पाइथागोरस का परिमेय ब्रह्मांड और एक सनसनी
कल्पना कीजिए एक बूढ़ा आदमी समुद्र में डूबने से पहले अपनी जान की भीख माँग रहा है, और उसे घेर कर खड़ी भीड़ इस बात पर अड़ी है कि उसे पानी में फेंक देना चाहिए। उसका अपराध? उसने “दो का वर्गमूल” यानी √2 खोज लिया था।
यह कोई मिथक नहीं, बल्कि गणित के इतिहास की सबसे रहस्यमयी और हिला देने वाली सच्चाईयों में से एक है। ढाई हजार साल पहले, जब पाइथागोरस का गणितीय दर्शन एक धर्म की तरह फैला हुआ था, तब उसका ही एक शिष्य, “हिप्पासस”, एक ऐसी खोज कर बैठा जिसने पूरी व्यवस्था को हिला दिया।
पाइथागोरस: गणितज्ञ या पैगंबर?
पाइथागोरस का ब्रह्मांड
प्राचीन ग्रीस का यह रहस्यमयी व्यक्ति न सिर्फ गणितज्ञ था, बल्कि एक अध्यात्मिक गुरु भी माना जाता था। उसका मानना था कि ब्रह्मांड में हर चीज जैसे संगीत, गति, आकृति… सब कुछ “पूर्ण संख्याओं” और उनके अनुपात से नियंत्रित होती है। उसका सिद्धांत था कि दुनिया एक “परिमेय ब्रह्मांड” है। यानी ऐसा ब्रह्मांड जहाँ सब कुछ रैशनल हो।
उसके अनुयायी उसे भगवान-तुल्य मानते थे। इतना कि उन्होंने “पाइथागोरियन कल्ट” नाम से एक पंथ की स्थापना की और जीवन को पाइथागोरस की नियमावली के अनुसार चलाने लगे। ध्यान, मौन, शुद्धता, संगीत और गणित… इनकी साधना ही उनका धर्म था।
ध्यान से गणित की खोज!
पाइथागोरस की सोच में भारतीय तत्व भी झलकते हैं। वह मानता था कि गणित को जानने का श्रेष्ठ तरीका प्रयोग नहीं, बल्कि “ध्यान” है। उसका मानना था कि ब्रह्मांड के रहस्य आत्मा की शुद्धता और एकाग्रता से खुल सकते हैं।
हिप्पासस और उस भयानक गणितीय खोज की त्रासदी
वर्ग का विकर्ण और अपरिमेय संख्या
एक वर्ग की भुजा को एक यूनिट मानें। तो उसके विकर्ण का मान होता है √2। लेकिन यह √2 कोई आम संख्या नहीं है। यह एक “Aperimeya Sankhya” है, यानी ऐसी संख्या जिसे किसी दो पूर्ण संख्याओं के अनुपात से व्यक्त नहीं किया जा सकता।
इसे आसान भाषा में ऐसे समझें: आप किसी स्केल से इस विकर्ण को कितनी भी बार नापें, आप कभी भी इसे एक सटीक अनुपात में नहीं पा सकेंगे। यह “अनंत और अपूर्ण” होता है। ऐसा पहले कभी सोचा ही नहीं गया था।
पाइथागोरस के ब्रह्मांड की नींव हिली
हिप्पासस ने यह खोज कर पाइथागोरस के पूरे “परिमेय ब्रह्मांड” की नींव को चकनाचूर कर दिया। यह एक दार्शनिक और धार्मिक विद्रोह था। पाइथागोरस के अनुयायियों ने पहले इस खोज को छिपाने की कोशिश की। लेकिन जब बात न रुकी, तो हिप्पासस को “धार्मिक धोखेबाज़” घोषित कर दिया गया।
कई ऐतिहासिक दस्तावेज़ों में यह दर्ज है कि उसे एक समुद्री यात्रा के दौरान जहाज से समुद्र में फेंक दिया गया। सजा सिर्फ इतनी थी कि उसने “सच” बोलने की हिम्मत की थी।
पाइथागोरस की मृत्यु: मान्यता, मूर्खता या आत्म-विनाश?
बीन्स और पुनर्जन्म का भ्रम
पाइथागोरस मानता था कि मनुष्य की आत्मा मृत्यु के बाद “बीन्स” के रूप में जन्म ले सकती है। वह बीन्स के आंतरिक हिस्से को मानव जननांगों के समान मानता था, और इसलिए बीन्स के खेत में कदम रखना उसके लिए पूर्वजों का अपमान था।
जब एक भीड़ उसकी जान लेने के लिए दौड़ रही थी, तो रास्ते में एक बीन्स का खेत आया। आगे भागने के बजाय पाइथागोरस ठहर गया। और इसी “irrational belief” ने अंततः उसकी जान ले ली।
एक अनसुलझा सवाल: क्या वाकई हिप्पासस गलत था?
पाइथागोरस और उसके अनुयायियों के लिए गणित एक धर्म था। और धर्म में तर्क या प्रश्न की जगह नहीं होती। लेकिन हिप्पासस की खोज हमें यह सिखाती है कि सत्य को नकार कर कोई भी “आस्था” अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकती।
यह विडंबना नहीं तो क्या है कि पाइथागोरस, जिसने ब्रह्मांड को तर्क से समझने का सपना देखा था, अंत में अपने ही अवैज्ञानिक विश्वासों का शिकार बन गया।
निष्कर्ष: जब संख्याएं धर्म से टकराती हैं
यह कहानी केवल गणित की नहीं है। यह कहानी है ज्ञान बनाम अंधविश्वास की, तर्क बनाम पंथ की। और सबसे बड़ी बात, यह एक चेतावनी है कि कोई भी विचारधारा, चाहे वह कितनी ही लोकप्रिय क्यों न हो, जब सच्चाई का सामना करने से इनकार करती है तो वह खुद ही अपने अंत का बीज बो देती है।
शायद हिप्पासस को √2 की खोज के लिए मारा गया। लेकिन इतिहास गवाह है सच्चाई को कभी मारा नहीं जा सकता।
