प्रस्तावना
दुनिया की ऊर्जा राजनीति आज एक बार फिर भारत को केंद्र में खड़ा कर चुकी है। रूस ने घोषणा की है कि वह भारत को कच्चे तेल की खरीद पर औसतन 5% स्पेशल डिस्काउंट देगा। यह खबर सिर्फ आर्थिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक परिदृश्य में भी गहरी हलचल पैदा कर चुकी है। अमेरिकी मीडिया से लेकर यूरोप और एशिया तक, हर जगह इस फैसले की चर्चा है।
रूस का यह कदम ऐसे समय आया है जब अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के कारण भारत–अमेरिका संबंधों में तनाव बढ़ रहा है। सवाल उठता है कि क्या यह छूट केवल तेल व्यापार तक सीमित है, या इसके पीछे कहीं गहरे राजनीतिक संदेश भी छिपे हैं?
रूस का 5% डिस्काउंट: असल मायने क्या हैं?
रूस के डेप्युटी ट्रेड रिप्रेज़ेंटेटिव टू इंडिया ने खुद यह पुष्टि की है कि भारत को औसतन 5% डिस्काउंट मिलेगा। यह छूट कभी 4.5% तक हो सकती है और कभी 6% तक भी।
डिस्काउंट किस आधार पर है?
• पश्चिमी देशों ने रूस पर प्राइस कैप लगाया है कि वह $60 प्रति बैरल से ऊपर तेल नहीं बेच सकता।
• भारत को इसी कैप रेट पर 5% का अतिरिक्त डिस्काउंट मिल रहा है।
• यानी भारत को रूसी तेल औसतन $56–57 प्रति बैरल में मिल रहा है।
जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें वर्तमान में $60–62 के आसपास हैं, ऐसे में यह अंतर छोटा लग सकता है। लेकिन भू-राजनीतिक अस्थिरता, खासकर ईरान–इज़राइल तनाव, किसी भी समय कीमतों को आसमान पर पहुंचा सकता है। उस स्थिति में यह डिस्काउंट भारत के लिए वरदान साबित होगा।
भारत की अर्थव्यवस्था को फायदा
भारत की ऊर्जा ज़रूरतें बेहद बड़ी हैं। प्रतिदिन लगभग 5 मिलियन बैरल ऑयल भारत आयात करता है। ऐसे में 5% का डिस्काउंट अरबों डॉलर की बचत कराता है।
महंगाई पर नियंत्रण
• भारतीय सरकारी कंपनियां जैसे IOC, BPCL रूस से बड़े पैमाने पर तेल खरीद रही हैं।
• निजी कंपनियां भी हिस्सा ले रही हैं। Reliance लगभग 23% और Nayara Energy करीब 13–14% रूसी तेल खरीद रही हैं।
• इसका सीधा असर आम जनता पर पड़ा है। भारत में महंगाई दर (inflation) हाल ही में 4.5% के आसपास रही, जबकि पश्चिमी देशों में यह 8–10% तक पहुंच गई।
इसलिए यह कहना गलत है कि रूस से सस्ता तेल केवल कुछ उद्योगपतियों को फायदा पहुंचा रहा है। असल में इसका लाभ आम जनता तक पहुंच रहा है, क्योंकि पेट्रोल–डीज़ल की कीमतें स्थिर रही हैं।
अमेरिका की आपत्तियां और प्रोपेगेंडा
अमेरिकी ट्रेज़री सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने हाल ही में दावा किया कि भारत की यह डील सिर्फ “अमीर घरानों” को फायदा पहुंचा रही है। लेकिन यह बयान तथ्यों से मेल नहीं खाता।
असली मकसद क्या है?
1. अमेरिका चाहता है कि भारत रूस से दूरी बनाए और तेल आयात कम करे।
2. डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों ने यह साफ कर दिया है कि अमेरिका भारत पर दबाव बनाने से पीछे नहीं हटेगा।
3. भारत के खिलाफ यह नैरेटिव गढ़ा जा रहा है कि वह “रूस का साथी” बनता जा रहा है।
असल में यह एक सूचना युद्ध (information war) है। यदि भारत ने ठोस आंकड़ों और डेटा के साथ जवाब नहीं दिया, तो अमेरिकी प्रोपेगेंडा अंतरराष्ट्रीय मंच पर सच माना जाने लगेगा।
भू-राजनीतिक संकेत: रूस–भारत की साझेदारी
रूस का यह डिस्काउंट सिर्फ आर्थिक कदम नहीं है, बल्कि एक भू-राजनीतिक संदेश भी है।
• रूस ने साफ कर दिया है कि वह भारत को एक “स्थायी ग्राहक” मानता है।
• भारत–रूस–चीन की त्रिपक्षीय शिखर वार्ता की संभावना जताई गई है।
• यह अमेरिका को सीधा संकेत है कि यदि वह भारत को अलग-थलग करता है, तो भारत के पास वैकल्पिक साझेदार मौजूद हैं।
डोनाल्ड ट्रंप की नीतियां: भारत–अमेरिका रिश्तों पर असर
भारत और अमेरिका ने पिछले दो दशकों में अपने संबंधों को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया था… रक्षा, तकनीक और व्यापार सभी क्षेत्रों में। लेकिन ट्रंप के हालिया फैसलों ने इस साझेदारी को झटका दिया है।
• सैंक्शन लगाना: आमतौर पर सैंक्शन दुश्मन देशों पर लगाए जाते हैं। भारत पर यह कदम अविश्वास का संकेत है।
• टैरिफ और दबाव: ट्रंप प्रशासन भारत को “आर्थिक प्रतिस्पर्धी” मानकर चल रहा है, न कि “रणनीतिक साझेदार”।
• भरोसे में कमी: भारतीय विशेषज्ञ मानते हैं कि यह स्थिति हमें 30 साल पुराने दौर की याद दिलाती है जब अमेरिका ने हमें अलग-थलग करने की कोशिश की थी।
भारत की चुनौती: सूचना युद्ध का मुकाबला
भारत को अब केवल तेल खरीद पर ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि नैरेटिव सेट करने की रणनीति भी बनानी होगी।
• डेटा, रिपोर्ट और वास्तविक आंकड़े साझा करने चाहिए।
• डिजिटल मीडिया, एनिमेशन और वीडियो के माध्यम से जनता और अंतरराष्ट्रीय मंच को सच्चाई दिखानी चाहिए।
• केवल सरकारी बयानबाज़ी से यह जंग नहीं जीती जा सकती।
निष्कर्ष
रूस का 5% डिस्काउंट केवल आर्थिक लाभ नहीं है, बल्कि यह एक स्ट्रैटेजिक मैसेज भी है। भारत आज ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां उसे अमेरिका की अविश्वासपूर्ण नीतियों और रूस की भरोसेमंद साझेदारी के बीच संतुलन बनाना होगा।
डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक नीतियों ने भारत–अमेरिका रिश्तों को गहरी चोट पहुंचाई है। आने वाले समय में इन संबंधों की मरम्मत संभव होगी या नहीं, कहना मुश्किल है। लेकिन इतना तय है कि भारत–रूस की ऊर्जा साझेदारी ने भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है और यही साझेदारी भविष्य की भू-राजनीति में भारत को मज़बूत स्थिति में खड़ा कर सकती है।
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FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)
1. रूस भारत को 5% डिस्काउंट क्यों दे रहा है?
रूस भारत को स्थायी ग्राहक मानता है और अमेरिका के टैरिफ व सैंक्शन का संतुलन बनाने के लिए यह आर्थिक लाभ दे रहा है।
2. क्या यह डिस्काउंट केवल प्राइवेट कंपनियों को मिल रहा है?
नहीं, भारत की सरकारी कंपनियां भी रूस से तेल खरीद रही हैं और इसका लाभ आम जनता तक पहुंच रहा है।
3. रूस का तेल भारत को कितने में मिल रहा है?
भारत को औसतन $56–57 प्रति बैरल में रूसी तेल मिल रहा है, जबकि अंतरराष्ट्रीय दाम $60–62 हैं।
4. क्या अमेरिका भारत पर सैंक्शन लगा रहा है?
हाँ, ट्रंप प्रशासन ने भारत पर कुछ सैंक्शन और टैरिफ लगाए हैं, जो आमतौर पर दुश्मन देशों पर लगाए जाते हैं।
5. क्या रूस–भारत साझेदारी अमेरिका–भारत रिश्तों को प्रभावित करेगी?
हाँ, रूस की नजदीकी से अमेरिका असहज है और यह भारत–अमेरिका रिश्तों में अविश्वास को बढ़ा सकती है।
