कान्तारा – शिव का उपवन : दक्षिण भारत के दैवों की रहस्यमयी परंपरा

प्रस्तावना: जब ‘कान्तारा’ ने जगा दी भूली हुई स्मृति

कभी-कभी एक फ़िल्म केवल मनोरंजन नहीं होती वह संस्कृति का द्वार खोल देती है। “कान्तारा” (Kantara) ऐसी ही एक सिनेमाई अनुभूति है। इसे देखने के बाद अनेक दर्शकों के मन में यह प्रश्न उठा कि “यह कौन-से देव हैं जो आग, मिट्टी, पसीने और ढोल की थाप में उतरते हैं? कौन हैं ये जो दक्षिण के जंगलों में नाचते हैं और जिनकी पूजा भूत-कोला (Bhoota Kola) के रूप में होती है?”

जहाँ उत्तर भारत में पूजा के स्वरूप मंदिरों, आरती, दीप और मंत्रोच्चार से जुड़े हैं, वहीं दक्षिण भारत के तटीय इलाकों में देवताओं का अवतरण नृत्य, तंद्रा, और संवाद में होता है। एक ही शिव, पर भिन्न रूप…  कहीं श्मशान के नटराज, तो कहीं वन के रक्षक देव।

इस लेख में हम विस्तार से समझेंगे कि “कान्तारा” केवल एक फ़िल्म नहीं, बल्कि शिव के गणों और लोकदेवताओं की जीवंत परंपरा का पुनर्जागरण है।

“कान्तारा” का अर्थ – शिव का उपवन

“कान्तारा” (Kantara) शब्द की उत्पत्ति संस्कृत और कन्नड़ परंपरा से मानी जाती है। कई प्राचीन द्रविड़ ग्रंथों में इसका अर्थ मिलता है —

“शिव का उपवन” या “वह पवित्र वन जहाँ महादेव ने तप किया था।”

इन वनों में शिव के अनेक गण (companions or attendants of Shiva) निवास करते थे, जो लोक के रक्षक और न्याय के वाहक बने। समय के साथ ये गण स्थानीय देवता (Daiva) के रूप में पूजे जाने लगे। कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु के तटीय क्षेत्रों में आज भी ये परंपराएँ जीवित हैं।

इनमें दो प्रमुख देवता हैं —

1. पंजुरली दैव (Panjurli Daiva)

2. गुलिगा देव (Guliga Daiva)

दोनों ही शिव के गण माने जाते हैं, किंतु इनकी भूमिका और स्वरूप एकदम भिन्न हैं। जहाँ पंजुरली संरक्षण और समृद्धि के प्रतीक हैं, वहीं गुलिगा न्याय और अनुशासन के रौद्र रूप हैं।

पंजुरली की कथा – वाराह वनदेव

कथा कहती है कि एक दिन कैलाश पर्वत पर एक वाराह की मृत्यु हो गई। उसका शावक विलाप करता रहा। माता पार्वती को उस पर दया आई। उन्होंने उसे पाला, खिलाया, और अपने शिशु समान प्रेम दिया।

जब वह बड़ा हुआ, तो कैलाश की वनस्पतियों को नष्ट करने लगा। महादेव क्रोधित हुए और बोले —

“यह जीव यहाँ नहीं रह सकता; यह तपस्थली है।”

माता ने विनम्रता से कहा —

“स्वामी, यह निर्दोष है। यदि इसका अस्तित्व यहाँ बाधक है, तो इसे पृथ्वी पर भेज दीजिए। वहाँ यह वन और जीवन की रक्षा करेगा।”

इस प्रकार वह वाराह शावक “पंजुरली” के रूप में पृथ्वी पर अवतरित हुआ।

धरती पर आने के बाद उसने फसलों की रक्षा, पशुओं के रोग निवारण, और ग्राम सुरक्षा का कार्य किया। जनता ने उसे अपना ग्राम देवता माना। भूत-कोला के उत्सवों में जब वाराह मुखौटा धारण कर नृत्य किया जाता है, तो वह पंजुरली देव का प्रतीक होता है।

पंजुरली को विष्णु के वाराह अवतार से जोड़ना सामान्य भ्रांति है। किंतु लोक परंपरा में वे शिव के गण हैं — रक्षक, न कि संहारक।

गुलिगा देव की कथा – न्याय का रौद्र गण

एक अन्य कथा में वर्णन आता है जब यमराज बालक मार्कण्डेय के प्राण लेने आए, तो वह शिवलिंग से लिपट गया और पुकारा —

“त्राहि-माम्, महादेव!”

तब शिव प्रकट हुए, और यमराज से बोले —

“तेरे न्याय का माप अधूरा है। तुझे एक सहायक चाहिए, जो अंध-न्याय नहीं, सटीक न्याय करे… बिना दया के।”

उस क्षण शिव के शरीर से एक काले वर्ण का प्रचंड गण प्रकट हुआ। नाम रखा गया – गुलिगा।

शिव ने आदेश दिया —

“तू पृथ्वी पर जाएगा, न्याय करेगा। जहाँ अन्याय होगा, वहाँ तू दंड देगा। तेरा रूप भयावह होगा, किंतु न्याय तेरा धर्म होगा।”

इस प्रकार गुलिगा देव पृथ्वी पर अवतरित हुए। उनका स्वरूप भयानक है — आँखे धधकती, वेशाग्नि-प्राय, और स्वर गर्जन के समान। जनमानस में उनका भय ही अनुशासन है।

गुलिगा की पूजा दक्षिण के कई तटीय गाँवों में रात्री-भूतकोला के समय होती है।

भूत (Daiva) नर्तक गुलिगा के रूप में अवतरित होकर न्याय सुनाते हैं। ग्राम के झगड़े, भूमि विवाद, यहाँ तक कि परिवारिक अन्याय भी उसी क्षण निपटाए जाते हैं। लोगों का विश्वास है कि दैव के सामने कोई झूठ नहीं टिकता।

भूत-कोला परंपरा – जब देव स्वयं अवतरित होते हैं

भूत-कोला (Bhoota Kola) दक्षिण कन्नड़, उडुपी और तुलु क्षेत्र की हजारों वर्ष पुरानी लोक-परंपरा है।

“भूत” शब्द का अर्थ यहाँ आत्मा या गण से है, न कि भूत-प्रेत से।

इस परंपरा में कलाकार देव के गण का रूप धारण करते हैं। उनके चेहरे पर जटिल चित्रकला, शरीर पर पत्ते, धातु आभूषण और विशाल मुकुट। ढोल, नगाड़ा, और मंत्रोच्चार के साथ नृत्य आरंभ होता है।

धीरे-धीरे नर्तक तंद्रा (trance) में चला जाता है, और जनमानस मानता है कि उसी क्षण दैव उसमें अवतरित होता है। वह फिर लोगों से संवाद करता है, न्याय देता है, आशीर्वाद देता है।

भूत-कोला में पंजुरली और गुलिगा दोनों की उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती है —

एक रक्षा का प्रतीक, दूसरा न्याय का।

उत्तर और दक्षिण की पूजा-पद्धतियों का अंतर

जहाँ उत्तर भारत में शिव की पूजा ध्यान, मंत्र और योग से जुड़ी है, वहीं दक्षिण भारत के तटीय क्षेत्रों में शिव और उनके गणों की पूजा शारीरिक अनुभव और लोकजीवन से जुड़ी है।

• उत्तर में: शिव श्मशानवासी, ध्यानमग्न, अद्वैत के प्रतीक।

• दक्षिण में: शिव वनवासी, नर्तक, रक्षक, लोक-देव रूप में।

हम उत्तरवासी नंदी, भृंगी, वीरभद्र के नाम जानते हैं, पर दक्षिण के लोग पंजुरली, गुलिगा, कुमार देवता, पिली चामुंडी को पूजते हैं।

दोनों एक ही शक्ति के भिन्न आयाम हैं। जहाँ हम शिव को सीमित कर देते हैं, वहाँ दक्षिण ने उन्हें लोक में मुक्त छोड़ दिया है।

दैव पूजा और ग्राम संस्कृति

भूत-कोला केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि ग्राम्य समाज की न्याय व्यवस्था का भी हिस्सा है। यहाँ कोई अदालत, कोई काग़ज़ नहीं, केवल दैव का वचन चलता है।

हर वर्ष फसल कटने के बाद दैव उत्सव होता है।

ग्रामवासी मिलकर दैव की सेवा, संगीत, भोजन, और नृत्य की तैयारी करते हैं। दैव अवतरित होकर कहता है —

“किसी ने अन्याय किया हो तो बताओ।”

लोग अपने विवाद रखते हैं, और दैव (देवगण) तुरंत निर्णय देता है। वह निर्णय अंतिम होता है, और कोई उसका उल्लंघन नहीं करता।

यह परंपरा आज भी कर्नाटक के तुलु और मलनाड क्षेत्रों में जिंदा है। जहाँ आस्था और सामाजिक अनुशासन का संतुलन एक ही परंपरा में बंधा है।

‘कान्तारा’ फ़िल्म – लोकदेवों का आधुनिक पुनर्जन्म

2022 में जब ऋषभ शेट्टी की फ़िल्म “कान्तारा” रिलीज़ हुई, तो यह केवल सिनेमाई सफलता नहीं थी, यह दक्षिण भारत की सांस्कृतिक आत्मा का पुनर्जागरण था। फ़िल्म में दिखाया गया दैव नृत्य, अग्नि का चक्र, तंद्रा में बोलता देव, सब कुछ भूत-कोला परंपरा का यथार्थ चित्रण है।

“कान्तारा” का नायक वन और दैव के बीच फँसा मनुष्य है, जो अंततः स्वयं देव का गण बन जाता है। यह दर्शाता है कि ईश्वर कहीं बाहर नहीं, भीतर के संतुलन में है। यही कारण है कि “कान्तारा” को केवल लोककथा नहीं, बल्कि “आध्यात्मिक लोकदर्शन” कहा जा सकता है।

शिव और उनके गण – विविधता में एकत्व

शिव के गण अनेक हैं — नंदी, भृंगी, चंड-मुंड, वीरभद्र, कालभैरव, और इन सबके बीच दक्षिण के गुलिगा-पंजुरली।

इन सबमें समान तत्व है — शिव का संरक्षण, धर्म की रक्षा, और अन्याय का संहार।

यदि उत्तर भारत में शिव तांडव करते हैं, तो दक्षिण में उनके गण भूत-कोला के रूप में वही तांडव दोहराते हैं। दोनों ही रूप सृजन और विनाश के द्वंद्व का प्रतीक हैं। धर्म एक है रूप अनेक। यह भारतीयता की सबसे अद्भुत विशेषता है।

सांस्कृतिक संदेश – धर्म भूगोल से नहीं, भावना से उपजता है

कान्तारा की कथा हमें सिखाती है कि ईश्वर हर भूमि में अपने स्वभाव के अनुसार जन्म लेता है। कहीं वह हिमालय की बर्फ़ में ध्यानस्थ है, तो कहीं कर्नाटक के जंगलों में ढोल की थाप पर नाचता है। जो इन्हें अलग समझे, वह धर्म का नहीं, भूगोल का साधक है।

क्योंकि धर्म तो एक ही ऊर्जा है। कभी नंदी की नाद में, कभी पंजुरली के वाराह रूप में।

निष्कर्ष: कान्तारा – शिव के उपवन का पुकारता संदेश

कान्तारा केवल एक फ़िल्म नहीं, बल्कि यह हमारे भीतर के गण और देवत्व की पहचान है। यह बताती है कि आस्था और प्रकृति, देव और मानव, धर्म और लोक, सभी एक ही वृक्ष की शाखाएँ हैं।

जब अग्नि के चारों ओर नृत्य होता है, जब वाराह मुखौटा धारण करने वाला कलाकार तंद्रा में बोल उठता है — तो वहाँ देव और मनुष्य का भेद मिट जाता है।

यही है कान्तारा – शिव का उपवन।

जहाँ शिव के गण आज भी नाचते हैं,

जहाँ धर्म ढोल की थाप में धड़कता है,

और जहाँ मनुष्य दैव बन जाता है।

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