नेपाल में सोशल मीडिया बैन से भड़का युवा जनविरोध, संसद पर हमला और गोलीकांड के बाद ओली सरकार संकट में। क्या यह शेख हसीना जैसी गलती साबित होगी?
प्रस्तावना: नेपाल का बदलता सियासी परिदृश्य
नेपाल की राजनीति एक बार फिर उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। प्रधानमंत्री के पी ओली ने सोशल मीडिया पर बैन लगाकर जिस तरह से युवाओं की आवाज़ को दबाने की कोशिश की, वह अब उन्हीं पर भारी पड़ती दिख रही है। संसद पर हमला, गोलीकांड और गृह मंत्री का इस्तीफ़ा—ये घटनाएँ इस बात का संकेत हैं कि नेपाल में असंतोष गहराता जा रहा है।
सोशल मीडिया सिर्फ़ मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक देशों में नागरिकों की आवाज़ है। इसे पूरी तरह बंद करने का निर्णय नेपाल की युवा पीढ़ी के लिए अस्वीकार्य साबित हुआ है। यही कारण है कि ज्यादातर प्रदर्शनकारी 15–25 वर्ष के छात्र और युवा रहे, जिन्होंने खुलकर सड़कों पर विरोध दर्ज कराया।
नेपाल में सोशल मीडिया बैन: ओली सरकार का कठोर फैसला
क्यों लगाया गया बैन?
नेपाल सरकार ने दावा किया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर “भ्रामक जानकारी” और “राजशाही समर्थक कैंपेन” तेजी से फैल रहे थे। सरकार को डर था कि इससे उनकी पकड़ कमजोर हो सकती है।
लेकिन इस प्रतिबंध के बाद भी चीनी ऐप टिकटॉक को चालू रखा गया। इस पर भी सरकार और नेताओं के खिलाफ़ हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। महंगे शौक़, लग्ज़री लाइफस्टाइल और नेताओं के भ्रष्टाचार से जुड़े वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिससे जनआक्रोश और तेज़ हो गया।
गोलीकांड और संसद हमला: विरोध का नया रूप
सोशल मीडिया बैन के खिलाफ़ प्रदर्शन पहले सड़कों तक सीमित थे, लेकिन हाल ही में संसद पर हमला कर उन्होंने एक नया मोड़ ले लिया।
• लगभग दो दर्जन छात्रों को पुलिस की गोली का शिकार होना पड़ा।
• राजधानी काठमांडू में आपातकालीन माहौल बन गया।
• देर रात हुई कैबिनेट बैठक में गृह मंत्री ने इस्तीफ़ा सौंप दिया।
फिर भी ओली अपने फ़ैसले पर अड़े रहे। उन्होंने साफ़ कहा कि “अगर इस्तीफ़ा भी देना पड़े, तब भी बैन नहीं हटेगा।” लेकिन उनके ही सहयोगी मंत्री उनकी इस ज़िद से सहमत नहीं दिखे।
नेपाल और बांग्लादेश की तुलना: शेख हसीना की गलती दोहराते ओली
इतिहास गवाह है कि जब सरकारें असहमति को दबाने की कोशिश करती हैं, तो विरोध और भी तेज़ होता है। बांग्लादेश में शेख हसीना ने भी यही गलती की थी।
• उन्होंने विपक्ष और असहमत लोगों को कठोरता से कुचलने की कोशिश की।
• सोशल मीडिया और विरोध प्रदर्शनों को पूरी तरह रोकने का प्रयास किया।
• नतीजा यह हुआ कि असंतोष इतना बढ़ गया कि उनकी सत्ता पर संकट गहरा गया।
नेपाल के हालात भी अब उसी दिशा में बढ़ते दिख रहे हैं। ओली ने जो कदम उठाया है, वह उन्हें राजनीतिक रूप से और भी कमजोर बना सकता है।
राजशाही समर्थकों का उभार: ज्ञानेंद्र शाह का समर्थन
सोशल मीडिया पर सबसे सक्रिय कैंपेन “राजशाही वापसी” का है।
• पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह ने खुले तौर पर इस आंदोलन का समर्थन किया है।
• नेपाल के ग्रामीण और पारंपरिक तबके में पहले से ही राजशाही समर्थक मौजूद थे।
• गोलीकांड के बाद इनकी आवाज़ और बुलंद हो गई है।
जो राजनीतिक दल अब तक ओली के साथ थे, वे भी इस घटना के बाद पीछे हटते नज़र आ रहे हैं।
नेपाल के युवा क्यों नाराज़ हैं?
1. रोज़गार और अवसरों की कमी
नेपाल की युवा पीढ़ी का बड़ा हिस्सा रोज़गार और अवसरों की तलाश में विदेशों का रुख़ करता है। सरकार से उन्हें कोई ठोस राहत नहीं मिलती।
2. अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला
सोशल मीडिया बैन को युवाओं ने अपनी आवाज़ पर ताला लगाने जैसा समझा। आज की पीढ़ी इंटरनेट और डिजिटल स्पेस पर निर्भर है।
3. भ्रष्टाचार और नेताओं की जीवनशैली
नेताओं और उनके परिवारों के महंगे शौक और आलीशान जीवनशैली ने ग़रीब और बेरोज़गार युवाओं के गुस्से को और बढ़ा दिया।
भारत और नेपाल: एक तुलनात्मक दृष्टिकोण
भारत में भी कई बार बड़े धरना-प्रदर्शन और आंदोलन हुए हैं।
• किसान आंदोलन इसका सबसे ताज़ा उदाहरण है।
• भारत सरकार ने कठोर बल प्रयोग से बचते हुए वार्ता और सहमति का रास्ता चुना।
• यही कारण है कि हालात नियंत्रण में रहे और लोकतांत्रिक संवाद बना रहा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अच्छी तरह समझते हैं कि अगर आंदोलनकारियों पर सीधी गोली या कठोर दमन किया जाए, तो आंदोलन और मजबूत होकर लौटता है। यही सबक नेपाल के नेताओं को भी सीखना होगा।
क्या नेपाल में राजनीतिक संकट गहराएगा?
अगर हालात जल्द नहीं सुधरे तो ओली सरकार पर गहरा संकट मंडरा सकता है।
• युवाओं का असंतोष थमने का नाम नहीं ले रहा।
• विपक्ष और राजशाही समर्थक इस मौके को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं।
• सरकार की ज़िद ही उसे सत्ता से बाहर कर सकती है।
निष्कर्ष: लोकतंत्र में असहमति ज़रूरी है
नेपाल के प्रधानमंत्री के पी ओली ने सोशल मीडिया बैन लगाकर जिस तरह अपनी सत्ता बचाने का प्रयास किया, वह उल्टा पड़ता दिख रहा है। गोलीकांड और संसद हमले ने हालात को और गंभीर बना दिया है।
लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि लोग अपनी राय, असहमति और विरोध खुलकर रख सकें। अगर सरकारें इस अधिकार को छीनती हैं, तो अंततः खुद के लिए खतरे का रास्ता खोलती हैं।
नेपाल को अब एक अहम मोड़ पर समझदारी दिखाने की ज़रूरत है, वरना हालात बांग्लादेश की तरह नियंत्रण से बाहर हो सकते हैं।
