आनंद फिल्म: ऋषिकेश मुखर्जी और राज कपूर की दोस्ती से जन्मी कालजयी कहानी

राज कपूर और ऋषिकेश मुखर्जी की पुरानी तस्वीर (बाएँ), तथा आनंद फिल्म में अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना का एक दृश्य (दाएँ)।

आनंद फिल्म की कहानी राज कपूर की बीमारी और ऋषिकेश मुखर्जी की भावनाओं से जुड़ी है। जानिए इस कालजयी क्लासिक के पीछे की असली प्रेरणा।

प्रस्तावना: जब सिनेमा ने जिंदगी को आईना दिखाया

बाबू मोशाय, ज़िंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं।

यह डायलॉग हिंदी सिनेमा के इतिहास में अमर है। 1971 में आई ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म आनंद ने दर्शकों को सिखाया कि जीवन को जीने का असली मतलब क्या होता है। लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि इस फिल्म की जड़ें राज कपूर की बीमारी और ऋषिकेश मुखर्जी की भावनाओं से जुड़ी हुई थीं।

आनंद फिल्म की असली प्रेरणा: राज कपूर की बीमारी

1998 के एक इंटरव्यू में ऋषिकेश मुखर्जी ने बताया था कि आनंद वास्तव में एक बायोग्राफिकल फिल्म थी।

उन्होंने कहा:

“आनंद बनाने का आईडिया मुझे तब आया था जब राज कपूर से मेरी दोस्ती हुई थी। राज उस समय बहुत बीमार पड़ गए थे।”

राज कपूर एक गंभीर पल्स संबंधी बीमारी से जूझ रहे थे, लेकिन उनकी सोच हमेशा सकारात्मक रही। जिस तरह फिल्म में आनंद (राजेश खन्ना) अपनी बीमारी से जूझते हुए भी हंसी और खुशियां बांटता है, वैसा ही वास्तविक जीवन में राज कपूर करते थे।

डॉक्टर भास्कर बनर्जी: ऋषिकेश मुखर्जी का प्रतिबिंब

फिल्म में डॉ. भास्कर बनर्जी (अमिताभ बच्चन) का किरदार सीधे ऋषिकेश मुखर्जी से प्रेरित था।

ऋषि दा खुद अपने दोस्त की बीमारी से बेहद चिंतित रहते थे। उन्होंने कहा था:

“मैं सोचता था कि अगर राज को कुछ हो गया तो मेरा क्या होगा? हम सबको राज की फिक्र रहती थी, लेकिन वो हमेशा मुस्कुराते रहते थे।”

इस गहरी दोस्ती और चिंता को ही उन्होंने डॉक्टर भास्कर के रूप में परदे पर उतार दिया।

राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन: कौन था असली लीड?

शूटिंग के दौरान ऋषि दा, राजेश खन्ना को प्यार से पिंटू बाबा बुलाते थे।

दिलचस्प बात यह है कि ऋषि दा के अनुसार,

• राजेश खन्ना फिल्म के सेकेंड लीड थे।

• असल लीड किरदार अमिताभ बच्चन का था, क्योंकि फिल्म की कहानी डॉक्टर भास्कर की नजर से कही जाती है।

कुछ लोगों ने उस समय अमिताभ को कास्ट करने पर सवाल उठाए थे। लेकिन ऋषि दा को पूरा विश्वास था कि इस रोल के लिए अमिताभ बच्चन परफेक्ट चॉइस हैं। यही एक सच्चे फिल्मकार की दूरदर्शिता थी।

30 दिनों में बनी कालजयी फिल्म

फिल्म आनंद की सबसे बड़ी खासियत यह भी है कि इसे मात्र 30 दिनों में पूरा कर लिया गया था।

यह ऋषिकेश मुखर्जी की क्राफ्टमैनशिप और अनुशासन का शानदार उदाहरण है।

दोस्ती और इत्तेफाक: ऋषि दा और मुकेश जी

ऋषिकेश मुखर्जी के जीवन से जुड़ा एक और भावुक किस्सा है—

27 अगस्त 2006 को 84 वर्ष की आयु में उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा।

और ठीक 30 साल पहले, 27 अगस्त 1976 को उनके घनिष्ठ मित्र और महान गायक मुकेश जी का निधन हुआ था।

मुकेश जी के बेटे नितिन मुकेश कभी फिल्ममेकर बनना चाहते थे और उन्होंने ऋषि दा के साथ बतौर असिस्टेंट काम भी किया था। लेकिन पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने यह ख्वाब छोड़ दिया।

आनंद फिल्म का संदेश: जीवन का उत्सव

आनंद केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि जीवन का उत्सव है।

यह सिखाती है कि:

• जीवन की लंबाई नहीं, उसकी गहराई मायने रखती है।

• बीमारी या मुश्किलें इंसान की मुस्कान नहीं छीन सकतीं।

• दोस्ती और इंसानियत ही असली ताकत है।

निष्कर्ष: एक अमर धरोहर

ऋषिकेश मुखर्जी और राज कपूर की दोस्ती से जन्मी आनंद फिल्म, आज भी दर्शकों को जीने का नजरिया सिखाती है। राजेश खन्ना की मुस्कुराहट और अमिताभ बच्चन की गंभीरता इस फिल्म को अमर क्लासिक बना देती है।

आज भी जब कोई कहता है—

“बाबू मोशाय, ज़िंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं”

तो यह संवाद दिल को छू जाता है और हमें याद दिलाता है कि आनंद दरअसल हम सबके भीतर है।

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