ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट: भारत की सामरिक शक्ति बनाम चीन की असुरक्षा

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट भारत की हिंद-प्रशांत रणनीति का अहम हिस्सा है, जो चीन की ऊर्जा सुरक्षा और सामरिक संतुलन को चुनौती देता है।

प्रस्तावना: निकोबार पर उठते सवाल और छिपा एजेंडा

हाल ही में सोनिया गांधी ने निकोबार द्वीपसमूह को लेकर एक लेख लिखा, जिसमें उन्होंने पर्यावरणीय चिंताओं को प्रमुखता दी। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह विरोध केवल जनजातीय अधिकार, पेड़-पौधों और कछुओं की सुरक्षा तक सीमित है, या इसके पीछे एक गहरा राजनीतिक और सामरिक खेल छिपा है?

दरअसल, जिस ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट की बात हो रही है, वह केवल एक विकास योजना नहीं बल्कि भारत की हिंद-प्रशांत रणनीति का केंद्रीय स्तंभ है। ₹75,000 करोड़ के इस प्रोजेक्ट में कंटेनर पोर्ट, ग्रीनफ़ील्ड एयरपोर्ट, पावर प्लांट, इंडस्ट्रियल ज़ोन, टाउनशिप और लग्ज़री टूरिज़्म शामिल हैं। कागज़ पर यह विकास दिखता है, लेकिन असल में यह भारत की समुद्री सुरक्षा और सामरिक स्वतंत्रता का मजबूत आधार बनने जा रहा है।

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट: क्या है इसकी असली अहमियत?

भारत का यह प्रोजेक्ट सिर्फ़ आर्थिक विकास का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह हिंद-प्रशांत महासागर में भारत की स्ट्रेटेजिक पकड़ को मजबूत करेगा।

• गालथेया बे में कंटेनर पोर्ट: भारत को वैश्विक सप्लाई चेन से जोड़ने वाला हब।

• ग्रीनफ़ील्ड एयरपोर्ट और एयरबेस: फाइटर जेट और निगरानी विमानों के लिए तैयार।

• टाउनशिप और इंडस्ट्रियल ज़ोन: नागरिक और लॉजिस्टिक इंफ्रास्ट्रक्चर।

• लग्ज़री टूरिज़्म: आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा।

मालक्का जलडमरूमध्य: क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

मालक्का स्ट्रेट दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है।

• चीन का लगभग 80% तेल आयात इसी मार्ग से होकर गुजरता है।

• भारत की Andaman & Nicobar Command इस मार्ग की निगरानी कर सकती है।

• यदि भविष्य में कोई संघर्ष होता है, तो भारतीय नौसेना आसानी से चीन की सप्लाई लाइन पर दबाव बना सकती है।

यही कारण है कि चीन इस क्षेत्र को लेकर बेहद असुरक्षित है और भारत के इस प्रोजेक्ट का विरोध अंतरराष्ट्रीय स्तर पर करवाना चाहता है।

अंडमान–निकोबार: भारत की सामरिक ढाल

मोदी सरकार ने पिछले कुछ सालों में इस क्षेत्र में सैन्य ढांचे को बेहद तेजी से मजबूत किया है।

• अत्याधुनिक निगरानी प्रणालियाँ (Surveillance Systems) स्थापित की गईं।

• अंडर Sea केबल प्रोजेक्ट ने सुरक्षित और तेज़ संचार उपलब्ध कराया।

• INS Baaz और Kohassa एयरबेस को अपग्रेड किया गया।

• नौसेना और मर्चेंट नेवी के लिए लॉजिस्टिक हब तैयार किए जा रहे हैं।

यह सब केवल पर्यटन या व्यापार के लिए नहीं, बल्कि हिंद-प्रशांत में भारत की सामरिक मौजूदगी (Strategic Presence) को मजबूत करने के लिए है।

विरोध क्यों और किसके लिए?

1. चीन और पाकिस्तान

• दोनों देशों को डर है कि भारत की पकड़ मालक्का स्ट्रेट पर मजबूत होगी।

• यह उनकी ऊर्जा और व्यापारिक सुरक्षा के लिए सीधा खतरा है।

2. राजनीतिक दल और NGOs

• सोनिया गांधी और उनसे जुड़े NGOs “पर्यावरणीय चिंता” को प्रमुख मुद्दा बना रहे हैं।

• विदेशी फंडिंग से संचालित संगठन इस प्रोजेक्ट को लेकर वैश्विक विरोध खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं।

• इतिहास गवाह है स्टरलाइट, पोस्को, नर्मदा आंदोलन जैसे मामलों में भी विदेशी ताकतों ने यही रणनीति अपनाई थी।

पर्यावरण बहाना, सामरिक दबाव असली खेल

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) पहले ही इस प्रोजेक्ट को पर्यावरणीय क्लीयरेंस दे चुका है।

फिर भी, विरोध के नाम पर पेड़ों, कछुओं और जनजातियों की दुहाई दी जा रही है।

असल में यह लड़ाई है:

• भारत की सामरिक स्वतंत्रता बनाम चीन की समुद्री सुरक्षा

• भारत की हिंद-प्रशांत रणनीति बनाम विदेशी दबाव राजनीति

मोदी सरकार की रणनीति

नरेंद्र मोदी सरकार इस प्रोजेक्ट को अपनी हिंद-प्रशांत नीति और आर्थिक विकास एजेंडे का अहम हिस्सा मानती है।

भारत न केवल अपनी नौसैनिक क्षमता को बढ़ा रहा है, बल्कि इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों के साथ सहयोग भी गहरा कर रहा है।

निष्कर्ष: असली टकराव भू-राजनीति का

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर विरोध आने वाले दिनों में और तेज़ होगा।

“पर्यावरण बचाओ” के नाम पर रिपोर्टें और अभियान चलेंगे, लेकिन असली जंग हिंद-प्रशांत की भू-राजनीति में है।

भारत के लिए यह प्रोजेक्ट आर्थिक विकास, समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक स्वतंत्रता का प्रतीक है।

चीन इसे अपनी कमजोरी मानता है और यही कारण है कि विरोध को बढ़ावा दिया जा रहा है।

FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

Q1. ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट क्या है?

यह ₹75,000 करोड़ का विकास प्रोजेक्ट है, जिसमें कंटेनर पोर्ट, एयरपोर्ट, टाउनशिप, इंडस्ट्रियल ज़ोन और टूरिज़्म शामिल हैं।

Q2. चीन इस प्रोजेक्ट से असुरक्षित क्यों है?

क्योंकि चीन का 80% तेल आयात मालक्का जलडमरूमध्य से गुजरता है, जिसे भारत नियंत्रित कर सकता है।

Q3. पर्यावरणीय विरोध की असली वजह क्या है?

पर्यावरण और जनजातीय अधिकार सिर्फ़ बहाना हैं, असली वजह भू-राजनीतिक दबाव और विदेशी हित हैं।

Q4. मोदी सरकार इस प्रोजेक्ट को क्यों आगे बढ़ा रही है?

क्योंकि यह भारत की हिंद-प्रशांत रणनीति और सामरिक सुरक्षा का अहम हिस्सा है।

Q5. क्या इस प्रोजेक्ट को कानूनी मंजूरी मिली है?

हाँ, NGT ने पर्यावरणीय क्लीयरेंस दे दी है, इसलिए यह प्रोजेक्ट कानूनी रूप से सुरक्षित है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *