस सीरीज़ तक सीमित नहीं रहा। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच क्रिकेट संबंधों में लंबे समय तक खटास रही। यह घटना एक मिसाल बन गई कि कैसे एक टीम की आक्रामकता और अम्पायरिंग की गलतियाँ खेल को पूरी तरह बिगाड़ सकती हैं।

हरभजन सिंह और एंड्रयू साइमंड के रिश्ते भी इसके बाद कभी सामान्य नहीं हो पाए। हालांकि बाद के वर्षों में उन्होंने आईपीएल में साथ खेलकर रिश्ते सुधारने की कोशिश की, लेकिन 2008 का यह विवाद हमेशा उनकी पहचान से जुड़ा रहा।

निष्कर्ष: खेल भावना पर दाग

सिडनी टेस्ट 2008 हमेशा क्रिकेट इतिहास का सबसे काला अध्याय रहेगा। हरभजन सिंह पर झूठे नस्लवाद के आरोप लगाए गए, अम्पायरिंग की गलतियों ने मैच को विकृत कर दिया और ऑस्ट्रेलियाई टीम ने बेशर्मी की सारी हदें पार कर दीं।

आज भी जब इस मैच को याद किया जाता है, तो यही कहा जाता है –

“सिडनी टेस्ट ने साबित कर दिया कि क्रिकेट केवल रन और विकेट का खेल नहीं, बल्कि ईमानदारी, सम्मान और खेल भावना की भी कसौटी है।”

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