नेशनल अवॉर्ड्स और पक्षपात: फिल्मी सितारों की असल कहानियाँ

नेशनल अवॉर्ड्स: सम्मान या पक्षपात? पुरस्कारों की चमक और विवादों की कहानी

नेशनल अवॉर्ड्स और विवाद: सितारों के पीछे छूपी असल कहानियाँ

हर नेशनल अवॉर्ड सीजन में एक अजीब-सी बेचैनी फैल जाती है। जैसे किसी ताज की हिफाजत हो रही हो या फिर अदृश्य दीवारें उठ रही हों, जो प्रतिभा और पहचान के बीच खड़ी हैं। कुछ नामों पर फक्र जताया जाता है, कुछ नामों पर सवाल उठते हैं। इस शोर-शराबे के बीच असली सवाल है: क्या अवॉर्ड्स सच में सच्ची प्रतिभा के इनाम होते हैं या सिर्फ खेले जाते हैं कुछ खास नामों के लिए?

फिल्मी मैदान में पक्षपात: रहस्य, भावना और सच्चाई

कई बार अवॉर्ड आपके नाम के पीछे छुपे खास अक्षरों पर भी निर्भर करता है। जब मोहम्मद अज़हरुद्दीन पर इल्जाम लगे, सचिन समेत तमाम साथी खिलाड़ियों ने शुरुआती सपोर्ट दिया। लेकिन जब अज़हर ने बयान दिया की “मेरे साथ माइनॉरिटी होने के कारण भेदभाव हो रहा है”, तो कैसे सभी दोस्त एक-एक करके दूर हो गए! 

नतीजा? 

अज़हर का करियर वहीं दम तोड़ गया, फिल्म बनी, पर न समाज बदला, न सोच।

इसी तरह, जब शाहरुख खान को ‘जवान’ के लिए बेस्ट एक्टर अवॉर्ड मिला, तो कईयों ने कहा – “फिर वही खान को अवॉर्ड, पक्षपात है!” पर सच क्या है? क्या मामला सिर्फ नाम का है, या शक फिल्म की क्वालिटी और एक्टर के अभिनय पर भी है?

अवॉर्ड्स की राजनीति: नाम या कर्म?

• ‘हम तुम’ के समय सैफ अली खान को नेशनल अवॉर्ड मिला, तो सबने उंगली उठाई कि उनकी माँ शर्मिला टैगोर अवॉर्ड कमेटी की चेयरपर्सन थीं।

• अगर ओमकारा जैसी दमदार फिल्म पर सैफ को अवॉर्ड मिला होता, शायद कोई सवाल न उठता। मगर वही कोंकणा सेन शर्मा को क्यों मिला? क्योंकि उस समय बुद्ददेब दासगुप्ता चेयरपर्सन थे, और किसी ने आपत्ति नहीं जताई!

• इस बार, विक्रांत मेसी और शाहरुख को साझा नेशनल अवॉर्ड मिलने की चर्चा हुई क्योंकि आशुतोष गोवारिकर ज्यूरी चेयरपर्सन हैं और शाहरुख उनके खास दोस्त। क्या सच में दोस्ती अवॉर्ड दिला सकती है?

चर्चा के घेरे में: नाम, परफॉर्मेंस या कुछ और?

• शाहरुख को ‘दिल से’, ‘स्वदेस’, ‘चक दे इंडिया’, ‘फैन’, ‘माय नेम इज़ खान’ के लिए अवॉर्ड नहीं मिला, पर ‘जवान’ के लिए मिला… क्यों?

• ‘जवान’ की थीम, एक आम आदमी का सिस्टम बदलने का सफर, स्लो मोशन में धमाकेदार लुक, विज़िलैंटि हीरो के करतब ने नेशनल अवॉर्ड ज्यूरी को इम्प्रेस किया, पर क्या यही मल्टीप्लेक्स ऑडियंस और क्रिटिक्स का पैमाना है?

• अपरिचित जैसी फिल्म, जिसमें विक्रम का दमदार अभिनय था लेकिन सिर्फ स्पेशल इफेक्ट्स के लिए ही क्यों सराही गई? ‘हिन्दुस्तानी’ में कमल हासन को सही मायनों में समाज सुधारक अभिनय के लिए अवॉर्ड मिला, तो क्या उस वक्त ज्यूरी अधिक निष्पक्ष थी?

क्या दर्शकों की राय मायने रखती है?

हर बार जब दर्शकों के टिकेट्स से सजी दुनिया में पार्शियलिटी की बात होती है, तो क्यों उन्हें ‘कम्युनल’ या पूर्वाग्रही कह दिया जाता है? क्या उनका सवाल करना, अवॉर्ड की गुणवत्ता पर उंगली उठाना गुनाह है? ‘जवाब दो और सुनो मत’ ये दर्दनाक स्थिति दर्शकों का खुद से अलगाव बढ़ाती है।

कुछ अवॉर्ड्स सही हाथों में भी गए…

• विक्रांत मेसी को ’12th फेल’ के लिए और रानी मुखर्जी को ‘मिसेज़ चटर्जी vs नॉर्वे’ के लिए अवॉर्ड वाकई जायज़ लगे। दर्शकों ने भी माना की रानी मुखर्जी का काम तो ऑस्कर स्तर का था!

निष्कर्ष: सवाल ज़रूरी हैं, क्योंकि दर्शक ही असली जज हैं

नेशनल अवॉर्ड्स हो या किसी बड़े प्लेटफॉर्म की मान्यता, हर बार दिल बहलाने के लिए स्टोरी सुना दी जाती है, लेकिन सवाल वही हैं:

क्या अवॉर्ड्स वाकई टैलेंट पर मिलते हैं?

क्या नाम, जाति या रिश्ते निर्णायक हैं?

इन सवालों को उठाना ज़रूरी है। ये सिर्फ एंटरटेनमेंट नहीं, समाज के बदलते चेहरे का आईना है। असहमति ज़हर नहीं, बदलाव की शुरुआत है। जहां तक अवॉर्ड्स का सवाल है “जिसे जो मिला, जब मिला, वो खुश है।” लेकिन दर्शक जब तक सवाल करेंगे, उम्मीद रहेगी कि एक दिन ईमानदारी जीत जाएगी, ना सिर्फ मंच पर बल्कि दिलों में भी।

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