क्या प्रकाश की गति सीमित है? “आयो ट्रांजिट” से ओले रोमर ने कैसे किया पहली बार सिद्ध | प्रकाश की चाल और अंतरिक्ष विज्ञान का अद्भुत रहस्य

क्या प्रकाश की गति को नापा जा सकता है टेलिस्कोप के बिना?

आप जब रात के अंधेरे में आकाश की ओर देखते हैं, तो क्या आपने कभी सोचा है कि तारे और ग्रह जो हमें दिखते हैं, वे उस समय के नहीं होते जब आप उन्हें देख रहे होते हैं? बल्कि वह दृश्य कुछ मिनट या साल पहले का होता है — क्योंकि प्रकाश को भी एक दूरी तय करने में समय लगता है। लेकिन यह पता कैसे चला कि प्रकाश की गति सीमित है? और वह भी उस दौर में जब न तो लेजर थे, न हाई-टेक घड़ियाँ, और न ही सैटेलाइट्स?

इसका श्रेय जाता है डेनमार्क के खगोलशास्त्री ओले रोमर (Ole Rømer) को, जिन्होंने 1676 में बृहस्पति ग्रह के एक चंद्रमा “आयो (Io)” के ट्रांजिट टाइमिंग का अध्ययन करके यह चौंकाने वाली खोज की थी।

यह लेख आपको न सिर्फ इस अद्भुत घटना से परिचित कराएगा, बल्कि यह भी समझाएगा कि क्यों प्राचीन सभ्यताएं प्रकाश की गति नहीं माप सकीं, और आज के वैज्ञानिक इसे कैसे नापते हैं।

बृहस्पति और उसका ज्वालामुखीय चंद्रमा “आयो”

बृहस्पति (Jupiter) हमारे सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह है और इसके चार प्रमुख चंद्रमाओं में से एक है “आयो”। आयो हर 42-43 घंटों में बृहस्पति का एक चक्कर लगाता है और अपने अत्यधिक वोल्केनिक (ज्वालामुखीय) सक्रियता के कारण खगोलशास्त्रियों के लिए एक बेहद रोचक वस्तु बन चुका है।

जब आयो बृहस्पति के सामने से गुजरता है और यह घटना पृथ्वी से देखी जाती है, तो इसे “आयो का ट्रांजिट” कहा जाता है। यही घटना ओले रोमर की ऐतिहासिक खोज का आधार बनी।

ट्रांजिट में समय का अंतर और रोमर की अद्भुत खोज

1676 में ओले रोमर ने देखा कि जब पृथ्वी बृहस्पति के निकट होती है, तो आयो का ट्रांजिट जल्दी दिखता है, और जब पृथ्वी दूर होती है, तो वही ट्रांजिट देर से दिखाई देता है। इसका एकमात्र कारण था:

प्रकाश की चाल अनंत नहीं है, वह सीमित है।

रोमर ने यह अंतर लगभग 22 मिनट मापा (हालाँकि सही अंतर 16-17 मिनट है) और इसी से अनुमान लगाया कि प्रकाश की गति लगभग 2,20,000 किमी/सेकंड है। यद्यपि उनकी गणना पूर्णतः सटीक नहीं थी, पर उनका तर्क और पद्धति आज भी वैज्ञानिक जगत में अद्वितीय मानी जाती है।

सवाल: क्या प्राचीन सभ्यताएं नहीं जान सकीं प्रकाश की गति?

अब यह प्रश्न उठता है कि यदि 17वीं शताब्दी में यह खोज संभव थी, तो क्या वैदिक, बेबीलोन, सुमेरियन या ग्रीक सभ्यताएं इसका अनुमान नहीं लगा सकती थीं?

उत्तर है – सैद्धांतिक रूप से हाँ, पर व्यावहारिक रूप से नहीं।

इसके पीछे कुछ वैज्ञानिक कारण हैं:

1.  टेलिस्कोप की अनुपस्थिति

आयो जैसे चंद्रमाओं को देखना बिना टेलिस्कोप के असंभव था। इसलिए प्राचीन सभ्यताओं के खगोलशास्त्रियों ने केवल उन्हीं ग्रहों (बुध, शुक्र, मंगल, शनि, बृहस्पति) का उल्लेख किया जिन्हें आंखों से देखा जा सकता था।

2.  ग्रहों का ट्रांजिट असंभव

बृहस्पति, शनि, मंगल जैसे बाहरी ग्रह कभी भी सूर्य और पृथ्वी के बीच में नहीं आते, अतः उनका ट्रांजिट पृथ्वी से नहीं देखा जा सकता। बुध और शुक्र के ट्रांजिट यद्यपि होते हैं, पर ये अत्यंत दुर्लभ हैं:

• बुध का ट्रांजिट: लगभग हर 8-10 वर्षों में

• शुक्र का ट्रांजिट: हर 243 वर्षों में दो बार

इतने लंबे अंतराल में ट्रांजिट पर शोध करना कई पीढ़ियों का कार्य होता।

3.  विलंब समय बहुत कम

बुध के ट्रांजिट में अधिकतम विलंब लगभग 30 सेकंड, जबकि शुक्र के मामले में 10 सेकंड होता है — जिसे प्राचीन समय के यंत्रों से मापना लगभग असंभव था।

📡 आयो ट्रांजिट क्यों बना सबसे उपयुक्त उदाहरण?

आयो जैसे चंद्रमा ही वे दुर्लभ खगोलीय वस्तुएं हैं जो:

• कुछ ही घंटों में ट्रांजिट पूरा करते हैं

• आसानी से टेलिस्कोप से देखे जा सकते हैं

• पृथ्वी से काफी दूर हैं जिससे समय में अंतर मापा जा सकता है

यही कारण है कि ओले रोमर जैसे वैज्ञानिकों ने इन्हें चुना, न कि बुध-शुक्र जैसे ग्रहों को।

निष्कर्ष: सीमित प्रकाश गति का प्रमाण — विज्ञान की एक ऐतिहासिक जीत

ओले रोमर की खोज ने यह पहली बार प्रमाणित किया कि प्रकाश की गति सीमित है, और यह हमारे ब्रह्मांड को समझने की दिशा में एक बड़ी छलांग थी। उन्होंने न केवल वैज्ञानिक सोच को दिशा दी, बल्कि यह भी सिद्ध किया कि खगोलीय घटनाएं यदि सही ढंग से मापी जाएं, तो हम कुदरत के सबसे गहरे रहस्यों को भी सुलझा सकते हैं — और वह भी बिना महंगे उपकरणों के।

आज हम चाहे लेजर, सैटेलाइट, या GPS तकनीक का इस्तेमाल करें, लेकिन यह कभी नहीं भूल सकते कि प्रकाश की गति जानने की नींव आयो के ट्रांजिट और ओले रोमर जैसे वैज्ञानिकों ने ही रखी थी।

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