कसाब के वकील से लेकर केरल के ‘कटे पांव’ वाले आरएसएस कार्यकर्ता तक: मोदी युग में राज्यसभा की नई तस्वीर

भारत की राजनीति में आज एक ऐसा दौर है, जहाँ नायकों की परिभाषा बदल रही है। कभी सत्ता के गलियारों में चाटुकारों और खानदानी नेताओं का बोलबाला था, आज उसी संसद में जीवन के जोखिम उठाकर देश के लिए लड़ने वाले लोग बैठाए जा रहे हैं। भारत के राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा के लिए हाल ही में जिन चार व्यक्तियों को मनोनीत किया गया है, उनकी कहानियाँ किसी फिल्म से कम नहीं हैं, लेकिन यह हकीकत है, और बेहद सशक्त है।

उज्ज्वल निकम: वह शख्स जिसने कसाब को फांसी के फंदे तक पहुंचाया

2008 का मुंबई हमला कौन भूल सकता है? गोलियों की गूंज, सड़कों पर पसरा खून और देश का थर्रा जाना। उस भयावह रात का अंत एक ही नाम से जुड़ता है: उज्ज्वल निकम।

भारत सरकार की ओर से विशेष लोक अभियोजक बने निकम ने कसाब जैसे दरिंदे को कानून के कटघरे में खड़ा किया और उसे फांसी की सजा दिलवाई। आज वह केवल एक वकील नहीं, बल्कि न्याय का प्रतीक हैं। अब वही उज्ज्वल निकम देश की सबसे बड़ी पंचायत में बैठेंगे। यह खुद में न्याय की जीत है।

मास्टर सदानंद: जिनके दोनों पांव वामपंथियों ने काट डाले

केरल के मास्टर सदानंद की कहानी आशा, पीड़ा और संकल्प से भरी है। एक समय में वे खुद वामपंथी विचारधारा से जुड़े थे, लेकिन जब उन्होंने इस विचारधारा की हिंसक और विकृत सच्चाई को नज़दीक से देखा, तो उनका मोहभंग हुआ। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का दामन थामा।

बस यही उनका अपराध बन गया। और एक दिन, कुछ गुंडों ने उनके दोनों पांव काट डाले। और हैरानी की बात यह है कि उनके कट्टरपंथी हमलावरों का केरल में हीरो की तरह स्वागत हुआ, क्योंकि वहां सत्ता में कम्युनिस्ट पार्टी थी।

आज वही मास्टर सदानंद, एक व्हीलचेयर पर बैठकर, मगर मजबूत रीढ़ के साथ, राज्यसभा जा रहे हैं। ये कोई राजनीतिक नियुक्ति नहीं। यह एक विचारधारा की जीत है, बलिदान का सम्मान है।

हर्षवर्धन शृंगला: भारत की विदेश नीति का मस्तिष्क

पूर्व विदेश सचिव हर्षवर्धन शृंगला का नाम भारत की कूटनीति के क्षेत्र में जाना-पहचाना है। अमेरिका, नेपाल और बांग्लादेश में भारत के राजदूत रहे शृंगला ने चीन और पाकिस्तान के मोर्चों पर भारत की स्थिति को मजबूती दी।

अब जब वे राज्यसभा में कदम रखेंगे, तो न सिर्फ उनकी राजनयिक सूझबूझ, बल्कि उनका देशभक्त दृष्टिकोण भी संसद की नीतियों में झलकेगा।

डॉ. मीनाक्षी जैन: इतिहास को विकृतियों से बाहर निकालने वाली विदुषी

भारतीय इतिहास, कला और संस्कृति को झूठी कहानियों और काल्पनिक सेक्युलर चाशनी में लपेटने की जो कोशिश दशकों से होती रही, डॉ. मीनाक्षी जैन ने उसका तार्किक और दस्तावेज़ आधारित प्रतिकार किया है।

उनकी किताबें, उनके शोध और लेखन ने यह सिद्ध किया है कि भारत का इतिहास गौरवशाली है, न कि गुलामी और पराजय की दास्तान जैसा कि कई वर्षों तक पढ़ाया गया।

राज्यसभा मनोयन में बदलाव: मोदी बनाम कांग्रेस

अगर आप आज के राज्यसभा मनोयन को देखें और कांग्रेस सरकारों के दौर से तुलना करें, तो फर्क साफ़ दिखाई देता है।

कांग्रेस के दौर में राज्यसभा कैसे चलती थी?

• बॉलीवुड के चमकते सितारे

• खानदानी राजनेता और दरबारी

• टेलीप्रॉम्प्टर पढ़ने वाले बुद्धिजीवी

• “भारत तेरे टुकड़े होंगे” जैसे नारे लगाने वालों का वैचारिक समर्थन

मोदी युग में राज्यसभा की तस्वीर

• न्याय के योद्धा (उज्ज्वल निकम)

• विचारधारा के लिए बलिदान देने वाले कार्यकर्ता (मास्टर सदानंद)

• रणनीतिक सोच वाले पूर्व राजनयिक (हर्ष शृंगला)

• भारत की जड़ों से जुड़ी प्रामाणिक इतिहासकार (मीनाक्षी जैन)

यह केवल नामों की बात नहीं है, यह दृष्टिकोण का बदलाव है, जो अब भारत को आगे ले जा रहा है।

विश्लेषण: पद्म पुरस्कारों में भी यही ट्रेंड

मोदी सरकार ने ऐसे लोगों को पद्म सम्मान दिए जो पहले कभी सत्ता की नज़रों में नहीं आए। जैसे:

• गांवों में चुपचाप समाज सेवा करने वाले कार्यकर्ता

• लोक संगीत को बचाने वाले लोक कलाकार

• स्वदेशी विज्ञान और शोध में योगदान देने वाले शिक्षक

वहीं कांग्रेस के काल में पद्म पुरस्कार अक्सर पार्टी के करीबी फिल्मी सितारों, लेखकों या विचारधारात्मक समर्थकों को दिए जाते थे।

यह बदलाव महज राजनीतिक नहीं, वैचारिक है

राज्यसभा के लिए उज्ज्वल निकम, मास्टर सदानंद, हर्ष शृंगला और मीनाक्षी जैन जैसे लोगों को चुनना बताता है कि अब भारत का लोकतंत्र पार्टी के वफादारों से ऊपर उठकर देश के असली सेवकों को सम्मान दे रहा है।

यह बदलाव इसलिए जरूरी था, क्योंकि भारत को अब चापलूसों की नहीं, चरित्रवान नेताओं की जरूरत है।

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