भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर ट्रंप-मोदी की नई पहल, द्विपक्षीय रिश्तों में गर्माहट और वैश्विक राजनीति पर असर की विस्तृत पड़ताल।
प्रस्तावना: बदलते रिश्तों की नई इबारत
अमेरिका और भारत दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्र हैं। जब भी दोनों देशों के शीर्ष नेता (अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) साझा मंच पर आते हैं, तो पूरी दुनिया की नज़र उन पर टिक जाती है। हाल ही में राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर लिखा कि वह जल्द ही प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात करेंगे और द्विपक्षीय व्यापार समझौते को आगे बढ़ाने पर बातचीत करेंगे। इस घोषणा ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल पैदा कर दी है।
भारत-अमेरिका संबंध: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और वर्तमान संदर्भ
भारत और अमेरिका के रिश्ते हमेशा सीधी रेखा में नहीं चले। कभी ये रिश्ते सहयोग की मिसाल बने तो कभी विवादों के कारण तनावपूर्ण भी रहे। लेकिन शीत युद्ध के बाद अमेरिका ने महसूस किया कि भारत वैश्विक राजनीति में एक बैलेंसिंग पावर के रूप में उभर रहा है। यही कारण है कि पिछले ढाई दशकों से वाशिंगटन की रणनीति में भारत को अहम स्थान मिला हुआ है।
• 1990 के दशक: सोवियत संघ के विघटन के बाद भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था खोली और अमेरिका के साथ रिश्तों की नई शुरुआत हुई।
• 2005 का परमाणु समझौता: भारत-अमेरिका साझेदारी को नए स्तर पर ले गया।
• 2014 के बाद: नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में दोनों देशों ने रक्षा, व्यापार और इंडो-पैसिफिक रणनीति में गहराई से सहयोग किया।
ट्रंप का बयान और उसका महत्व
राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि दोनों पक्ष लगातार बातचीत कर रहे हैं और धीरे-धीरे आम सहमति की ओर बढ़ रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने इस बयान का स्वागत किया। यह संकेत देता है कि तनाव के बावजूद दोनों देश आपसी सहयोग को प्राथमिकता देना चाहते हैं।
ट्रंप का यह रुख खास इसलिए है क्योंकि:
1. अमेरिकी मीडिया और विपक्ष का दबाव – यदि अमेरिका भारत से दूरी बनाता है तो वैश्विक संतुलन बिगड़ सकता है।
2. रिपब्लिकन पार्टी के भीतर असहमति – पार्टी में कई लोग मानते हैं कि भारत को खोना अमेरिका की रणनीतिक गलती होगी।
3. चीन-रूस का प्रभाव – अगर भारत उनके करीब जाता है, तो वैश्विक समीकरण अमेरिका के खिलाफ हो सकते हैं।
भारत: एक वैश्विक बैलेंसिंग टूल
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी गुट निरपेक्ष विदेश नीति है। भारत किसी एक खेमे का हिस्सा नहीं है, बल्कि समय-समय पर अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार फैसले लेता है। यही कारण है कि भारत को कभी अमेरिका और कभी रूस-चीन के साथ खड़ा देखा गया है।
• अगर भारत चीन और रूस के साथ खड़ा होता है – तो वैश्विक शक्ति संतुलन उनके पक्ष में झुक सकता है।
• अगर भारत अमेरिका का साथ देता है – तो वॉशिंगटन को भारी रणनीतिक बढ़त मिलती है।
इस संतुलन को बनाए रखना ही भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक ताकत है।
टैरिफ विवाद और आंख-मिचौली की राजनीति
ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में भारत पर सेकेंडरी टैरिफ लगाए, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव पैदा हुआ। इसे संप्रभुता की परीक्षा मानते हुए भारत ने भी झुकने से इनकार कर दिया।
यह स्थिति “कौन पहले झपकाता है” जैसे खेल में बदल गई।
• भारत का संदेश साफ था: किसी भी कीमत पर संप्रभुता से समझौता नहीं होगा।
• ट्रंप ने समझ लिया कि भारत के लिए झुकना राजनीतिक रूप से असंभव है।
इसीलिए ट्रंप ने खुद पहल कर दोस्ताना संदेश दिया, ताकि बर्फ पिघल सके और बातचीत आगे बढ़ सके।
अमेरिकी आंतरिक राजनीति और भारत का महत्व
अमेरिका में केवल ट्रंप ही नहीं, बल्कि विपक्षी डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन पार्टी के वरिष्ठ नेता भी यह मानते हैं कि भारत को खोना खतरनाक होगा।
कारण:
1. आर्थिक ताकत – भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है।
2. भूराजनीतिक स्थिति – हिंद महासागर और इंडो-पैसिफिक में भारत की स्थिति अमेरिका के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
3. जनसंख्या और लोकतंत्र – दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और युवा आबादी अमेरिका के लिए एक मजबूत साझेदार है।
आने वाले समय की संभावनाएँ
ट्रंप और मोदी के बीच संभावित मुलाकात से उम्मीद है कि:
• व्यापार समझौता – दोनों देश बाजार पहुंच, टैरिफ और निवेश के मामलों पर समझौता कर सकते हैं।
• रक्षा सहयोग – इंडो-पैसिफिक रणनीति के तहत रक्षा समझौते मजबूत होंगे।
• तकनीकी सहयोग – एआई, साइबर सुरक्षा और सेमीकंडक्टर उत्पादन जैसे क्षेत्रों में नई संभावनाएं बनेंगी।
अगले एक महीने में दोनों देशों के बीच किसी न किसी आम सहमति की घोषणा संभव है।
निष्कर्ष: रिश्तों का नया अध्याय
भारत और अमेरिका के बीच रिश्ते केवल दो देशों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे पूरी वैश्विक राजनीति को प्रभावित करते हैं। ट्रंप का मोदी से मिलने और व्यापार समझौता करने का संदेश यह दिखाता है कि अमेरिका भारत को हल्के में नहीं ले सकता।
भारत की संप्रभुता, गुट निरपेक्ष नीति और रणनीतिक स्थिति उसे दुनिया की राजनीति में गेम चेंजर बनाती है। आने वाले दिनों में ट्रंप-मोदी की मुलाकात से न सिर्फ दोनों देशों के रिश्तों में नई गर्माहट आएगी, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन पर भी गहरा असर होगा।
