जब पाकिस्तान की पराजय सिर्फ जंग नहीं, उसकी आत्मा की हार थी
एक समय था जब पाकिस्तान खुद को भारत का “बराबर का प्रतिद्वंद्वी” समझता था। 60-40 का संतुलन समझा जाता था। लेकिन “ऑपरेशन सिंदूर” और उसके बाद जो घटनाएं घटीं, उन्होंने पूरी दुनिया के सामने एक सच उजागर कर दिया — भारत और पाकिस्तान का संतुलन 90-10 का है, और वो भी भारत के पक्ष में।
भारत ने जब रावलपिंडी को अपनी मिसाइलों से भस्म कर दिया और किराना हिल्स को आग के हवाले किया, तब जाकर वैश्विक मंच को हरकत में आना पड़ा। लेकिन पाकिस्तान की यह असहायता अचानक नहीं आई। यह एक लम्बे इतिहास का परिणाम थी — एक ऐसा इतिहास जिसमें 1971 सबसे निर्णायक मोड़ साबित हुआ।
1971: जब पाकिस्तान के सभी मित्र साथ छोड़ गए
जब 3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान ने भारत पर युद्ध थोपने की कोशिश की, उसे यकीन था कि उसके मित्र राष्ट्र अमेरिका, चीन, सऊदी अरब, ईरान उसे बचा लेंगे। लेकिन हुआ कुछ और ही।
पाकिस्तानी राष्ट्रपति याहया खान के करीबी रहे खादिम हुसैन ने अपनी किताब में उस समय की सच्चाई को उजागर किया है, जिसे हर भारतीय को जानना चाहिए। युद्ध के अगले ही दिन भारतीय वायुसेना ने कराची को निशाना बनाना शुरू कर दिया। पाकिस्तान ने तुरंत शाह-ए-ईरान से मदद मांगी, क्योंकि उनके बीच समझौता था कि भारत के हमले की स्थिति में ईरान कराची एयरपोर्ट की सुरक्षा करेगा।
लेकिन शाह का जवाब चौंकाने वाला था:
“अब ये लड़ाई द्विपक्षीय नहीं रही…”
और उन्होंने हाथ पीछे खींच लिया।
एक के बाद एक दरवाज़े बंद होते गए
ईरान ही नहीं, शाह ने बलूचिस्तान में ईरानी सेना को तैनात कर दिया, पाकिस्तान के खिलाफ! हालांकि अमेरिकी दबाव में उन्हें पीछे हटना पड़ा।
सीरिया ने बहाना बनाया, लेबनान और सऊदी से जो रसद आनी थी, वह अफगानिस्तान में लूट ली गई और अफगान राजा जाहिर शाह ने चुप्पी साध ली। सऊदी ने युद्ध क्षेत्र में अपने लोग भेजने पर आपत्ति जताई।
पाकिस्तान की कूटनीतिक नींव दरक चुकी थी।
संयुक्त राष्ट्र में भी हुआ अपमान
जब भारत की सेना ने पूर्वी पाकिस्तान में कब्जा करना शुरू किया और ढाका का पतन सामने दिखने लगा, तब अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र में युद्धविराम प्रस्ताव लाया, जिसे सोवियत संघ ने ब्लॉक कर दिया।
पोलैंड ने एक नया प्रस्ताव रखा। पश्चिमी मोर्चे पर युद्ध रुके और पूर्वी मोर्चे पर राजनीतिक समाधान निकाला जाए। सोवियत तैयार था, लेकिन पाकिस्तान खुद अपने ही गले में फंदा डाल बैठा।
याहया खान ने रात के दो बजे न्यूयॉर्क में बैठे जुल्फिकार अली भुट्टो को फोन कर प्रस्ताव मानने को कहा। लेकिन भुट्टो की प्रतिक्रिया?
“शटअप!”
भुट्टो ने प्रस्ताव ठुकरा दिया और पाकिस्तान को भुगतना पड़ा इतिहास का सबसे बड़ा सैन्य आत्मसमर्पण… 93,000 सैनिकों के साथ।
भारतीय डीप स्टेट की सीख और पाक सेना-राजनीति की फूट
शायद यही वह क्षण था जब भारत ने समझ लिया कि पाकिस्तान की सेना और राजनीति एकजुट नहीं, बल्कि एक-दूसरे की दुश्मन हैं। जब सेना पिटे, तो नेता खुश होते हैं। और जब नेता हारें, तो सेना उन्हें बलि का बकरा बना देती है।
पाकिस्तान, एक देश नहीं बल्कि 70 के दशक की मजदूरों की फैक्ट्री है, जिसमें सेना मालिक है और नेता सिर्फ सुपरवाइजर।
अमेरिका और चीन का धोखा: अंतिम उम्मीद का पतन
अमेरिका को बड़ी मुश्किल से भारत के खिलाफ सातवां जंगी बेड़ा भेजने के लिए मनाया गया। लेकिन वह हिंद महासागर तक पहुंचता उससे पहले ही सोवियत संघ ने अपने जंगी जहाज भेज दिए और पूरे समुद्री क्षेत्र पर कब्जा कर लिया।
अमेरिका को अब कहने का मौका मिल गया “हम सिर्फ सिचुएशन स्टडी कर रहे हैं।”
चीन, जो पाकिस्तान का “ऑल वेदर फ्रेंड” कहलाता है, उसने तो पहले ही कह दिया था कि उसकी सेना युद्ध के लिए “तैयार नहीं” है।
2025: किराना हिल्स और रावलपिंडी की आग में जलती पाकिस्तान की छाया
आज जब भारत ऑपरेशन सिंदूर जैसी कार्रवाई करता है, तब दुनिया समझती है कि पाकिस्तान अब कोई तुलनीय शक्ति नहीं रहा। आज भारत 90 और पाकिस्तान 10 पर खड़ा है, वो भी केवल परमाणु बमों की बचे-खुचे आशा पर।
लेकिन पाकिस्तान के परमाणु बम भी उसकी सेना और नेताओं की लड़ाई के बीच कहीं खो चुके हैं।
निष्कर्ष: पाकिस्तान की हार एक चेतावनी है, एक सबक है
1971 की हार पाकिस्तान की सीमा में हुई एक सैन्य पराजय नहीं थी, वो एक राष्ट्र के तौर पर उसकी कूटनीतिक, सामरिक और मनोवैज्ञानिक मृत्यु थी। और इस मौत में उसके दोस्तों की पीठ पर खंजर की भूमिका थी।
आज भारत यदि फिर से निर्णायक कार्रवाई करता है, तो उसका आधार केवल सैन्य शक्ति नहीं बल्कि कूटनीतिक चतुराई और गहरी समझ है। पाकिस्तान, एक देश से ज़्यादा अब एक चेतावनी है, कि जब आपकी सेना और राजनेता अपने ही देश के खिलाफ खड़े हो जाएं, तो दुश्मन को कुछ खास करने की ज़रूरत नहीं रहती।
