प्रस्तावना – कूटनीति में भरोसा नहीं, समझौते
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि “क्या हम चीन पर भरोसा कर सकते हैं?” लेकिन सच्चाई यह है कि कूटनीति भरोसे पर नहीं, बल्कि समझौतों पर चलती है। दोस्ती और भाईचारे जैसे शब्द केवल भाषणों और नारों में अच्छे लगते हैं, वास्तविक राजनीति में केवल हितों का टकराव और मेल काम करता है।
चाहे चीन हो, अमेरिका हो या रूस किसी भी देश से स्थायी भरोसा करना एक भ्रम है। विश्व राजनीति का हर अध्याय बताता है कि राष्ट्र केवल अपने हितों के अनुसार कदम उठाते हैं। यही कारण है कि 1971 में भारत और सोवियत संघ के बीच हुआ संधि–समझौता भारत की विदेश नीति का निर्णायक मोड़ साबित हुआ।
1960 का दशक – भारत, सोवियत और चीन के बीच तनाव
Sino-Soviet Split और उसका प्रभाव
1950 के दशक में सोवियत संघ और चीन दोनों साम्यवादी धुरी के स्तंभ थे। लेकिन जल्द ही दोनों के बीच विचारधारात्मक मतभेद बढ़ गए। इस तनाव को Sino-Soviet Split कहा जाता है। सोवियत संघ ने “शांतिपूर्ण सह–अस्तित्व” की नीति अपनाई, जबकि चीन ने इसे क्रांतिकारी आदर्शों से विचलन बताया।
भारत–चीन युद्ध 1962 के बाद सोवियत झुकाव
1962 के भारत–चीन युद्ध ने नई दिल्ली को गहरी चोट दी। अमेरिका और ब्रिटेन ने सीमित मदद दी, लेकिन सोवियत संघ ने मिग-21 जैसे अत्याधुनिक लड़ाकू विमान भारत को उपलब्ध कराए। इससे भारत और सोवियत के बीच सुरक्षा सहयोग मजबूत हुआ।
हथियार आपूर्ति और भारत की रणनीतिक निर्भरता
1960 के दशक में सोवियत हथियारों पर भारत की निर्भरता बढ़ी। इससे एक ओर भारत को सुरक्षा कवच मिला, वहीं दूसरी ओर यह सोवियत संघ के लिए दक्षिण एशिया में प्रभाव बढ़ाने का साधन बन गया।
टाशकंद घोषणा 1966 – सोवियत मध्यस्थता
भारत–पाकिस्तान युद्ध 1965 का परिणाम
1965 का युद्ध भारत और पाकिस्तान के बीच किसी भी निर्णायक जीत के बिना समाप्त हुआ। दोनों देशों को कूटनीतिक हस्तक्षेप की आवश्यकता थी।
टाशकंद घोषणा की शर्तें और महत्व
सोवियत संघ की मध्यस्थता से 10 जनवरी 1966 को टाशकंद घोषणा हुई। इसके तहत:
• दोनों देश युद्ध–पूर्व सीमाओं पर लौटे,
• बंदी सैनिकों को रिहा किया गया,
• आपसी हस्तक्षेप न करने का आश्वासन दिया गया।
शांति समझौते की सीमाएँ
हालांकि यह समझौता युद्ध को रोकने में सफल रहा, लेकिन भारत–पाक विवाद की जड़ें जस की तस रहीं। यह दिखाता है कि सोवियत संघ का रुख शांति–स्थापना तक सीमित था, न कि किसी पक्ष का स्थायी समर्थन करने तक।
1971 – भारत–सोवियत संधि का ऐतिहासिक मोड़
Indo-Soviet Treaty of Peace, Friendship and Cooperation
9 अगस्त 1971 को भारत और सोवियत संघ ने 20 वर्षों के लिए शांति, मैत्री और सहयोग की संधि पर हस्ताक्षर किए।
संधि की प्रमुख धाराएँ और अवधि
• दोनों देश रक्षा, विज्ञान और तकनीक में सहयोग करेंगे।
• यदि किसी एक पर हमला होता है, तो दूसरा सहयोग करेगा।
• क्षेत्रीय शांति बनाए रखने की जिम्मेदारी साझा की जाएगी।
गैर–संरेखण नीति और सोवियत सहयोग
भारत की विदेश नीति गुटनिरपेक्ष (Non-Alignment) रही थी। लेकिन इस संधि ने यह साफ कर दिया कि भारत अपने हितों की रक्षा के लिए बड़े समझौते करने से पीछे नहीं हटेगा।
बांग्लादेश मुक्ति संग्राम और सोवियत समर्थन
शरणार्थी संकट और भारत की चुनौतियाँ
1971 में पाकिस्तान के पूर्वी हिस्से (आज का बांग्लादेश) में सेना की कार्रवाई से लाखों लोग भारत में शरणार्थी बनकर आने लगे। भारत पर आर्थिक और सामाजिक दबाव बढ़ गया।
संधि ने भारत को कैसे दिया रणनीतिक कवच
भारत ने सोवियत संघ से संधि करके यह सुनिश्चित किया कि यदि पाकिस्तान या उसके सहयोगी (अमेरिका और चीन) हस्तक्षेप करें, तो सोवियत संघ भारत का समर्थन करेगा।
अमेरिका का सातवां बेड़ा और सोवियत पनडुब्बियाँ
दिसंबर 1971 में जब अमेरिका ने पाकिस्तान का समर्थन करने के लिए अपना सातवां बेड़ा बंगाल की खाड़ी की ओर भेजा, तो सोवियत संघ ने परमाणु पनडुब्बियाँ तैनात कर दीं। यह स्पष्ट संदेश था कि भारत अकेला नहीं है। नतीजा — पाकिस्तान घुटनों पर आ गया और बांग्लादेश एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में उभरा।
कूटनीति का यथार्थ – भरोसा बनाम हित
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ‘दोस्ती’ का भ्रम
राष्ट्रों की “दोस्ती” असल में शब्दों का खेल है। न तो अमेरिका स्थायी मित्र है, न चीन, न रूस।
रणनीतिक गठजोड़ का महत्व
जो टिकता है, वह है रणनीतिक गठजोड़ और समझौते। 1971 की संधि ने साबित कर दिया कि जब हित मेल खाते हैं, तो सहयोग मजबूत होता है।
1971 का सबक आज के भारत–चीन–अमेरिका संबंधों के लिए
आज भी भारत को वही संतुलन साधना पड़ रहा है। एक ओर अमेरिका और यूरोप, दूसरी ओर रूस, और तीसरी ओर चीन के साथ प्रतिस्पर्धा। इतिहास का सबक यही है कि भरोसे से नहीं, संतुलित समझौते से ही कूटनीति चलती है।
निष्कर्ष – कूटनीतिक समझौतों का स्थायी महत्व
भारत–सोवियत संधि 1971 केवल एक ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं, बल्कि कूटनीति की कठोर सच्चाई का प्रमाण है। यह दिखाती है कि:
• भरोसे पर नहीं, समझौते पर अंतरराष्ट्रीय राजनीति चलती है।
• राष्ट्रों के बीच स्थायी मित्रता नहीं, केवल हित आधारित साझेदारी होती है।
• बांग्लादेश मुक्ति संग्राम की सफलता भारत और सोवियत सहयोग के बिना संभव नहीं थी।
आज भी यही संदेश प्रासंगिक है: विश्व राजनीति में संतुलन साधना ही असली ताकत है।
