क्या ‘तारे ज़मीन पर’ भारत की सबसे बड़ी देशभक्ति फ़िल्म है? पढ़ें ये रिपोर्ट

जब भी हिंदी सिनेमा में देशभक्ति की बात होती है, तो हमारे ज़ेहन में फौजी वर्दी, सीमा पर लड़ते जवान, या फिर अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ बग़ावत करने वाले किरदार आ जाते हैं। आमिर खान की ‘सरफ़रोश’, ‘लगान’ और ‘रंग दे बसंती’ जैसी फ़िल्में इसी कैटेगरी में आती हैं, जिनमें देश के लिए बलिदान, संघर्ष और जुनून दिखाया गया। लेकिन अगर गहराई से सोचें तो क्या देशभक्ति केवल झंडा लहराना, युद्ध लड़ना या दुश्मनों से मुकाबला करना ही है?

देशभक्ति का एक बड़ा रूप वो भी होता है जहां हम अपने देश के भविष्य को संवारे – यानी बच्चों को। और इस पैमाने पर अगर किसी फ़िल्म को सबसे ऊपर रखा जाए, तो वो है – ‘तारे ज़मीन पर’।

🎬 आमिर खान की सबसे ज़रूरी फ़िल्म – ना सिर्फ़ एक कलाकार के तौर पर, बल्कि एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में

2007 में आई ये फ़िल्म महज़ एक बच्चे की कहानी नहीं है, ये हर उस बच्चे की कहानी है जिसे स्कूल सिस्टम में फिट नहीं किया जा सका। आमिर खान ने इसे डायरेक्ट भी किया और प्रोड्यूस भी, लेकिन खुद को नायक बनाने की जल्दी नहीं की। बल्कि ईशान नाम के बच्चे की जर्नी को पूरी तरह स्पॉटलाइट में रखा।

📚 36 में से 30 बच्चों का दर्द – जिसे पहली बार किसी फ़िल्म ने समझा

हर क्लास में कुछ टॉपर्स होते हैं और कुछ बैकबेंचर्स। लेकिन उस भीड़ में जो बच्चे पढ़ाई में कमज़ोर होते हैं, उनके साथ कैसा सलूक होता है? मार, डांट, अपमान – यही तो हमारी पुरानी शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ रही है। ‘तारे ज़मीन पर’ पहली फ़िल्म थी जिसने पूछा – “क्यों नहीं पढ़ना चाहता ये बच्चा?”

डिस्लेक्सिया जैसे मुद्दों को मेनस्ट्रीम सिनेमा में लाना आसान नहीं था, लेकिन इस फ़िल्म ने वो कर दिखाया।

👏 बदलाव की शुरुआत – सिनेमा से सिस्टम तक

इस फ़िल्म के बाद कई चीज़ें बदलीं:

• स्कूलों में बच्चों को मारना अपराध माना जाने लगा

• बच्चों की मानसिक समस्याओं पर बात होने लगी

• सीबीएसई ने 8वीं क्लास में इस फ़िल्म पर आधारित पाठ “थैंक यू निकुंभ सर” जोड़ दिया

• ग्रेडिंग सिस्टम को लागू किया गया ताकि कमज़ोर छात्रों को “फेल” कहकर कुचला न जाए

क्या ऐसा प्रभाव किसी आम देशभक्ति फ़िल्म का होता है? शायद नहीं!

🧠 जब देश के बच्चों की परवाह हो, तभी तो देश का कल अच्छा होगा!

आज जब हम बात करते हैं कि भारत को विकसित राष्ट्र बनाना है, तो उसकी शुरुआत क्लासरूम से होती है, न कि युद्ध के मैदान से। एक बच्चा जो खुद को समझ सके, अपनी ताक़त पहचान सके, वो कल को बेहतर डॉक्टर, इंजीनियर, आर्टिस्ट या नेता बन सकता है। ‘तारे ज़मीन पर’ ने बच्चों को सिर्फ़ समाज में जगह नहीं दी, उन्हें आवाज़ दी।

🎥 आमिर खान की दूरदर्शिता – एक सच्चे फिल्मकार की मिसाल

इस फ़िल्म को पहले अमोल गुप्ते डायरेक्ट कर रहे थे, लेकिन कुछ क्रिएटिव मतभेदों के चलते वो पीछे हट गए। ज़्यादातर लोग सोचते कि फ़िल्म डिब्बाबंद हो जाएगी, लेकिन आमिर ने खुद निर्देशन की कमान संभाली। इंडस्ट्री के कई लोगों ने सलाह दी कि यह फ़िल्म नहीं चलेगी – “बच्चों की कहानी कौन देखेगा?” लेकिन आमिर ने न सिर्फ़ फ़िल्म बनाई, बल्कि इसे दिल से बनाया।

💯 न कमर्शियल, न फॉर्मूला – फिर भी 100 करोड़ की हिट!

इस फ़िल्म ने ना ही बड़े स्टार्स का सहारा लिया, ना ही मसाला एलिमेंट्स का। फिर भी 100 करोड़ क्लब में शामिल होकर साबित किया कि कंटेंट ही किंग होता है। लेकिन इससे भी ज़्यादा इसकी सबसे बड़ी सफलता है – लोगों के दिलों में जगह बनाना।

📌 निष्कर्ष: “तारे ज़मीन पर” देशभक्ति का सबसे सच्चा रूप है

अगर किसी फ़िल्म की वजह से लाखों बच्चों का बचपन बेहतर हो जाए, स्कूलों की सोच बदल जाए, पैरेंट्स अपने बच्चों से अलग नज़रों से बात करने लगें – तो उससे बड़ी देशभक्ति क्या हो सकती है?

‘तारे ज़मीन पर’ सिर्फ़ एक फ़िल्म नहीं, एक मूवमेंट थी। और अगर आमिर खान ने इसे देशभक्ति की श्रेणी में नहीं रखा, तो शायद अब वक्त है कि हम इसे वहाँ रखें।

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