बंगाल फाइल्स: विवादों और संघर्षों के बीच बॉक्स ऑफिस पर सफर

विवेक अग्निहोत्री की फिल्म द बंगाल फाइल्स विवादों, बॉक्स ऑफिस चुनौतियों और गहरी ऐतिहासिक कहानी के साथ चर्चा में है। जानिए पूरी रिपोर्ट।

परिचय: एक साहसी सिनेमाई प्रयास

5 सितंबर 2025 को रिलीज़ हुई विवेक अग्निहोत्री की फिल्म द बंगाल फाइल्स शुरुआत से ही सुर्खियों में रही। यह फिल्म 1940 के दशक में बंगाल में हुए सांप्रदायिक दंगों और नोआखली त्रासदी पर आधारित है। फिल्म का मकसद इतिहास के उस भूले-बिसरे अध्याय को सामने लाना है, जिसे आज की पीढ़ी बहुत कम जानती है। रिलीज़ से पहले और बाद तक फिल्म विवादों में रही, वहीं बॉक्स ऑफिस पर इसे कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा।

बॉक्स ऑफिस पर द बंगाल फाइल्स का प्रदर्शन

रिलीज़ के शुरुआती चार दिनों में फिल्म का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन इस प्रकार रहा:

• पहला दिन (शुक्रवार): ₹1.75 करोड़

• दूसरा दिन (शनिवार): ₹2.25 करोड़

• तीसरा दिन (रविवार): ₹2.75 करोड़

• चौथा दिन (सोमवार): ₹1.10 करोड़

कुल मिलाकर चार दिनों में फिल्म ने ₹7.85 करोड़ की कमाई की। वीकेंड पर थोड़ी बढ़ोतरी हुई, लेकिन सोमवार को भारी गिरावट से यह साफ है कि फिल्म को प्रचार और बड़े दर्शक वर्ग तक पहुँचने में कठिनाइयाँ आईं।

दर्शकों की प्रतिक्रिया और ऑक्युपेंसी रिपोर्ट

8 सितंबर 2025 को फिल्म की हिंदी ऑक्युपेंसी औसतन 18.24% रही।

• सुबह: 9.99%

• दोपहर: 17.10%

• शाम: 21.66%

• रात: 24.19%

यह दर्शाता है कि फिल्म धीरे-धीरे दर्शकों को आकर्षित कर पाई, लेकिन शुरुआती उत्साह की कमी रही। यह फिल्म मुख्य रूप से इतिहास और समाज से जुड़े गंभीर विषयों में रुचि रखने वाले दर्शकों को ही खींच पाई।

द बंगाल फाइल्स की कहानी और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

यह फिल्म 1946 के डायरेक्ट एक्शन डे और नोआखली दंगों की पृष्ठभूमि पर बनी है। उस समय बंगाल सांप्रदायिक तनाव, राजनीतिक दबाव और मानवीय त्रासदी का केंद्र था। फिल्म इन घटनाओं को सिर्फ ऐतिहासिक दस्तावेज़ के रूप में नहीं, बल्कि एक गहरी मानवीय कहानी के रूप में सामने लाती है।

फिल्म यह सवाल खड़ा करती है कि यदि हम अतीत को समझे बिना आगे बढ़ेंगे, तो क्या वर्तमान को सही दिशा दे पाएंगे?

दमदार कलाकारों का योगदान

फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसकी स्टार कास्ट है:

• मिथुन चक्रवर्ती – अनुभव और गहराई लाते हैं।

• अनुपम खेर – भावनात्मक पक्ष को मजबूत करते हैं।

• पल्लवी जोशी – महत्वपूर्ण किरदार के साथ कहानी को सशक्त बनाती हैं।

• दर्शन कुमार, सिमरत कौर, सास्वता चटर्जी, नमाशी चक्रवर्ती – फिल्म में अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं।

• राजेश खेरा, पुनीत इस्सर, दिव्येंदु भट्टाचार्य, सौरव दास, मोहन कपूर – सहायक भूमिकाओं से फिल्म को विश्वसनीय बनाते हैं।

इतने मजबूत कलाकारों के कारण फिल्म की ऐतिहासिक गहराई और भी असरदार हो जाती है।

विवादों और राजनीतिक बहसों में घिरी फिल्म

फिल्म की रिलीज़ से पहले ही इसे लेकर विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए थे। कई जगहों पर स्क्रीनिंग रोकने की माँग उठी। खासकर पश्चिम बंगाल में इसकी स्क्रीनिंग को लेकर राजनीतिक बहस तेज रही। निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से गुहार लगाई कि फिल्म को राज्य में दिखाने की अनुमति दी जाए।

इन विवादों ने फिल्म को सिर्फ सिनेमाई चर्चा नहीं, बल्कि राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बना दिया।

कड़ी प्रतिस्पर्धा: बागी 4 और द कॉन्ज्यूरिंग: लास्ट राइट्स

फिल्म का सफर आसान नहीं था।

• टाइगर श्रॉफ की बागी 4 – जबरदस्त एक्शन और युवा दर्शकों को खींचने वाली फिल्म रही।

• हॉलीवुड की द कॉन्ज्यूरिंग: लास्ट राइट्स – डर और थ्रिल चाहने वालों के लिए बड़ा आकर्षण साबित हुई।

इतनी बड़ी फिल्मों के बीच द बंगाल फाइल्स जैसी गंभीर और ऐतिहासिक विषय पर बनी फिल्म के लिए दर्शक जुटाना चुनौतीपूर्ण रहा।

क्या कहता है फिल्म का सामाजिक संदेश?

यह फिल्म सिर्फ एक ऐतिहासिक घटना का चित्रण नहीं है, बल्कि यह सवाल भी पूछती है कि समाज को साम्प्रदायिक हिंसा और राजनीतिक स्वार्थ से कैसे बचाया जा सकता है।

• यह दिखाती है कि राजनीति किस तरह आम लोगों की जिंदगी को प्रभावित करती है।

• यह दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है कि इतिहास की अनदेखी वर्तमान को कितना कमजोर बना सकती है।

• यह फिल्म मनोरंजन से ज्यादा सामाजिक चेतना को आगे बढ़ाती है।

भविष्य की संभावनाएँ और असर

भले ही फिल्म की शुरुआती कमाई औसत रही हो, लेकिन इसका असर लंबे समय तक रह सकता है।

• यदि इसे शैक्षणिक संस्थानों, फिल्म फेस्टिवल्स और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दिखाया जाए, तो इसकी पहुँच और बढ़ सकती है।

• यह फिल्म आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐतिहासिक दस्तावेज़ का काम कर सकती है।

• इसका मकसद केवल मुनाफा कमाना नहीं, बल्कि समाज में जागरूकता फैलाना है।

निष्कर्ष: विवादों से परे एक गंभीर सिनेमाई प्रयास

द बंगाल फाइल्स महज़ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक और सामाजिक बयान है। इसकी रिलीज़ भले ही विवादों और प्रतिस्पर्धा से घिरी रही हो, लेकिन इसका संदेश और महत्व दर्शकों के दिलों में जगह बना सकता है।

यह फिल्म उन लोगों के लिए है जो सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि सोचने और समझने लायक सिनेमा पसंद करते हैं। समय के साथ, यह फिल्म शायद भारतीय सिनेमा में एक गंभीर और साहसी प्रयोग के तौर पर याद की जाएगी।

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