प्रस्तावना: एक छोटे देश का बड़ा प्रभाव
कभी आपने सोचा है कि इज़राइल, जो भौगोलिक रूप से एक छोटे-से क्षेत्र में बसा है और जिसकी आबादी मुश्किल से एक करोड़ है, वह कैसे अमेरिका जैसी महाशक्ति पर इतना प्रभाव रखता है?
जब पूरी दुनिया गाज़ा या फिलिस्तीन के पक्ष में आवाज़ उठाती है, तब भी अमेरिका इज़राइल के साथ अडिग खड़ा रहता है।
क्या यह सिर्फ राजनीतिक गठजोड़ है, या इसके पीछे एक गहरी सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक ताक़त भी काम करती है?
हाल ही में इजिप्ट में हुई गाज़ा-इज़राइल संघर्ष पर अंतरराष्ट्रीय समिट और साथ ही अमेरिका में इवांका ट्रंप व जेरेड कुशनर को लेकर चर्चाओं ने इस विषय को फिर से सुर्खियों में ला दिया।
इज़राइल का जादू या रणनीति?
लोग अक्सर पूछते हैं —
“हाउ डज़ इज़राइल डू दिस?”
कैसे एक छोटा-सा राष्ट्र अमेरिका की विदेश नीति में इतना गहरा असर डाल देता है?
असल में, यह “जादू” नहीं, बल्कि संघठित यहूदी समुदाय की रणनीति, एकता और राष्ट्रभक्ति का परिणाम है।
जहां दूसरे देशों के अमीर और शिक्षित वर्ग अपनी सीमाओं में सीमित रहते हैं, वहीं यहूदी समुदाय दुनिया के किसी भी कोने में रहकर अपने देश इज़राइल के लिए काम करता है।
इवांका ट्रंप और यहूदी धर्म अपनाने की कहानी
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में इज़राइल की संसद (Knesset) में भाषण देते हुए कहा —
“My daughter converted… I didn’t know this was going to happen. She loves it so much.”
यह सुनकर पूरा संसद कक्ष तालियों से गूंज उठा।
दरअसल, ट्रंप की बेटी इवांका ट्रंप ने विवाह के बाद यहूदी धर्म (Judaism) अपनाया, और उनके पति जेरेड कुशनर खुद यहूदी हैं।
यह सिर्फ पारिवारिक निर्णय नहीं था — बल्कि अमेरिका–इज़राइल संबंधों के एक नए प्रतीकात्मक युग की शुरुआत थी।
आज इवांका और जेरेड अमेरिकी समाज के उस प्रभावशाली तबके का हिस्सा हैं जो इज़राइल के हितों को अमेरिकी राजनीति में मजबूती से स्थान दिलाने में भूमिका निभाता है।
जेरेड कुशनर और अब्राहम अकॉर्ड: एक नई कूटनीति
2020 में जब ट्रंप प्रशासन ने “अब्राहम अकॉर्ड (Abraham Accords)” की घोषणा की, तो पूरी दुनिया चौंक गई।
इस समझौते के तहत, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, सूडान और मोरक्को ने इज़राइल के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित किए।
इन समझौतों का नाम “अब्राहम” रखा गया, जो यहूदी, ईसाई और इस्लामी तीनों धर्मों के साझा पैगंबर हैं — यानी यह एक “Faith Diplomacy” थी।
इस पूरे विचार का वास्तुकार कोई राजनयिक नहीं बल्कि जेरेड कुशनर थे — ट्रंप के दामाद और व्हाइट हाउस के वरिष्ठ सलाहकार।
कुशनर ने पर्दे के पीछे रहकर एक ऐसा नेटवर्क तैयार किया, जिसने अरब दुनिया और इज़राइल के रिश्तों की दशकों पुरानी दीवारें ढहा दीं।
यहूदी अरबपति और अमेरिकी राजनीति
इज़राइल के समर्थन में अमेरिका की नीतियों के पीछे यहूदी परोपकारी और अरबपति दानदाताओं का बड़ा हाथ है।
इनमें से कई अरबपति अमेरिकी नागरिक हैं, लेकिन उनका समर्पण पूरी तरह इज़राइल के हित में झुका हुआ है।
उदाहरण के लिए —
मरियम एडलसन (Miriam Adelson)
अमेरिका की अरबपति यहूदी परोपकारी, जिनके पति शेल्डन एडलसन ट्रंप के सबसे बड़े दानदाताओं में से एक थे।
ट्रंप ने एक बार कहा —
“जब मैंने मरियम से पूछा कि वह किस देश से अधिक प्रेम करती हैं — अमेरिका या इज़राइल, तो वह चुप हो गईं।”
उनकी चुप्पी ने बहुत कुछ कह दिया।
ऐसे ही दर्जनों यहूदी अरबपति हैं —
• हाइमन सबान (Haim Saban)
• पॉल सिंगर (Paul Singer)
• रॉनल्ड लॉडर (Ronald Lauder)
जिन्होंने ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी के चुनाव अभियानों में सैकड़ों मिलियन डॉलर का योगदान दिया।
परिणामस्वरूप, व्हाइट हाउस की नीतियों में इज़राइल का दृष्टिकोण प्रमुखता से झलकने लगा।
इज़राइल की वैश्विक रणनीति: एकजुटता और लॉबिंग
इज़राइल की ताक़त उसकी सेना से ज्यादा उसकी एकजुटता (collective will) में है।
दुनिया भर में फैला हुआ यहूदी समुदाय — चाहे न्यूयॉर्क, पेरिस या लंदन में हो —
वे सभी एक बात पर सहमत हैं:
“इज़राइल की सुरक्षा हमारी पहचान का हिस्सा है।”
यह एकजुटता न केवल राजनीति, बल्कि मीडिया, हॉलीवुड, टेक्नोलॉजी और वित्तीय संस्थानों में भी दिखाई देती है।
यहूदी लॉबी ने वर्षों की मेहनत से अमेरिकी समाज में ऐसा प्रभाव बनाया है कि अब इज़राइल विरोधी नीतियों की कल्पना भी मुश्किल है।
भारत के लिए सबक: अमीरों की राष्ट्रनिष्ठा कहाँ खो गई?
अब सवाल यह है कि क्या भारत इस मॉडल से कुछ सीख सकता है?
भारत का शिक्षित और अमीर वर्ग अकसर देश से भावनात्मक रूप से कट जाता है।
जोहो (Zoho) के फाउंडर श्रीधर वेम्बु ने कहा था —
“भारत का शिक्षित वर्ग राष्ट्रभावना से दूर होता जा रहा है। अमीरी और सफलता मिलते ही वे भारत छोड़ने की सोचने लगते हैं।”
इसके विपरीत, इज़राइल के लोग चाहे न्यूयॉर्क में हों या सिडनी में, अपने देश के लिए काम करना नहीं छोड़ते।
वे लॉबिंग करते हैं, मीडिया चलाते हैं, दान देते हैं और अपनी संस्कृति को विश्व मंच पर फैलाते हैं।
भारत में राष्ट्रप्रेम को राजनीतिक खांचे में बाँट दिया गया है।
अगर कोई देशहित की बात करता है, तो उसे “दक्षिणपंथी” या “विंग” का टैग दे दिया जाता है।
जबकि राष्ट्रभक्ति किसी पार्टी की संपत्ति नहीं — यह एक नागरिक जिम्मेदारी है।
अमेरिका–इज़राइल संबंध: ठोस कारण
सैन्य सहयोग – अमेरिका हर वर्ष इज़राइल को 3.8 अरब डॉलर की सैन्य सहायता देता है।
राजनीतिक समर्थन – यूएन में अमेरिका कई बार इज़राइल के खिलाफ प्रस्तावों को वीटो करता है।
टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप – साइबर सिक्योरिटी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रक्षा और कृषि में सहयोग।
धार्मिक–सांस्कृतिक जुड़ाव – अमेरिका के ईसाई और यहूदी समुदायों के बीच ऐतिहासिक धार्मिक एकजुटता।
पाकिस्तान और अरब देशों पर दबाव
अब जब अब्राहम अकॉर्ड ने अरब दुनिया की सोच बदल दी है, तो अमेरिका धीरे-धीरे पाकिस्तान, इंडोनेशिया और बांग्लादेश पर भी दबाव बना रहा है कि वे इज़राइल को मान्यता दें।
हालांकि इन देशों में इस्लामी राजनीतिक दबाव भारी है, परंतु भविष्य की कूटनीति व्यापारिक हितों पर निर्भर करेगी।
भारत की स्थिति
भारत ने हमेशा संतुलन बनाए रखा है —
• इज़राइल से रक्षा और तकनीकी साझेदारी
• अरब देशों से ऊर्जा और श्रमिक संबंध
भारत की यही कूटनीतिक लचीलापन (strategic flexibility) उसकी ताक़त है।
परंतु अगर भारत को अपनी विदेश नीति को और मजबूत करना है, तो उसके अमीर, प्रवासी और शिक्षित वर्ग को राष्ट्रीय हित के लिए सक्रिय रूप से योगदान देना होगा जैसे यहूदी समुदाय करता है।
“अमेरिका इज़राइल संबंध कैसे इतने गहरे हैं?”
• धार्मिक जुड़ाव: यहूदी और ईसाई इतिहास में साझा आस्था
• राजनीतिक निवेश: यहूदी लॉबी द्वारा चुनाव अभियानों में भारी फंडिंग
• सांस्कृतिक प्रभाव: हॉलीवुड और अमेरिकी मीडिया में यहूदी प्रभाव
• रणनीतिक हित: मध्यपूर्व में इज़राइल को अमेरिका का “forward base” मानना
निष्कर्ष: राष्ट्रप्रेम की पुनर्परिभाषा
इज़राइल ने दुनिया को सिखाया है कि छोटा देश भी बड़ा बन सकता है, अगर उसके नागरिक एकजुट, समर्पित और दूरदर्शी हों।
अमेरिका–इज़राइल संबंध इस बात के साक्षी हैं कि राष्ट्रप्रेम सिर्फ भावना नहीं, बल्कि एक संगठित शक्ति है।
भारत को भी यही सीखने की आवश्यकता है की
राष्ट्रभक्ति को राजनीति से ऊपर रखकर देखा जाए,
देशहित को वर्ग या विचारधारा से न जोड़ा जाए,
और अमीर व शिक्षित वर्ग अपनी सफलता का एक हिस्सा देश की नीतियों और छवि को मजबूत करने में लगाए।
क्योंकि अंततः वही देश मजबूत होता है, जिसके नागरिक अपने राष्ट्र को अपना धर्म मानते हैं।
