पैंजिया और 20 लाख साल की बारिश ने पृथ्वी का भविष्य बदला। जानें कैसे कार्बन और ज्वालामुखी विस्फोट ने डायनासोर को जन्म दिया।
पैंजिया: जब पूरी धरती थी एक महाद्वीप
आज से लगभग 23 करोड़ साल पहले, पृथ्वी की तस्वीर बिल्कुल अलग थी। पूरी धरती एक ही विशाल भूमि-खंड थी, जिसे पैंजिया (Pangaea) कहा जाता है। यह चारों ओर से महासागर से घिरी एक सपाट भूमि थी, जिसके भीतर न तो बड़ी नदियाँ थीं और न ही समुद्र।
पैंजिया का भीतरी हिस्सा बेहद शुष्क था। समुद्र से उठी जलवाष्प बारिश बनकर वहीं गिर जाती, लेकिन अंदरूनी हिस्सों तक नहीं पहुँच पाती। परिणामस्वरूप, वहां का अधिकांश भूभाग मरुस्थल जैसा था।
सूखी धरती पर जीवन की चुनौतियाँ
वैज्ञानिकों ने उस दौर की चट्टानों में मौजूद कार्बन और ऑक्सीजन आइसोटोप का अध्ययन किया। परिणाम यह बताते हैं कि पैंजिया के भीतरी हिस्सों में वनस्पति लगभग शून्य थी। लाल रंग की तप्त चट्टानें यह संकेत देती हैं कि मौसम वर्षा-विहीन और बेहद शुष्क था।
ऐसे वातावरण में जीव-जंतु और पौधों का जीवित रहना कठिन था। धरती जैसे जीवन के लिए संघर्षरत एक विशाल रेगिस्तान बन चुकी थी।
20 लाख साल की बारिश: Carnian Pluvial Event
फिर अचानक, एक चमत्कार हुआ। आकाश में काले बादल छा गए और धरती पर शुरू हुई मूसलाधार बारिश। यह कोई साधारण वर्षा नहीं थी – यह लगातार चलने वाला 20 लाख वर्षों का वर्षा-काल था, जिसे वैज्ञानिक Carnian Pluvial Event कहते हैं।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि लगातार हर दिन बारिश होती रही, लेकिन अगले 20 लाख साल तक जलवायु लगातार आर्द्र बनी रही।
इस दौरान:
• वार्षिक वर्षा शून्य से बढ़कर औसतन 1400 मिमी तक पहुँच गई।
• एशिया और अमेरिका तक फैली विशाल नदियाँ बहने लगीं।
• चट्टानों में कार्बनिक अणुओं की संख्या बढ़ी, जो बड़े-बड़े पेड़ों की तेजी से वृद्धि का प्रमाण है।
धरती धीरे-धीरे एक मरुस्थल से हरी-भरी बगिया में बदल गई।
बारिश के पीछे का रहस्य: कार्बन की भूमिका
तो आखिर इतनी लंबी बारिश क्यों हुई? इसका उत्तर है – कार्बन।
चट्टानों के अध्ययन से पता चलता है कि उस समय वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा अत्यधिक बढ़ गई थी। कार्बन वायुमंडल को गर्म करता है और वाष्पीकरण की गति बढ़ा देता है, जिससे लगातार बारिश की संभावना बनी।
लेकिन सवाल यह है कि यह कार्बन आया कहाँ से?
ज्वालामुखी विस्फोट और “रेंगीलिया पठार”
वैज्ञानिक मानते हैं कि इसका कारण था एक महाविनाशकारी ज्वालामुखी विस्फोट।
• अलास्का से कनाडा तक फैला हुआ रेंगीलिया पठार (Wrangellia Plateau) उसी विस्फोट की देन है।
• यह विस्फोट लगभग 50 लाख वर्षों तक लगातार होता रहा।
• इस दौरान वातावरण में असीमित मात्रा में कार्बन छोड़ा गया।
• लावा की नदियाँ इतनी प्रचंड थीं कि उनकी गहराई 6 किलोमीटर तक मापी गई।
यानी, यह ज्वालामुखी विस्फोट ही 20 लाख साल की बारिश का असली कारण बना।
कार्बन संतुलन और जीवन का पुनर्जन्म
समय के साथ यह ज्वालामुखी शांत हुआ। धरती पर उगे विशाल पेड़-पौधों ने वातावरण से अतिरिक्त कार्बन सोख लिया और जलवायु धीरे-धीरे संतुलित हुई।
लेकिन इस बीच, बारिश ने धरती के जीवन का चेहरा पूरी तरह बदल दिया।
• इस घटना से पहले पृथ्वी पर डायनासोर की भागीदारी महज 5% थी।
• बारिश और हरियाली के बाद यह भागीदारी 95% तक पहुँच गई।
अर्थात्, यही घटना थी जिसने डायनासोर को पृथ्वी का शासक बनाया।
Carnian Pluvial Event का जीव-जगत पर प्रभाव
फॉसिल रिकॉर्ड यह बताते हैं कि इस महावृष्टि ने:
1. कई पुरानी प्रजातियों को नष्ट कर दिया।
2. नई प्रजातियों को जन्म दिया।
3. डायनासोर और अन्य सरीसृपों के लिए वातावरण आदर्श बना दिया।
यानी, यह वर्षा केवल पानी की नहीं थी, बल्कि जीवन के नए अध्याय की शुरुआत थी।
डायनासोर का स्वर्ण युग और अंत
20 लाख साल की इस वर्षा के बाद डायनासोर पृथ्वी पर प्रमुख जीव बन गए।
अगले कई करोड़ वर्षों तक वे भूमि के राजा रहे।
लेकिन करीब 6.5 करोड़ वर्ष पूर्व, एक विशाल उल्का पिंड ने धरती से टकराकर डायनासोर का सफाया कर दिया।
यानी, धरती का रंगमंच बदलता रहा। कभी बारिश ने खेल पलटा, तो कभी आकाश से आई मृत्यु ने।
निष्कर्ष: पृथ्वी का बदलता रंगमंच
पृथ्वी के इतिहास की यह घटना हमें सिखाती है कि प्रकृति का संतुलन किसी भी क्षण बदल सकता है। पैंजिया से Carnian Pluvial Event तक की यात्रा इस बात का प्रमाण है कि:
• कार्बन और जलवायु परिवर्तन जीवन का भविष्य तय करते हैं।
• विनाश ही नए जीवन की उत्पत्ति का कारण बन सकता है।
• पृथ्वी वास्तव में एक रंगमंच है, जहाँ मुख्य किरदार कभी भी बदल सकते हैं।
आज जब हम ग्लोबल वार्मिंग और कार्बन उत्सर्जन की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, तब यह प्राचीन घटना हमें आगाह करती है कि पृथ्वी का संतुलन बदलने में ज्यादा वक्त नहीं लगता।
