अरब स्प्रिंग ने अरब देशों को हिला दिया, पर भारत क्यों और कैसे बचा? जानिए पूर्वोत्तर, लोकतंत्र और सुरक्षा तंत्र की भूमिका।
अरब स्प्रिंग से भारत क्यों और कैसे बचा?
2010 की सर्दियों में ट्यूनीशिया की एक गली में आग लगी। यह आग किसी घर या दुकान में नहीं, बल्कि मोहम्मद बुआज़ीज़ नामक एक युवा स्ट्रीट वेंडर के शरीर पर लगी थी। पुलिस की ज्यादती और भ्रष्टाचार से तंग आकर उसने ख़ुद को आग के हवाले कर दिया। इसी आग से भड़की वह चिनगारी, जिसे पश्चिमी मीडिया ने नाम दिया “Arab Spring”।
“Spring” यानी वसंत – मानो यह एक नया लोकतांत्रिक वसंत है, जो पुराने तानाशाही ढाँचों को तोड़कर नई आज़ादी लाएगा। लेकिन असलियत इससे कहीं ज़्यादा पेचीदा थी।
अरब स्प्रिंग: उम्मीद और हकीकत
• मिस्र (Egypt): तहरीर चौक पर हज़ारों युवा जुटे। सोशल मीडिया की गूँज से होस्नी मुबारक का 30 साल पुराना शासन गिर पड़ा।
• लीबिया (Libya): नाटो के बम बरसे, क़द्दाफ़ी मारा गया, लेकिन देश आज भी गृहयुद्ध की आग में जल रहा है।
• सीरिया (Syria): आंदोलन खूनी युद्ध में बदल गया। लाखों लोग मारे गए और करोड़ों शरणार्थी बन गए।
नतीजा: लोकतांत्रिक सपनों की जगह खून, अशांति और बर्बादी ने ले ली।
असलियत यह थी कि इसे महज़ “spontaneous revolt” यानी स्वतःस्फूर्त विद्रोह कहना अधूरा सच है। पश्चिमी ताक़तें पहले सोशल मीडिया के जरिए नैरेटिव गढ़ती रहीं और फिर अपने हितों के अनुसार regime change को आगे बढ़ाती गईं।
अरब स्प्रिंग का भारत पर असर क्यों नहीं हुआ?
जब पश्चिमी देशों ने इस रणनीति को दूसरे हिस्सों में “export” करना चाहा, तो उनकी नज़र भारत पर भी गई। खासकर पूर्वोत्तर भारत पर, जो अपनी भौगोलिक और सामाजिक स्थिति के कारण एक soft target माना गया।
पूर्वोत्तर: भूगोल और राजनीति की जटिलता
• सात राज्य – लगभग पूरी तरह अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं से घिरे।
• पड़ोसी – चीन, म्यांमार, बांग्लादेश और भूटान।
• ऐतिहासिक रूप से अलगाववादी आंदोलनों का गढ़ – नगा, मिज़ो, बोडो और ULFA।
इसीलिए पश्चिमी थिंक-टैंक और NGO नेटवर्क को लगा कि भारत में अगर कहीं “लोकतांत्रिक विद्रोह” खड़ा किया जा सकता है तो वह पूर्वोत्तर ही होगा।
पश्चिम और चीन की रणनीति
पश्चिम का नैरेटिव
• “मानवाधिकार हनन”
• “भारत द्वारा उपेक्षा”
• “सेना का दमन”
इन थीम्स को बार-बार amplify किया गया। विदेशी फंडिंग और चर्च नेटवर्क कई बार समाज सेवा से आगे जाकर narrative building में लगे।
चीन की चाल
चीन चाहता था कि भारत का पूर्वोत्तर अस्थिर रहे, ताकि भारत इंडो-पैसिफ़िक और दक्षिण चीन सागर में मज़बूत खिलाड़ी न बन पाए।
• कुछ विद्रोही गुटों को चीन और म्यांमार से समर्थन।
• “horizontal proxy” के ज़रिए अशांति को हवा।
भारत क्यों बचा अरब स्प्रिंग से?
1. मज़बूत सुरक्षा तंत्र
भारतीय सेना और असम राइफल्स ने militancy को contain रखा। जहां ज़रूरी हुआ, वहां सख़्ती दिखाई गई।
2. राजनीतिक समाधान
• Mizo Accord (1986)
• Bodo Agreement (2003, 2020)
इन समझौतों ने असंतोष को बातचीत की मेज़ तक लाने में सफलता पाई।
3. लोकतंत्र की जड़ें
भारत ने अरब देशों की तरह आंदोलन को repress करने की बजाय absorb किया।
• सोशल मीडिया की आवाज़ों को लोकतांत्रिक मंचों पर जगह मिली।
• चुनाव, बहस और मीडिया जैसे चैनलों ने विरोध को हिंसा बनने से रोका।
4. सामाजिक विविधता
भारत की विविधता इतनी गहरी है कि कोई एक नारा, एक मुद्दा या एक वर्ग पूरे देश को सड़क पर नहीं ला सकता।
5. इंटरनेट का उपयोग
भारत ने इंटरनेट को पूरी तरह बंद करने की बजाय आंशिक नियंत्रण और निगरानी अपनाई। इससे संवाद का रास्ता खुला रहा।
वर्तमान चुनौतियाँ: पश्चिम कम, पूरब ज़्यादा
आज ख़तरा पश्चिम से कम है, लेकिन पूरब से कहीं ज़्यादा।
• चीन की साइबर रणनीति – हैकिंग, सोशल मीडिया नैरेटिव और डिजिटल प्रोपेगेंडा।
• दक्षिण-पूर्व एशिया की अस्थिरता – म्यांमार का संकट, नेपाल और बांग्लादेश की राजनीतिक उथल-पुथल।
• पूर्वोत्तर भारत – अब भी बाहरी ताक़तों के लिए संवेदनशील इलाका।
भारत के लिए सबक और आगे का रास्ता
1. लोकतंत्र को मज़बूत रखना होगा।
जनता की आवाज़ को दमन नहीं, बल्कि संवाद और चुनाव से जवाब देना भारत की सबसे बड़ी ताक़त है।
2. पूर्वोत्तर का विकास जरूरी।
असंतोष का असली समाधान आर्थिक और सामाजिक विकास है। कनेक्टिविटी, शिक्षा और रोज़गार इस क्षेत्र को मुख्यधारा से जोड़ सकते हैं।
3. डिजिटल सुरक्षा पर ध्यान।
चीन जैसी ताक़तें अब साइबर नैरेटिव और AI आधारित प्रोपेगेंडा का इस्तेमाल कर रही हैं।
4. विदेश नीति की स्वतंत्रता।
भारत को न तो पश्चिम के दबाव में झुकना है और न चीन की चाल में फंसना है।
निष्कर्ष
Arab Spring का नाम वसंत था, लेकिन उसके नतीजे लंबी सर्दियों जैसे निकले।
भारत बचा क्योंकि उसका लोकतंत्र गहरा, सुरक्षा तंत्र मज़बूत और समाज विविधताओं से भरा है। दिल्ली का तहरीर चौक कभी नहीं बन पाया क्योंकि भारत की लोकतांत्रिक जड़ें इतनी गहरी हैं कि बाहरी ताक़तों की आँधी भी उन्हें हिला नहीं पाई।
आज भी बड़ी ताक़तें “Spring” को औज़ार की तरह इस्तेमाल कर रही हैं कभी पश्चिम से, कभी पूरब से। भारत के लिए यही सबक है कि लोकतंत्र और समाज की जड़ों को मज़बूत रखा जाए, ताकि कोई और “स्प्रिंग” हमें हिला न सके।
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❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. अरब स्प्रिंग क्या था?
उत्तर:
अरब स्प्रिंग 2010–2011 के दौरान अरब देशों में हुआ एक जनविद्रोह था, जो ट्यूनीशिया से शुरू होकर मिस्र, लीबिया, सीरिया और अन्य देशों तक फैल गया। इसका उद्देश्य लोकतंत्र और आज़ादी की माँग था, लेकिन ज़्यादातर देशों में यह गृहयुद्ध और अशांति में बदल गया।
2. अरब स्प्रिंग भारत तक क्यों नहीं पहुँचा?
उत्तर:
भारत में लोकतंत्र की गहरी जड़ें, विविधता और मज़बूत सुरक्षा तंत्र थे। भारत ने असंतोष को repress करने की बजाय चुनाव, बहस और संवाद जैसे लोकतांत्रिक तरीक़ों से absorb किया। यही वजह रही कि भारत अरब स्प्रिंग जैसे संकट से बच सका।
3. क्या भारत के पूर्वोत्तर में अरब स्प्रिंग जैसी स्थिति बन सकती थी?
उत्तर:
हाँ, पश्चिम और चीन ने पूर्वोत्तर भारत में ऐसा करने की कोशिश की थी। अलगाववादी आंदोलनों और NGO नेटवर्क के ज़रिए नैरेटिव बनाने का प्रयास हुआ, लेकिन भारतीय सेना, राजनीतिक समझौतों (जैसे मिज़ो और बोडो समझौता) और लोकतांत्रिक प्रक्रिया ने इसे रोक दिया।
4. चीन का क्या रोल था भारत में अशांति फैलाने में?
उत्तर:
चीन चाहता था कि भारत का पूर्वोत्तर अस्थिर रहे ताकि भारत इंडो-पैसिफ़िक में मज़बूत भूमिका न निभा पाए। उसने कुछ विद्रोही गुटों और साइबर-नैरेटिव्स को समर्थन दिया।
5. भारत ने अरब स्प्रिंग से क्या सबक लिया?
उत्तर:
भारत ने सीखा कि लोकतंत्र को मज़बूत बनाए रखना, असंतोष का राजनीतिक समाधान ढूँढना और डिजिटल सुरक्षा पर ध्यान देना ही बाहरी हस्तक्षेप से बचने का सबसे बड़ा तरीका है।
