फारूक इंजीनियर – 60–70 के दशक का करिश्माई विकेटकीपर-बल्लेबाज, लंकाशायर हीरो और भारतीय क्रिकेट का पहला ग्लैमर बॉय। जानिए उनकी पूरी कहानी।
परिचय – भारतीय क्रिकेट का पहला ग्लैमर बॉय
भारतीय क्रिकेट के इतिहास में कई दिग्गज विकेटकीपर आए और गए, लेकिन 60 और 70 के दशक में एक नाम ऐसा था जिसने इस भूमिका को ही नया अंदाज़ दिया – फारूक इंजीनियर। उनकी मूंछें, स्टाइलिश लुक्स और आक्रामक बल्लेबाज़ी ने उन्हें सिर्फ एक खिलाड़ी नहीं बल्कि मैदान और मैदान के बाहर दोनों जगहों का आइकन बना दिया। वह पहले भारतीय विकेटकीपर थे जिनकी तुलना दुनिया के दिग्गजों से की गई।
फारूक इंजीनियर का शुरुआती जीवन और पृष्ठभूमि
फारूक इंजीनियर का जन्म 25 फरवरी 1938 को मुंबई में एक पारसी परिवार में हुआ। क्रिकेट उनके खून में था और बचपन से ही उनका झुकाव खेल की ओर रहा। उस दौर में भारतीय क्रिकेट का ढांचा उतना मजबूत नहीं था, लेकिन इंजीनियर ने अपने जुनून और मेहनत से टीम इंडिया तक का सफर तय किया।
भारतीय टीम में एंट्री और टेस्ट डेब्यू
फारूक इंजीनियर ने 1961 में इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट डेब्यू किया। उस समय भारतीय विकेटकीपर ज़्यादा चर्चित नहीं होते थे, लेकिन इंजीनियर अपनी अलग पहचान बनाने में सफल हुए। तेज़ रिफ्लेक्स, शेर जैसी फुर्ती और बल्ले से धमाकेदार स्ट्रोक खेलने की क्षमता ने उन्हें जल्दी ही सबका चहेता बना दिया।
बल्लेबाज़ी का अंदाज़ – T20 का स्वाद 70s में
जहां उस दौर में बल्लेबाज़ी रक्षात्मक मानी जाती थी, वहीं फारूक इंजीनियर अपनी आक्रामक बल्लेबाज़ी के लिए मशहूर हुए। उनके स्ट्रोक्स दर्शकों को 70s में ही T20 क्रिकेट का स्वाद दे देते थे। उन्होंने भारत के लिए 46 टेस्ट और 5 वनडे खेले, जिसमें 2611 रन, 2 शतक और 16 अर्धशतक शामिल हैं।
विकेटकीपिंग का नया चेहरा
इंजीनियर सिर्फ बल्ले से ही नहीं बल्कि विकेटकीपिंग से भी मैच का रुख बदल देते थे। उनके करियर में:
• 66 कैच और 16 स्टंपिंग टेस्ट में दर्ज हैं।
• वह पहले भारतीय विकेटकीपर थे जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाया।
उनकी तेज़ी और चपलता ने उन्हें दुनिया के बेहतरीन विकेटकीपरों की श्रेणी में ला खड़ा किया।
1971 की ऐतिहासिक इंग्लैंड सीरीज़ में योगदान
भारतीय क्रिकेट के इतिहास में 1971 की इंग्लैंड सीरीज़ का अपना अलग महत्व है। इस सीरीज़ में भारत ने पहली बार इंग्लैंड को हराकर इतिहास रचा। फारूक इंजीनियर इस ऐतिहासिक जीत के अहम किरदारों में से एक रहे। उनकी विकेटकीपिंग और बल्लेबाज़ी दोनों का टीम इंडिया को बड़ा फायदा मिला।
लंकाशायर और ओल्ड ट्रैफर्ड से जुड़ा गौरव
फारूक इंजीनियर ने 1968 से 1976 तक लंकाशायर काउंटी के लिए खेला। वहां उन्होंने 175 मैचों में 5942 रन, 429 कैच और 35 स्टंपिंग की। इंग्लैंड में उन्हें “पॉपुलर हीरो” माना जाता था।
हाल ही में उनके सम्मान में मैनचेस्टर के ओल्ड ट्रैफर्ड स्टेडियम में उनके नाम पर एक स्टैंड का अनावरण किया गया। वह पहले भारतीय बने जिनके नाम पर ओल्ड ट्रैफर्ड में स्टैंड बना है।
सचिन तेंदुलकर के साथ दुर्लभ सम्मान
दिलचस्प बात यह है कि फारूक इंजीनियर सिर्फ दूसरे ऐसे भारतीय बने जिनके नाम पर देश के बाहर किसी स्टेडियम में स्टैंड बना है। उनसे पहले यह सम्मान केवल सचिन तेंदुलकर को मिला था, जिनके नाम पर शारजाह स्टेडियम में स्टैंड है।
मैदान से बाहर – स्टाइल और ग्लैमर का जलवा
फारूक इंजीनियर मैदान के बाहर भी उतने ही लोकप्रिय थे।
• 70s में उन्हें भारतीय क्रिकेट का पहला ग्लैमर बॉय कहा जाता था।
• इंग्लिश मैगज़ीन और विज्ञापनों में वह अक्सर दिखाई देते थे।
• उनकी तुलना हॉलीवुड स्टार्स से की जाती थी।
उनकी पर्सनैलिटी और इंग्लिश एक्सेंट ने उन्हें क्रिकेट फैंस का और भी बड़ा फेवरेट बना दिया।
1975 वर्ल्ड कप और वनडे करियर
फारूक इंजीनियर ने भारत का प्रतिनिधित्व 1975 वर्ल्ड कप में किया। हालांकि उनके वनडे करियर में सिर्फ 5 मैच और 114 रन दर्ज हैं, लेकिन उनकी विकेटकीपिंग और अनुभव उस दौर की टीम इंडिया के लिए बहुत कीमती रहे।
कॉमेंट्री और रिटायरमेंट के बाद की भूमिका
क्रिकेट से रिटायरमेंट के बाद भी फारूक इंजीनियर ने खेल से दूरी नहीं बनाई। उन्होंने कॉमेंट्री और एनालिसिस में नाम कमाया। उनके मज़ेदार अंदाज़ और इंग्लिश एक्सेंट ने दर्शकों को खूब प्रभावित किया। साथ ही उन्होंने क्रिकेट प्रमोशन में भी सक्रिय भूमिका निभाई।
फारूक इंजीनियर – भारतीय विकेटकीपरों के लिए प्रेरणा
आज जब हम महेंद्र सिंह धोनी, ऋषभ पंत या दिनेश कार्तिक जैसे आक्रामक विकेटकीपर-बल्लेबाजों की बात करते हैं, तो उनकी नींव कहीं न कहीं फारूक इंजीनियर ने ही रखी थी। उन्होंने साबित किया कि विकेटकीपर सिर्फ “ग्लव्स मैन” नहीं बल्कि “गेम चेंजर” भी हो सकता है।
निष्कर्ष
फारूक इंजीनियर भारतीय क्रिकेट के लिए सिर्फ एक नाम नहीं बल्कि एक करिश्माई शख्सियत थे। उन्होंने विकेटकीपिंग और बल्लेबाज़ी दोनों में नए आयाम स्थापित किए। मैदान पर उनका अंदाज़, मैदान के बाहर उनका ग्लैमर और क्रिकेट के लिए उनका योगदान उन्हें हमेशा यादगार बनाता है।
आज ओल्ड ट्रैफर्ड में उनके नाम पर बना स्टैंड इस बात का सबूत है कि उन्होंने भारतीय ही नहीं, बल्कि वैश्विक क्रिकेट इतिहास में अमिट छाप छोड़ी है।
