भारत के स्वतंत्रता संग्राम और भारतीय सेना के इतिहास में कई ऐसे नाम हैं जो समय की धूल में दब गए। परंतु ठाकुर नाथू सिंह जैसे व्यक्तित्व को भुलाना न सिर्फ अन्याय है, बल्कि हमारे इतिहास के प्रति बेईमानी भी। राजपूताना के एक रौबदार घराने से आए इस वीर सपूत ने न केवल अंग्रेजों के खिलाफ अपने तेवर दिखाए, बल्कि आजादी से पहले ही भारत के पहले आर्मी चीफ चुने गए थे। तो फिर क्यों उनका नाम इतिहास की किताबों में उतना चमक नहीं पाया? यही रहस्य आज हम आपके सामने खोलते हैं।
ठाकुर नाथू सिंह का बचपन और पृष्ठभूमि
राजपूताना की धरती पर जन्मे नाथू सिंह जयमल राठौड़ के वंशज थे। बचपन में ही माता-पिता का साया उठ गया, पर रिश्तेदारी डूंगरपुर राज्य के राजा से थी। वही उनके अभिभावक बने। बचपन से ही उनका मिज़ाज कठोर और देशभक्ति से भरा था। अंग्रेजों का राज उन्हें नागवार गुजरता था। उन्होंने तय कर लिया था कि बड़े होकर सेना में भर्ती होंगे और विदेशी हुकूमत के खिलाफ लड़ेंगे।
ब्रिटिश इंडियन आर्मी और पहला विद्रोह
जब राजा साहब ने उन्हें ब्रिटिश इंडियन आर्मी जॉइन करने की सलाह दी तो उन्होंने प्रशिक्षण के लिए ब्रिटेन का रुख किया। वहाँ पहले ही दिन मेस में उन्होंने अंग्रेज अधिकारियों को आईना दिखा दिया।
जहाँ अंग्रेज कहते थे – “क्या अब हम इन कालों के साथ भोजन करेंगे?”
वहीं नाथू सिंह का जवाब था – “मैं इतने ऊँचे राजपूत खानदान का हूँ, किंग्स और प्रिंस के साथ भोजन करने वाला। इन गोरों के साथ क्यों भोजन करूँ?”
यह जातिवाद नहीं था, बल्कि अंग्रेजों को उनके ही औज़ार से हराना था। वे समझते थे कि अंग्रेज कुलीनता और रक्त-शुद्धि के नाम पर भारतीयों को अपमानित करते हैं। उन्होंने उसी मानसिकता को उलटकर उनका घमंड तोड़ा।
अंग्रेज अफसरों से सीधी टक्कर
ट्रेनिंग खत्म होने पर जब एक ब्रिटिश कमांडिंग ऑफिसर ने कहा – “हम आपको इसलिए प्रशिक्षित कर रहे हैं ताकि कल को अगर हम चले गए तो कोई शिक्षित वर्ग सेना संभाल सके।”
तो नाथू सिंह का सीधा जवाब था – “अंग्रेजों के आने से पहले भी भारत में सेनाएँ थीं और बेहतरीन थीं। और रही बात ‘यदि हम चले गए’ की, तो आपको जाना ही है। आज ही चले जाइए।”
ऐसी हिम्मत उस दौर में बिरले ही दिखा सकते थे।
राजनीतिक रैलियों में नाथू सिंह का न्यायपूर्ण रवैया
एक बार इलाहाबाद में उन्हें आदेश मिला कि वे नेहरू की अगुवाई वाली रैली को रोकें। उन्होंने नियमों का पालन करते हुए रैली को एक सड़क से तो रोका, लेकिन अपनी देखरेख में दूसरे रास्ते से निकलने दिया। अंग्रेज अफसर नाराज़ हुए, पर जांच में वे हर बार बरी हुए। उनकी ईमानदारी और नियमों की पकड़ इतनी मजबूत थी कि कोई उनका बाल भी बाँका नहीं कर पाया।
कांग्रेस में शामिल होने का प्रस्ताव और मोतीलाल नेहरू की सलाह
नाथू सिंह ने एक समय सेना छोड़ कांग्रेस में जाने का मन बनाया। लेकिन मोतीलाल नेहरू ने उन्हें ऐसा करने से रोका। उनका कहना था – “देश को आजादी के बाद तुम्हारे जैसे अफसरों की ज्यादा ज़रूरत होगी।”
पहले भारतीय आर्मी चीफ बनने का अवसर
आजादी से पहले ही अंतरिम सरकार ने तय कर लिया था कि देश का पहला आर्मी चीफ ठाकुर नाथू सिंह होंगे। लेकिन जब आजादी आई तो उन्होंने खुद इस पद को ठुकरा दिया क्योंकि उनसे वरिष्ठ करियप्पा मौजूद थे। वे नहीं चाहते थे कि भारत की सेना की नींव ही परंपरा तोड़कर रखी जाए।
नेहरू से सीधी बहस
एक मीटिंग में जब नेहरू ने कहा कि भारतीय अफसर अनुभवहीन हैं और ब्रिटिश अफसरों को कुछ साल तक रहना चाहिए, तो नाथू सिंह ने सवाल किया –
“प्रधानमंत्री बनने का कितना अनुभव था आपके पास? यदि आप नगण्य अनुभव में देश चला सकते हैं तो हम बीस साल के अनुभव के साथ सेना क्यों नहीं संभाल सकते?”
यह जवाब उनकी निर्भीकता और आत्मविश्वास का प्रमाण है।
आजादी के बाद मोहभंग
स्वतंत्रता के बाद भी वे सरकार को पत्र लिखकर सुझाव देते रहे। पर अब सत्ता पर अंग्रेज नहीं, भारतीय नेता बैठे थे। उन्होंने एक जगह लिखा – “अंग्रेज मुझे पसंद नहीं थे, पर मैंने कोई ऐसा अंग्रेज नहीं देखा जो अपने देश और नियमों के प्रति प्रतिबद्ध न हो। अफसोस है कि यही बात मैं भारतीय नेताओं के लिए नहीं कह सकता।”
निष्कर्ष: भूला दिया गया एक नायक
ठाकुर नाथू सिंह आजादी के बाद भारत के पहले आर्मी चीफ बन सकते थे। पर उन्होंने खुद वरिष्ठता की परंपरा को बनाए रखते हुए उस पद को त्याग दिया। यह त्याग और राष्ट्रवाद का अद्भुत उदाहरण है। इतिहास की किताबें अक्सर उनके योगदान को अनदेखा कर देती हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि वे भारतीय सेना और आजाद भारत के उन गुमनाम नायकों में से हैं जिन्होंने हर स्तर पर देश के लिए लड़ाई लड़ी।
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FAQs (People Also Ask)
प्रश्न 1: ठाकुर नाथू सिंह कौन थे?
उत्तर: ठाकुर नाथू सिंह भारतीय सेना के एक वरिष्ठ अफसर थे, जिन्हें आजादी से पहले ही पहला आर्मी चीफ चुना गया था।
प्रश्न 2: ठाकुर नाथू सिंह भारत के पहले आर्मी चीफ क्यों नहीं बने?
उत्तर: वे इस पद के लिए चुने गए थे, लेकिन वरिष्ठता की परंपरा बनाए रखने के लिए उन्होंने यह पद जनरल करियप्पा को दे दिया।
प्रश्न 3: ठाकुर नाथू सिंह का अंग्रेजों के साथ कैसा रवैया था?
उत्तर: वे अंग्रेजों को उनके ही तर्कों से मात देते थे और कभी भी उनकी गुलामी स्वीकार नहीं की।
प्रश्न 4: क्या ठाकुर नाथू सिंह स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल थे?
उत्तर: उन्होंने प्रत्यक्ष राजनीति में शामिल होने की बजाय सेना में रहकर ही राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूत किया।
