भारत-चीन संबंधों में अप्रत्याशित सुधार: ट्रंप टैरिफ विवाद से नया मोड़

भारत-चीन संबंधों में सुधार दर्शाती तस्वीर, पीएम नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग का आपसी आलिंगन।

प्रस्तावना

जनवरी 2025 एशियाई राजनीति के लिए ऐतिहासिक साबित हो रही है। लंबे तनाव और अविश्वास के बाद भारत और चीन के रिश्तों में अप्रत्याशित सुधार देखने को मिला है। पाँच साल बाद सीमा पर व्यापार बहाल हुआ है, चीन भारत का समर्थन कर रहा है, और अमेरिका खुले तौर पर नाराज़ है। BBC से लेकर CNN तक हर जगह यही हेडलाइन है – “Beijing opposes bully US for 50% tariffs on India”।

आख़िर अचानक ऐसा क्या हुआ कि बीजिंग, जो कल तक भारत का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी था, आज ट्रंप की आक्रामक नीतियों के बीच भारत के साथ खड़ा नज़र आ रहा है? आइए विस्तार से समझते हैं।

ट्रंप टैरिफ विवाद और चीन का भारत समर्थन

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 50% तक टैरिफ और सेकेंडरी सेंक्शन्स लागू कर दिए। यह कदम भारत के लिए एक बड़ा आर्थिक झटका था। लेकिन अप्रत्याशित रूप से चीन ने इस पर भारत का साथ दिया।

चीन के राजदूत ने स्पष्ट कहा:

• अमेरिका का यह रवैया कोलोनियल माइंडसेट की निशानी है।

• चीन हर स्थिति में भारत के साथ खड़ा रहेगा।

• बीजिंग खुद को आने वाले अमेरिकी सेंक्शन्स से बचाने के लिए भारत को एक रणनीतिक साथी के रूप में देख रहा है।

क्यों चीन भारत के साथ आया?

• ट्रंप अक्सर 90 दिन का अल्टीमेटम देते हैं, कभी-कभी 45 दिन में ही निर्णय ले लेते हैं।

• चीन को डर है कि अगली बारी उसके ख़िलाफ़ सेकेंडरी सेंक्शन्स की हो सकती है।

• भारत का साथ देकर चीन खुद को एशिया में एक “पॉज़िटिव प्लेयर” के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है।

पाँच साल बाद सीमा व्यापार बहाल

भारत-चीन संबंधों में सबसे अहम विकास यह है कि शिपकिला, लिपुलेख और नाथुला पास से सीमा व्यापार दोबारा शुरू हो गया है।

• 2020 में कोविड-19 और गलवान घाटी की घटना के बाद यह व्यापार पूरी तरह ठप हो गया था।

• 2025 में यह पुनः आरंभ होना न केवल एशिया बल्कि पूरी दुनिया में चर्चा का विषय है।

• इससे हिमालयी इलाक़ों में रहने वाले स्थानीय समुदायों की अर्थव्यवस्था को भी बड़ी राहत मिलेगी।

जापान की बेचैनी और वैश्विक प्रतिक्रियाएँ

जापान

टोक्यो के रणनीतिक हलकों में गहरी चिंता है। जापान ने अपनी इंडो-पैसिफिक स्ट्रेटेजी भारत की साझेदारी पर आधारित की थी। लेकिन अगर भारत और चीन के रिश्ते सुधरते हैं तो यह साझेदारी कमज़ोर पड़ सकती है।

रूस और एशियाई देश

रूस और मध्य एशियाई देशों ने इस प्रगति का स्वागत किया है। उनका मानना है कि एशिया में शांति और व्यापारिक सहयोग से सबको फ़ायदा होगा।

अमेरिका और पश्चिमी देश

अमेरिका नाराज़ है। ट्रंप के सलाहकार खुलेआम कह रहे हैं –

“हमने भारत पर टैरिफ लगाए ताकि वह अपना रवैया बदले, मगर यह तो शी जिनपिंग के गले लग रहा है।”

नेपाल की तीखी आपत्ति: लिपुलेख विवाद

सीमा व्यापार का सबसे विवादित बिंदु लिपुलेख पास रहा है। नेपाल ने इस पर खुलकर आपत्ति जताई है।

• काठमांडू का कहना है कि यह क्षेत्र विवादित है और नेपाल का हिस्सा है।

• नेपाली राजनीतिक पार्टियाँ इस पर एकजुट होकर भारत-चीन समझौते की आलोचना कर रही हैं।

• उनका तर्क है: “अगर भारत-चीन को नेपाल की ज़मीन से व्यापार करना है, तो हमसे अनुमति लेनी चाहिए।”

भारत की प्रतिक्रिया

नई दिल्ली ने नेपाल के दावे को सिरे से ख़ारिज कर दिया।

• ऐतिहासिक समझौते और मानचित्र बताते हैं कि कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा भारत का हिस्सा हैं।

• 1954 से यहां व्यापार चलता आया है और नेपाल ने कभी विरोध नहीं किया।

• हाल के वर्षों में इसे राजनीतिक मुद्दा बनाकर उछाला जा रहा है।

भारत-नेपाल संबंध और ग्राउंड रियलिटी

दिलचस्प बात यह है कि एक ओर नेपाल भारत पर क्षेत्रीय दावा कर रहा है, वहीं भारत लगातार नेपाल में विकास परियोजनाओं पर निवेश कर रहा है।

• हाल ही में भारत ने नेपाल में पाँच बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स शुरू किए।

• ये प्रोजेक्ट्स ग्रांट असिस्टेंस के तहत हैं – यानी मुफ्त सहायता, न कि कर्ज़।

• इनमें पुल, सड़कें और ऊर्जा परियोजनाएँ शामिल हैं।

फिर भी नेपाल में इन सकारात्मक खबरों को जनता तक पहुँचने से रोका जाता है, जबकि चीन अपने हर प्रोजेक्ट को बड़े पैमाने पर प्रचारित करता है।

नेपाल की राजनीति और “डिस्ट्रैक्शन टूल”

विशेषज्ञ मानते हैं कि नेपाल की राजनीति में लिपुलेख विवाद अक्सर एक डिस्ट्रैक्शन टूल बनकर सामने आता है।

• भ्रष्टाचार, प्रशासनिक विफलताओं और बेरोज़गारी से ध्यान हटाने के लिए नेता इस मुद्दे को बार-बार उठाते हैं।

• हकीकत यह है कि भारत-चीन व्यापार अब रुकने वाला नहीं है।

• आने वाले महीनों में शिपकिला, लिपुलेख और नाथुला से व्यापार और तेज़ी से बढ़ेगा।

भारत के लिए सावधानियाँ

हालांकि मौजूदा हालात भारत के लिए फ़ायदेमंद लग रहे हैं, मगर कूटनीति की दुनिया में सबकुछ शतरंज की तरह चलता है।

• दुश्मन का दुश्मन दोस्त वाली नीति फिलहाल भारत-चीन को जोड़ रही है।

• मगर एक चूक भारत की डिप्लोमैटिक साख पर बट्टा लगा सकती है।

• भारत को संतुलन बनाते हुए अमेरिका, जापान और नेपाल के साथ रिश्ते भी संभालने होंगे।

निष्कर्ष

भारत-चीन संबंधों में यह अप्रत्याशित सुधार एशिया की राजनीति का नया अध्याय है। अमेरिका के टैरिफ़ ने इन दोनों देशों को करीब ला दिया है, सीमा व्यापार बहाल हुआ है और नेपाल इस पर आपत्ति जता रहा है।

मगर यह सुधार स्थायी होगा या अस्थायी, यह आने वाले महीनों में तय होगा। भारत के लिए यह अवसर है, मगर साथ ही बड़ी परीक्षा भी।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. भारत-चीन सीमा व्यापार कहाँ से शुरू हुआ है?

भारत-चीन सीमा व्यापार जनवरी 2025 से शिपकिला, लिपुलेख और नाथुला पास से शुरू हुआ है।

2. चीन भारत का समर्थन क्यों कर रहा है?

चीन अमेरिका के टैरिफ़ और सेकेंडरी सेंक्शन्स से डरता है। भारत का समर्थन करके वह खुद को एशिया में रणनीतिक रूप से मज़बूत बनाना चाहता है।

3. नेपाल लिपुलेख को विवादित क्यों मानता है?

नेपाल का दावा है कि लिपुलेख उसकी ज़मीन पर है। लेकिन भारत के अनुसार ऐतिहासिक समझौते और नक्शे इसे भारत का हिस्सा साबित करते हैं।

4. क्या जापान भारत-चीन निकटता से चिंतित है?

हाँ, क्योंकि जापान की इंडो-पैसिफिक स्ट्रेटेजी भारत पर आधारित है। भारत-चीन संबंध सुधरने से टोक्यो की रणनीति प्रभावित हो सकती है।

5. क्या यह सुधार स्थायी रहेगा?

कूटनीति में स्थायित्व की गारंटी नहीं होती। भारत को संतुलित रहकर आगे बढ़ना होगा ताकि यह सुधार उसके हित में लंबे समय तक जारी रह सके।

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