नेहरू से मोदी तक: भारत की विदेश नीति का सफर और ग्लोबल साउथ की भूमिका

जवाहरलाल नेहरू और नरेंद्र मोदी की संयुक्त छवि, पृष्ठभूमि में हरे रंग का विश्व मानचित्र।

जब संसद की हर बहस में नेहरू जी का नाम गूंजता है

भारत की विदेश नीति की कहानी किसी एक दिन या एक दशक में नहीं बनी। यह एक लंबी, जटिल और कभी-कभी कड़वी यात्रा है। संसद में चाहे कोई भी विषय हो, नेहरू जी का नाम चर्चा में आ ही जाता है। इसका कारण केवल उनका स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री होना नहीं है, बल्कि वह सोच और दृष्टि है जिसने भारत की अंतरराष्ट्रीय पहचान की नींव रखी।

आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भारत “ग्लोबल साउथ” की अगुवाई कर रहा है, अफ्रीका से लेकर दक्षिण अमेरिका तक रणनीतिक साझेदारियाँ बना रहा है। लेकिन यह विचार “ग्लोबल साउथ” नया नहीं है। इसकी पहली बैठक 1947 में आयोजित हुई थी, और उसके सूत्रधार थे पंडित जवाहरलाल नेहरू।

1947 की पहली ग्लोबल साउथ बैठक — आज़ादी से पहले की दूरदर्शिता

मार्च-अप्रैल 1947, भारत अभी आज़ाद नहीं हुआ था, लेकिन नेहरू ने चीन, वियतनाम, म्यांमार, थाईलैंड, श्रीलंका और कई अफ्रीकी देशों के प्रतिनिधियों को एक साथ बैठाया। मकसद था दो ध्रुवीय दुनिया में किसी एक महाशक्ति की गुलामी से बचना।

इस बैठक ने आगे चलकर “नॉन-अलाइनमेंट मूवमेंट” की नींव रखी, जिसे 1955 में नेहरू ने औपचारिक रूप दिया। उनका सपना था कि एशिया और अफ्रीका के नए आज़ाद देश एक तीसरा, स्वतंत्र ध्रुव बनें।

नॉन-अलाइनमेंट और नेहरू की रणनीतिक भूल

पटेल की चेतावनी और तिब्बत का सवाल

सरदार पटेल ने नेहरू जी को चेताया था की चीन से सावधान रहें। लेकिन नेहरू की प्राथमिकता अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा थी। उन्होंने मान लिया कि तिब्बत पर चीन के कब्जे से भारत को कोई खतरा नहीं होगा, जबकि अंग्रेजों के समय तिब्बत एक बफर स्टेट था।

नेहरू ने जल्दबाज़ी में चीन के तिब्बत पर नियंत्रण को स्वीकृति दे दी। नतीजा चार-पाँच साल बाद दलाई लामा भारत आए और धर्मशाला में निर्वासित सरकार बनाई। भारत न तो तिब्बत का भरोसेमंद साथी बन सका, न ही चीन का।

1962 का चीन-भारत युद्ध और नेहरू की निराशा

नेहरू ने कभी सोचा भी नहीं था कि चीन हमला करेगा। सेना का आकार 20% घटा दिया गया था। जब चीन ने सीमा पर कब्जा जमाना शुरू किया, नेहरू ने कोलंबो यात्रा से पहले लापरवाही से कह दिया—“हमारी सेना चीनियों को पीटकर भगाएगी।”

यह बयान चीन को उकसाने के लिए काफी था। 1962 का युद्ध शुरू हुआ, तैयारी न के बराबर थी, सैनिक शौर्य दिखाते रहे लेकिन राजनीतिक नेतृत्व असमंजस में था। रेडियो पर नेहरू का संदेश—“अब हम केवल प्रार्थना कर सकते हैं” एक हार का प्रतीक बन गया।

इंदिरा गांधी का मोड़ — नॉन-अलाइनमेंट से रणनीतिक गठबंधन तक

नेहरू की सैद्धांतिक नीति को इंदिरा गांधी ने बदल डाला। उन्होंने USSR से नज़दीकी बढ़ाई, पोखरण में परमाणु परीक्षण किए और पाकिस्तान को दो टुकड़ों में बांट दिया। यह अमेरिका के लिए बड़ा झटका था, जिसने बाद में पाकिस्तान का साथ देना शुरू कर दिया।

भारत को रूस से हथियार लेने पड़े, और यह रक्षा संबंध इतने गहरे हो गए कि आज भी भारत अचानक रूस से दूरी नहीं बना सकता।

अटल-मनमोहन युग — अमेरिका की ओर झुकाव

USSR टूटने के बाद दुनिया पर अमेरिका का दबदबा बढ़ा। पोखरण परीक्षण के बाद अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार पर आर्थिक प्रतिबंध लगे। लेकिन जॉर्ज बुश को एहसास था कि चीन को काउंटर करने के लिए भारत की ज़रूरत है।

परमाणु समझौता हुआ। लेफ्ट के विरोध के बावजूद मुलायम सिंह यादव ने पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की राय पर समर्थन दिया। यह वह मोड़ था, जब भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक साझेदारी मजबूत हुई, जबकि रूस से रक्षा सहयोग जारी रहा।

मोदी युग — ग्लोबल साउथ की पुनर्परिभाषा

आज भारत अमेरिका और रूस दोनों को साथ लेकर चल रहा है। नॉन-अलाइनमेंट की भावना कायम है, लेकिन उसका स्वरूप बदल गया है। ग्लोबल साउथ के मंच पर भारत अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के देशों को जोड़ रहा है, ताकि बहुध्रुवीय दुनिया में उसकी आवाज़ गूंज सके।

निष्कर्ष: इतिहास से सीख, भविष्य की तैयारी

भारत की विदेश नीति का सफर नेहरू की दूरदर्शिता, इंदिरा की कठोर रणनीति, अटल-मनमोहन की कूटनीतिक संतुलन कला और मोदी की वैश्विक महत्वाकांक्षा से होकर गुजरा है।

इतिहास सिखाता है कि केवल आदर्श नहीं, बल्कि तैयारी, ताकत और समयानुकूल निर्णय भी जरूरी हैं।

भारत आज जिस “ग्लोबल साउथ” की अगुवाई कर रहा है, उसकी जड़ें 1947 में बोई गई थीं और वही बीज अब वैश्विक मंच पर एक विशाल वृक्ष बन चुके हैं।

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