महेंद्र कपूर की जीवनी, पहला गीत “आधा है चंद्रमा” से लेकर फिल्मी सफर की रोचक कहानियां। जानिए हिंदी सिनेमा के इस महान गायक का सफर।
परिचय
हिंदी सिनेमा का सुनहरा दौर उन गायकों के बिना अधूरा है, जिन्होंने अपनी मधुर आवाज़ से लाखों दिलों को छुआ। इनमें से एक नाम है महेंद्र कपूर। वे न सिर्फ़ अपनी दमदार आवाज़ और सुरों के लिए याद किए जाते हैं, बल्कि उनकी गायकी ने फिल्मों को नई ऊंचाई भी दी। आज (27 सितंबर) उनकी पुण्यतिथि पर हम उनके जीवन, करियर और योगदान को विस्तार से जानेंगे।
शुरुआती जीवन और संगीत की लगन
महेंद्र कपूर का जन्म 9 जनवरी 1934 को अमृतसर में हुआ था। बचपन से ही उन्हें गाने का शौक था। स्कूली दिनों में ही वे स्टेज पर गाते थे और धीरे-धीरे उनकी पहचान बनने लगी। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि छात्र जीवन के दौरान ही उन्हें फिल्मों में गाने का मौका मिला।
उन्होंने पहली बार फिल्म “मदमस्त” के लिए अपनी आवाज़ दी। हालांकि, उस वक्त उन्हें कोई मेहनताना नहीं मिला। इसके अलावा, कॉलेज के दिनों में भी वे कुछ फिल्मों जैसे ललकार, दीवाली की एक रात और हीर में बिना पारिश्रमिक के गा चुके थे। यह स्पष्ट करता है कि महेंद्र कपूर के लिए गायकी महज़ पेशा नहीं बल्कि जुनून थी।
1948 का ऑल इंडिया सिंगिंग कॉम्पटीशन
साल 1948 में एक ऑल इंडिया सिंगिंग कॉम्पटीशन आयोजित हुआ था। यह प्रतियोगिता भारतीय संगीत के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुई।
• इस कॉम्पटीशन के निर्णायक पैनल में हिंदी सिनेमा के महान संगीतकार सी. रामचंद्र, वसंत देसाई, मदन मोहन, नौशाद और अनिल बिस्वास शामिल थे।
• महेंद्र कपूर ने इस प्रतियोगिता में भाग लिया और विजेता बने।
• इनाम के तौर पर तय हुआ कि विजेता को इन संगीतकारों की फिल्मों में गाने का मौका मिलेगा। यह मौका पूरा गीत भी हो सकता था या केवल एक लाइन भी।
यही वह क्षण था जिसने महेंद्र कपूर के फिल्मी करियर का रास्ता खोला।
पहला फिल्मी गीत – “आधा है चंद्रमा रात आधी”
महान फिल्मकार वी. शांताराम की फिल्म नवरंग (1959) में महेंद्र कपूर को पहला बड़ा मौका मिला।
• इस फिल्म का मशहूर गीत “आधा है चंद्रमा रात आधी” उनकी आवाज़ में रिकॉर्ड हुआ।
• संगीतकार सी. रामचंद्र ने उन्हें यह अवसर दिया।
गीत से जुड़ा रोचक किस्सा
जब इस गीत की रिकॉर्डिंग होनी थी, महेंद्र कपूर बहुत घबराए हुए थे। उनके साथ आशा भोसले भी थीं।
• रिहर्सल के दौरान कई बार सी. रामचंद्र ने “कट” बोला, लेकिन नर्वस महेंद्र को समझ नहीं आया और वे गाते रहे।
• बाद में सी. रामचंद्र ने कहा कि “महेंद्र की आवाज़ पैनल तक नहीं पहुंच रही है।”
• आशा भोसले ने आपत्ति जताई और कहा कि वे तो बिल्कुल सही गा रहे हैं।
• जांच के बाद पता चला कि माइक्रोफोन की एक केबल डिस्कनेक्टेड थी, जिसकी वजह से आवाज़ पैनल तक नहीं पहुंच रही थी।
यह घटना महेंद्र कपूर के करियर की शुरुआती चुनौतियों और उनकी नर्वसनैस को दर्शाती है।
महेंद्र कपूर और देशभक्ति गीतों की पहचान
महेंद्र कपूर को हिंदी सिनेमा में देशभक्ति गीतों के लिए विशेष रूप से याद किया जाता है। उनकी आवाज़ में गाए गए गीत सीधे दिल को छू जाते थे और देशभक्ति की भावना जगाते थे।
कुछ अमर गीत:
• मेरे देश की धरती सोना उगले (उपकार)
• जय बोलो बेहनाओं की
• चलो बुलावा आया है
मधुर रोमांटिक गीतों की पहचान
सिर्फ़ देशभक्ति ही नहीं, बल्कि महेंद्र कपूर ने रोमांटिक और भावनात्मक गीतों में भी कमाल किया। उनकी आवाज़ में मिठास और गहराई थी।
• नीले गगन के तले
• चंद्रमा तोड़ा मदन
• चलो एक बार फिर से
उनके गानों ने दिलों में खास जगह बनाई।
महेंद्र कपूर और मंचीय गायकी
महेंद्र कपूर सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं रहे। वे स्टेज परफॉर्मेंस में भी बेहद लोकप्रिय थे। भारत ही नहीं, विदेशों में भी उन्होंने शो किए और भारतीय संगीत का परचम लहराया।
पुरस्कार और सम्मान
महेंद्र कपूर की प्रतिभा को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।
• फिल्मफेयर अवार्ड – “उपकार” फिल्म के गीत मेरे देश की धरती के लिए
• पद्मश्री पुरस्कार – भारतीय संगीत में योगदान के लिए
• कई बार उन्हें “भारत कुमार” मनोज कुमार के स्थायी गायक के तौर पर भी याद किया जाता है।
व्यक्तिगत जीवन
महेंद्र कपूर बेहद सरल और मिलनसार इंसान थे। उनकी गायकी में जितनी मिठास थी, उनके स्वभाव में भी उतनी ही सहजता। वे अपने समकालीन गायकों का सम्मान करते थे और कभी प्रतिस्पर्धा की भावना से प्रभावित नहीं हुए।
27 सितंबर 2008 – एक युग का अंत
27 सितंबर 2008 को मुंबई में महेंद्र कपूर का निधन हो गया। उनके निधन ने संगीत जगत को गहरा आघात दिया। लेकिन उनकी आवाज़ आज भी गूंजती है और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती है।
निष्कर्ष
महेंद्र कपूर भारतीय सिनेमा के उन गिने-चुने गायकों में से हैं, जिनकी आवाज़ दशकों बाद भी नई लगती है। चाहे देशभक्ति गीत हों, रोमांटिक धुनें हों या मंचीय प्रस्तुतियां – हर जगह उन्होंने अपनी पहचान बनाई। उनकी यात्रा हमें यह सिखाती है कि जुनून और मेहनत से कोई भी सपना सच किया जा सकता है।
आज उनकी पुण्यतिथि पर हम उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए यही कह सकते हैं:
महेंद्र कपूर सिर्फ एक गायक नहीं, बल्कि हिंदी संगीत का अमिट अध्याय हैं।
