ऋषिकेश मुखर्जी की पुण्यतिथि पर जानिए उनकी सादगी, फिल्मों के प्रति जुनून, शतरंज का शौक और सितारों से जुड़ी अनसुनी कहानियाँ।
परिचय
भारतीय सिनेमा के इतिहास में कई दिग्गज फिल्मकार हुए, लेकिन ऋषिकेश मुखर्जी (Hrishikesh Mukherjee) का नाम सबसे अलग और खास है। उन्होंने ऐसी फ़िल्में बनाईं जिनमें स्टारकास्ट नहीं, बल्कि कहानियाँ और इंसानियत चमकती थीं। उनकी फ़िल्में आनंद, गुड्डी, अभिमान, गोलमाल, खट्टा-मीठा जैसे क्लासिक्स थीं।
आज उनकी पुण्यतिथि (27 अगस्त, 2006) पर हम न सिर्फ़ उनकी फ़िल्मों, बल्कि उनके व्यक्तित्व, सादगी और जीवन से जुड़ी उन कहानियों को याद कर रहे हैं, जो उन्हें एक इंसान के रूप में और भी महान बनाती हैं।
ऋषिकेश मुखर्जी की सादगी और सरलता
ऋषिकेश मुखर्जी को जानने वाले बताते हैं कि वे बेहद साधारण, डाउन-टू-अर्थ इंसान थे। हमेशा कुर्ता-पजामा पहनते, और उनकी काली फिएट कार ही उनकी पहचान थी। यही कार उन्होंने अपनी फ़िल्म आनंद में भी इस्तेमाल की थी।
उनका समुद्र के सामने बना बंगला जितना खूबसूरत था, उतना ही सादा भी। वे ज्यादातर समय ग्राउंड फ्लोर के लिविंग रूम में बिताते थे, जहाँ उन्होंने कई फ़िल्मों के सीन भी शूट किए।
सेट पर सब बराबर – ऋषि दा की सोच
ऋषि दा के सेट पर कोई “स्टार ट्रीटमेंट” नहीं होता था। चाहे कितना भी बड़ा अभिनेता क्यों न हो, उसे वही व्यवहार मिलता जो बाकी लोगों को मिलता।
नितिन मुकेश, जो कुछ साल उनके असिस्टेंट रहे, बताते हैं कि मोहन स्टूडियो में लकड़ी की टेबल और बेंच पर सब एक साथ बैठकर खाना खाते थे… चाहे असिस्टेंट हों या बड़े-बड़े सितारे।
बुरी – ऋषि दा की सबसे प्यारी साथी
फ़िल्मों और परिवार के अलावा, ऋषिकेश मुखर्जी के जीवन में एक खास जगह थी उनकी पालतू डॉगी “बुरी” की।
• वे जो भी खाते, बुरी को खिलाते।
• बाहर से जब नूडल्स, सूप या चिकन मंगाते तो वो खास बुरी के लिए भी होता।
• जब बुरी की मृत्यु हुई, तो ऋषि दा का दिल टूट गया था।
शतरंज – ऋषि दा का सबसे बड़ा शौक
फ़िल्मों के अलावा उन्हें सिर्फ़ एक चीज़ से लगाव था – शतरंज।
• सेट पर कैमरा और लाइट बंद करवा कर वे खेलते।
• शर्त होती – जब तक वे जीत न जाएं, खेल खत्म नहीं होगा।
• एक जूनियर आर्टिस्ट उनसे बेहतर खेलता था, और ऋषि दा जब हार जाते तो कहते – “तुमने चीटिंग की है!”
• वे तब तक खेलते रहते जब तक उसे हरा न दें।
शतरंज खेलते समय वे एक मासूम बच्चे जैसे हो जाते थे।
सिनेमा के सच्चे मास्टर
ऋषिकेश मुखर्जी को अक्सर “वन मैन आर्मी” कहा जाता था।
• उनकी स्वीकृति के बिना कोई काम पूरा नहीं माना जाता।
• सिनेमैटोग्राफर जयवंत पठारे जैसे दिग्गज भी उनसे अंतिम हरी झंडी लेते थे।
• राज कपूर, उनके सबसे अच्छे दोस्त, अपनी हर फ़िल्म का स्पेशल ट्रायल शो ऋषि दा के लिए रखते थे।
राज कपूर बंगाली जानते थे और फ़िल्म दिखाने के बाद उनसे कहते –
“मुझसे जो हो सका, मैंने कर दिया। अब आप बताइए कि क्या बदलना चाहिए।”
और ऋषि दा मुस्कुराकर उन्हें सुझाव देते।
भाषा और संवाद – बंगाली का जादू
ऋषि दा सोचते और बोलते दोनों बंगाली में थे। इसलिए उनके साथ काम करने वालों को बंगाली सीखनी पड़ती।
नितिन मुकेश बताते हैं कि उन्होंने सिर्फ़ 15 दिनों में बंगाली सीख ली थी और आज भी वे कई गायकों से उसी भाषा में बात करते हैं। गुलज़ार जैसे लेखकों के साथ भी उनके संवाद अक्सर बंगाली में ही होते थे।
ऋषिकेश मुखर्जी – सादगी में महानता
ऋषिकेश मुखर्जी का जीवन हमें ये सिखाता है कि महानता सिर्फ़ सफलता से नहीं, बल्कि विनम्रता, इंसानियत और रिश्तों से तय होती है।
वे न केवल एक उत्कृष्ट फ़िल्मकार थे बल्कि एक ऐसे इंसान थे जिनके लिए हर इंसान बराबर था, चाहे वो स्टार हो या असिस्टेंट।
निष्कर्ष
आज जब हम बॉलीवुड में भव्यता और ग्लैमर देखते हैं, तो ऋषिकेश मुखर्जी की सादगी हमें याद दिलाती है कि सिनेमा का असली जादू सादगी और भावनाओं में है। उनकी फ़िल्में और उनकी कहानियाँ आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा बनी रहेंगी।
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❓ FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
1. ऋषिकेश मुखर्जी की सबसे प्रसिद्ध फ़िल्में कौन-सी हैं?
उनकी मशहूर फ़िल्में आनंद, अभिमान, गुड्डी, गोलमाल, चुपके-चुपके, खट्टा-मीठा और मिली हैं।
2. ऋषिकेश मुखर्जी की पालतू डॉगी का नाम क्या था?
उनकी सबसे प्यारी डॉगी का नाम बुरी था।
3. ऋषिकेश मुखर्जी को फ़िल्मों के अलावा और किस चीज़ का शौक था?
उन्हें शतरंज खेलने का बहुत शौक था और वे तब तक खेलते रहते जब तक जीत न जाएं।
4. राज कपूर और ऋषिकेश मुखर्जी का रिश्ता कैसा था?
दोनों गहरे दोस्त थे। राज कपूर अपनी हर फ़िल्म का ट्रायल शो सबसे पहले ऋषिकेश मुखर्जी को दिखाते थे।
5. ऋषिकेश मुखर्जी की मृत्यु कब हुई थी?
उनका निधन 27 अगस्त 2006 को हुआ था। संयोग से इसी तारीख़ को 30 साल पहले (1976) पार्श्वगायक मुकेश जी का भी देहांत हुआ था।
