एक मासूम ज़िद, एक बाप की सोच और एक बेटे की दिशा बदलती कहानी
29 जुलाई 1959 को जन्मे संजय दत्त का नाम सुनते ही बॉलीवुड, ड्रग्स, जेल, संजीवनी और संघर्ष की कहानियां याद आ जाती हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि उस संजय का बचपन कैसा था? जिस लड़के ने बाद में लाखों के दिलों पर राज किया, वो बचपन में इतना ज़िद्दी, जिद पर अड़ा हुआ और भावनात्मक रूप से उलझा हुआ था कि एक दिन उसके पिता सुनील दत्त ने उसे खुद सिगरेट पकड़ाई, ताकि वो डर जाए… लेकिन हुआ उल्टा!
यह लेख यासिर उस्मान की संजय दत्त की बायोग्राफी पर आधारित है और संजय के जन्मदिन के मौके पर हम आपको सुनाने जा रहे हैं वो सच्ची कहानी जो एक स्टार किड के ‘बिगड़ने’ और फिर दुनिया से जूझने की पहली कड़ी थी।
संजय दत्त – प्यार में पला, ज़िद में ढला
संजय अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था। मां नरगिस और पिता सुनील दत्त दोनों ही हिंदी सिनेमा के चमकते सितारे। लेकिन परवरिश का मैदान हमेशा चकाचौंध से दूर होता है। बचपन से ही संजय नटखट, शरारती और ज़िद्दी था।
बहन नम्रता की यादें
नम्रता दत्त बताती हैं कि जब संजय की शरारतें हद से पार होतीं तो नरगिस उसे ‘सुअर’, ‘जंगली’, ‘उल्लू’ जैसे शब्दों से डांटतीं। कई बार चप्पल भी उठा लेतीं। लेकिन संजय उनका लाडला था। हर बार माफ़ हो जाता।
मगर दिल बड़ा था
एक बार दिल्ली में शादी के मौके पर संजय ने एक भिखारी लड़के को ठंड में कांपते देखा। उसने बिना सोचे-समझे अपना गर्म कोट उस लड़के को दे दिया। उस दिन नरगिस और सुनील दत्त को बेटे पर गर्व हुआ।
वो सिगरेट वाला दिन जिसने दिशा बदल दी
सुनील दत्त कश्मीर में शूटिंग कर रहे थे। नरगिस संजय को साथ लेकर उनसे मिलने गईं। वहीं संजय ने पिता को कुछ दोस्तों के साथ सिगरेट पीते देखा। और… ज़िद पकड़ ली “मुझे भी सिगरेट चाहिए!”
नरगिस डांटने लगीं, मारने भी वाली थीं कि तभी सुनील दत्त बीच में आए। और उन्होंने जो कहा, वो शायद किसी भी पिता की सबसे बड़ी गलती या सबसे बड़ी सीख थी—
“इसे ट्राय करने दो। जलने से डरेगा। खांसी आएगी तो सिगरेट से खुद ही दूर हो जाएगा।”
लेकिन बच्चा डरता नहीं था…
सुनील दत्त ने संजय को सिगरेट दी। सिखाया कैसे पकड़ते हैं, कैसे कश मारा जाता है। लेकिन जो होना नहीं चाहिए था, वही हुआ। संजय ने पूरी सिगरेट खत्म कर दी… बिना डरे, बिना रुके।
दत्त साहब स्तब्ध रह गए। उन्होंने गुस्से में संजय को पीटा और उसे गर्म धूप में खड़ा कर दिया। लेकिन तब तक बहुत कुछ बदल चुका था।
सिगरेट से आगे… और भी काले अध्याय
इस घटना के बाद संजय ने चोरी-छिपे घर के मेहमानों द्वारा फेंके गए सिगरेट बट्स इकट्ठे करने शुरू कर दिए। गार्डन में जाकर आराम से पीने लगा। ये आदतें अब परिवार के लिए चिंता का कारण बन चुकी थीं।
अब वक्त था कड़ा फैसला लेने का
सुनील दत्त को एहसास हुआ कि फिल्मी माहौल संजय को बिगाड़ रहा है। उन्होंने नरगिस से कहा “अब इसे बोर्डिंग स्कूल भेजना होगा।”
लॉरेंस स्कूल सनावर – ज़िंदगी का पहला असली मोड़
इंदिरा गांधी से दत्त परिवार के अच्छे संबंध थे। उन्होंने ही लॉरेंस स्कूल, सनावर (हिमाचल प्रदेश) की सलाह दी। एक स्कूल जो अपने कठोर अनुशासन के लिए जाना जाता था।
विदाई का वो मंजर
संजय सिर्फ तीसरी क्लास में था। जब उसे वहां भेजा गया तो वो फूट-फूट कर रोया। चीखा, चिल्लाया, लेकिन जाना पड़ा। बहनें भी टूट गईं। नरगिस ऊपर से सख्त बनी रहीं लेकिन अंदर से रो रही थीं।
एक कड़वा अनुभव, एक कच्ची उम्र की जंग
इस पूरे घटनाक्रम ने संजय के व्यक्तित्व पर गहरा असर डाला। बोर्डिंग स्कूल की कठोरता, मां-बाप से दूरी और बचपन की शरारतें। सबने मिलकर एक ऐसा जटिल मन बनाया, जो आगे चलकर ड्रग्स और आत्मविनाश की ओर मुड़ा।
लेकिन… यही संजय बाद में मुन्ना भाई भी बना। और इस कहानी की सबसे बड़ी ताकत ये है कि यह सिर्फ एक स्टार किड की गलती नहीं, बल्कि हर उस परिवार की कहानी है जहां ‘प्यार और अनुशासन’ के बीच संतुलन खो जाता है।
जब पेरेंटिंग बनी सवालों का आईना
संजय दत्त की यह कहानी सिर्फ एक अभिनेता की ज़िंदगी का हिस्सा नहीं, बल्कि एक आइना है। जिसमें हम हर उस अभिभावक को देख सकते हैं जो अपने बच्चे की ज़िद, मासूम शरारतों और बगावतों के बीच उलझा हुआ है।
सुनील दत्त का फैसला… एक सिगरेट थमाना…गलत था या सही, ये बहस का विषय हो सकता है। लेकिन इससे एक चीज़ साफ़ होती है: परवरिश कभी आसान नहीं होती। हर कदम पर सोच, अनुभव और कभी-कभी किस्मत भी अपना रोल निभाती है।
आज जब हम संजय दत्त के जन्मदिन पर उन्हें याद करते हैं, तो यह भी समझते हैं कि उनका स्टारडम सिर्फ परदे की रोशनी से नहीं, बल्कि बचपन की उन स्याह गलियों से भी बना है, जिनसे निकलकर वो आज तक हमारे दिलों में हैं।
