नरसिम्हा राव: वो कांग्रेस प्रधानमंत्री जिसे बीजेपी भी मानती है विकास का असली शिल्पकार

नरसिम्हा राव भारत के वो प्रधानमंत्री थे जिन्होंने उदारीकरण की नींव रखी, पर कांग्रेस ने भुला दिया। जानिए कैसे राव, वाजपेयी और मोदी ने बनाया नया भारत।

भारत के स्वतंत्रता-उत्तर इतिहास में यदि किसी प्रधानमंत्री को उसके अपने दल ने सबसे अधिक उपेक्षित किया और विरोधी दल ने सबसे अधिक सम्मान दिया तो वह नाम है पामुलापार्थी वेंकट नरसिम्हा राव

राव साहब कांग्रेस के वो प्रधानमंत्री थे जिन्होंने 1991 में एक ऐसे भारत को पुनर्जीवित किया जो कर्ज़ के बोझ तले डूबा हुआ था।

आज जब भारत विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है, तब उस सफ़र की असली शुरुआत राव साहब की दूरदृष्टि और साहसिक निर्णयों से ही हुई थी।

कांग्रेस का ‘पराया’ प्रधानमंत्री और बीजेपी की पसंद

यह इतिहास का विडंबनापूर्ण क्षण था कि कांग्रेस का प्रधानमंत्री बीजेपी का प्रिय बन गया।

जहाँ सोनिया गाँधी और उनके खेमे ने राव साहब को लगभग भुला दिया, वहीं भाजपा के नेताओं — विशेषकर अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने उन्हें हमेशा “राष्ट्रहित में काम करने वाला नेता” कहा।

राव साहब की मृत्यु (2004) के बाद कांग्रेस ने उनके पार्थिव शरीर को पार्टी मुख्यालय तक में नहीं रखा, जबकि भाजपा ने संसद में उन्हें सम्मान देने की परंपरा निभाई।

1990 की पृष्ठभूमि: भारत की डूबती अर्थव्यवस्था

1990 का भारत कर्ज़ में डूबा हुआ था। विदेशी मुद्रा भंडार सिर्फ तीन सप्ताह के आयात लायक रह गया था।

प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की सरकार ने IMF से मदद माँगी। IMF ने कर्ज़ तो दिया, लेकिन बदले में मुंबई बंदरगाह अमेरिका के लिए खोलने की शर्त रखी ताकि इराक के खिलाफ अमेरिकी सैन्य सामग्री वहाँ से जा सके।

उस दौर में भारत की स्थिति पाकिस्तान से भी बदतर थी। विदेशी कंपनियाँ निवेश से डरती थीं, और सरकार के पास वेतन देने तक के पैसे नहीं थे।

1991: राव साहब की एंट्री और आर्थिक सुधारों की नींव

1991 में राजीव गाँधी की हत्या के बाद राव साहब एक समझौता-प्रधानमंत्री के रूप में सत्ता में आए। परंतु उन्होंने जिस शांति और व्यावहारिकता से देश का नेतृत्व किया, उसने भारत की आर्थिक तकदीर बदल दी।

राव साहब हर क्षेत्र में पारंगत थे, पर वित्त क्षेत्र उनकी कमजोरी थी। उन्होंने तब आरबीआई के पूर्व गवर्नर डॉ. मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री बनाया।

मनमोहन सिंह ने IMF के बेलआउट पैकेज पर काम शुरू किया और भारतीय बाजार खोलने का प्रस्ताव रखा — जिसे हम आज “1991 के आर्थिक उदारीकरण” के रूप में जानते हैं।

कांग्रेस में विरोध, बीजेपी से समर्थन

राव और मनमोहन सिंह का सबसे अधिक विरोध कांग्रेस के भीतर से ही हुआ।

धीरुभाई अंबानी समेत कई उद्योगपति चिंतित थे कि अब प्रतिस्पर्धा का युग शुरू होगा।

पार्टी के वरिष्ठ नेता अर्जुन सिंह, शरद पवार और कई अन्य ने इस सुधार का विरोध किया।

जब संसद में मनमोहन सिंह भाषण देने उठे, तो कांग्रेस से अधिक शोर विपक्ष ने नहीं बल्कि उनकी अपनी पार्टी ने मचाया। तब राव साहब ने लालकृष्ण आडवाणी से संपर्क किया और स्थिति समझाई। आडवाणी ने राष्ट्रहित को प्राथमिकता देते हुए कहा —

“विपक्ष हैं तो विरोध करेंगे, पर राष्ट्रहित में सहयोग भी करेंगे।”

इसके बाद कई प्रस्तावों पर बीजेपी के सांसदों ने क्रॉस वोटिंग की। यही वजह थी कि भारत 1991 के आर्थिक सुधारों की ओर बढ़ सका।

1992: दो विध्वंस, दो कहानियाँ

साल 1992 भारत के इतिहास में दो बड़े विध्वंसों के लिए जाना जाता है —

एक, बाबरी मस्जिद का गिरना,

दूसरा, राव साहब का राजनीतिक विध्वंस।

राव पहले ही कल्याण सिंह सरकार के खिलाफ कैबिनेट बैठक बुला चुके थे, पर अर्जुन सिंह ने उसे “समय की बर्बादी” कहा।

जब बाबरी गिरी, तो वही लोग राव पर बीजेपी से मिलीभगत का आरोप लगाने लगे।

अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाने के लिए राव ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश की बीजेपी सरकारों को बर्खास्त कर दिया।

1994 तक प्रधानमंत्री को ऐसा करने का संवैधानिक अधिकार था और राव ने उसी का उपयोग किया।

उदारीकरण का असली शिल्पकार: राव या मनमोहन?

जनता के बीच 1991 के सुधारों का श्रेय मनमोहन सिंह को दिया जाता है, लेकिन नीति निर्माण और उद्योग मंत्रालय की बागडोर राव साहब के हाथ में थी।

मनमोहन सिंह ने खुद कहा था —

“मैंने तो केवल नक्शा पास किया था, डिज़ाइन राव साहब का था।”

राव साहब ने यह समझा कि दुनिया में प्रतिस्पर्धा के बिना भारत आगे नहीं बढ़ सकता। उन्होंने लाइसेंस राज खत्म किया, विदेशी निवेश को प्रोत्साहित किया, और उद्योगों को सरकारी बंधनों से मुक्त किया।

बीजेपी के साथ सम्मानजनक रिश्ता

राजनीति में जहाँ अधिकांश नेता विपक्ष को दुश्मन मानते हैं, राव साहब ने ऐसा कभी नहीं किया। वे अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी दोनों की प्रशंसा करते थे। उन्होंने संघ के काम को भी “अनुशासन और राष्ट्रसेवा का उदाहरण” कहा था।

जब 1996 में वाजपेयी सरकार 13 दिन में गिर गई, तब राव साहब ने उनसे कहा —

“अब राजनीतिक अछूत मत बनिए, सहयोगी जोड़िए।”

वाजपेयी ने यह सलाह गांठ बांध ली।

1998 में एनडीए गठबंधन सरकार बनाकर उन्होंने साबित किया कि राव की राजनीतिक दृष्टि कितनी गहरी थी।

परमाणु परीक्षण की कहानी: वाजपेयी से पहले राव

1998 में भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण किए पर बहुत कम लोग जानते हैं कि पहला असफल प्रयास राव साहब के समय ही हुआ था। उन्होंने सुरक्षा कारणों से परीक्षण को रोक दिया था, पर उस योजना को उन्होंने वाजपेयी को सौंप दिया।

वाजपेयी ने प्रधानमंत्री बनते ही वही योजना लागू की और भारत को परमाणु शक्ति घोषित किया।

बाद में उन्होंने खुद कहा था —

“यह राव जी का अधूरा सपना था, हमने बस उसे पूरा किया।”

राव की विदेश नीति: अमेरिका से आत्मनिर्भर भारत तक

1993 में कश्मीर में जब सेना ने आतंकी सफाई अभियान चलाया, तो पश्चिमी मीडिया ने भारतीय सेना पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगाए। मामला इतना बड़ा हो गया कि अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को दखल देना पड़ा।

राव साहब ने क्लिंटन से लंबी बातचीत के बाद अपनी आत्मकथा में लिखा —

“एक दिन ऐसा आएगा जब अमेरिकी राष्ट्रपति को नहीं, भारतीय प्रधानमंत्री को सफाई देने की आवश्यकता नहीं होगी।”

आज जब प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका के सामने आँख में आँख डालकर बात करते हैं, तो वह राव साहब की ही कल्पना का साकार रूप है।

कांग्रेस की उपेक्षा और इतिहास का अन्याय

राव साहब कांग्रेस के ऐसे प्रधानमंत्री थे जिनके निधन पर, ना दिल्ली में उनका अंतिम संस्कार हुआ, ना पार्टी ने श्रद्धांजलि दी। सोनिया गांधी के निर्देश पर उनका पार्थिव शरीर कांग्रेस मुख्यालय में रखने की अनुमति तक नहीं मिली।

विडंबना यह है कि जिस मनमोहन सिंह को उन्होंने खोजा, उन्हीं के प्रधानमंत्री बनने के बाद कांग्रेस ने राव का नाम इतिहास से मिटाने की कोशिश की।

परंतु इतिहास ऐसे नायकों को कभी भुला नहीं सकता। राव वो व्यक्ति थे जिन्होंने देश को आर्थिक गुलामी से मुक्त किया, और भारत को आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर किया।

राव, वाजपेयी और मोदी: तीन चरणों में भारत का निर्माण

भारत के विकास की कहानी तीन प्रमुख नेताओं से जुड़ी है —

1. नरसिम्हा राव (1991–96):

आर्थिक उदारीकरण और निजी क्षेत्र की आज़ादी।

2. अटल बिहारी वाजपेयी (1998–2004):

इंफ्रास्ट्रक्चर, सूचना प्रौद्योगिकी और वैश्विक सम्मान।

3. नरेंद्र मोदी (2014–वर्तमान):

आत्मनिर्भर भारत और वैश्विक नेतृत्व की पुनर्स्थापना।

राव साहब ने जो नींव रखी, वाजपेयी ने उसे मजबूत किया, और मोदी ने उस पर नई मंज़िलें खड़ी कीं।

निष्कर्ष: राव साहब – वो पराये जो आज अपनों से भी अपने हैं

पी.वी. नरसिम्हा राव सिर्फ एक प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक और राजनीतिक पुनर्जागरण के निर्माता थे। उनकी नीतियों ने भारत को विश्व मंच पर सम्मान दिलाया। कांग्रेस ने उन्हें भुलाने की कोशिश की, पर भारत उन्हें कभी नहीं भूल सकता।

आज जब भारत अमेरिका की आँखों में आँख डालकर बात करता है, विश्व अर्थव्यवस्था में अपनी शर्तों पर सौदे करता है, तो यह उसी “राव विचार” की सफलता है जिसकी कल्पना उन्होंने 1993 में की थी।

राव साहब वो पराये थे जो आज अपनों से भी अपने हैं। राजनीति में ऐसे अजातशत्रु बार-बार नहीं जन्म लेते।

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