भारत बनाम चीन: इंजीनियरिंग राष्ट्र बनाम वकील प्रधान समाज – तकनीकी विकास की असली लड़ाई

भारत बनाम चीन की विकास यात्रा में बड़ा फर्क है – चीन इंजीनियरिंग राष्ट्र बना, जबकि भारत अब मोदी के नेतृत्व में वही दिशा पकड़ रहा है।

प्रस्तावना

जब 2020 में कोविड-19 ने दुनिया को हिलाकर रख दिया, तब कुछ देशों ने इसे संकट माना और कुछ ने इसे अवसर में बदल दिया। प्रसिद्ध विचारक डैन वांग (Dan Wang) अपने लेख “Breakneck” (10-11 अक्टूबर संस्करण) में बताते हैं कि कोविड के शुरुआती दौर में चीन और अमेरिका की सोच में कितना गहरा अंतर था।

अमेरिकी कंपनियों ने यह सवाल पूछा — “क्या मास्क और कॉटन स्वैब्स बनाना हमारी core competence है?” 

और उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि नहीं, यह उनका काम नहीं।

वहीं, चीन की कंपनियों ने सोचा “हमारी core competence पैसा कमाना है (making money is our core competence)।”

इसलिए उन्होंने अगले ही दिन अपने कारखानों में मोबाइल, कार, या टीवी बनाना बंद कर दिया और मास्क, PPE किट, कॉटन स्वैब्स, वेंटिलेटर बनाना शुरू कर दिया।

परिणाम यह हुआ कि जब पूरी दुनिया चिकित्सा उत्पादों की कमी से जूझ रही थी, तब चीन ने पूरी दुनिया को PPE, मास्क और मेडिकल सामान की सप्लाई की। यानी, चीन ने न केवल संकट का समाधान किया, बल्कि उस संकट से आर्थिक समृद्धि भी हासिल की।

चीन का इंजीनियरिंग राष्ट्र बनने का सपना

2008 में जब चीन ने बुलेट ट्रेन जैसी उच्च गति रेल परियोजना शुरू की, तब कई विशेषज्ञों ने इसे “विलासिता” बताया। आलोचक बोले “एक गरीब देश को बुलेट ट्रेन की क्या ज़रूरत?”

लेकिन चीन ने यह समझ लिया था कि बुनियादी ढांचे में निवेश केवल सड़कें या ट्रेनें नहीं बनाता, बल्कि एक आत्मविश्वास पैदा करता है। बुलेट ट्रेनें सिर्फ लोगों को तेज़ नहीं बनातीं वे राष्ट्र को गर्व देती हैं।

आज चीन की हाई-स्पीड रेल नेटवर्क दुनिया में सबसे बड़ी है। इससे न केवल यात्रियों का समय बचा, बल्कि व्यापारिक संबंध, शिक्षा, पर्यटन और नवाचार की गति कई गुना बढ़ गई। ट्रैफिक जाम, सड़क दुर्घटनाएं और प्रदूषण घटा और एक नई “modern identity” बनी।

यही कारण है कि डैन वांग चीन को एक “engineering state” कहते हैं। एक ऐसा राष्ट्र जो समस्याओं को कानून या बहस से नहीं, बल्कि इंजीनियरिंग समाधानों से हल करता है।

अमेरिका और भारत का वकील प्रधान समाज (Lawyerly Society)

इसके उलट, अमेरिका को वांग “lawyerly society” कहते हैं… यानी ऐसा समाज जहां हर निर्णय कानून, मुकदमे, और नियमों में उलझा रहता है। अमेरिकी सिस्टम उद्यमशीलता की जगह लॉबिंग को पुरस्कृत करता है। समृद्ध लोग अपनी स्थिति को बनाए रखने के लिए कानूनों की आड़ में प्रतिस्पर्धा को रोक देते हैं।

भारत में भी स्थिति कुछ वैसी ही है। हमारी राजनीति और प्रशासन अक्सर “वकील प्रधान” मानसिकता में फंस जाता है। जहां कोई भी बड़ा सुधार “जनहित याचिका” और “आंदोलन” के नाम पर रोक दिया जाता है।

ऐसे में, जब मोदी सरकार तकनीकी क्रांति लाने की कोशिश करती है — बुलेट ट्रेन, सेमीकंडक्टर, स्पेस, या बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में — तो एक वर्ग जानबूझकर इसका विरोध करता है।

चीन से सीख: “चील के साथ उड़ो, तो गौरैया भी ऊंची उड़ान भरती है”

चीन की सोच बड़ी सीधी है —

“अगर एक गौरैया चील के साथ उड़ना सीख जाए, तो वह भी ऊंची उड़ान भरती है।”

जब किसी समाज में एक बड़ी चुनौती आती है, तो बाकी समाज खुद को ऊपर उठाने लगता है।

अगर एक कारखाना बुलेट ट्रेन बनाता है, तो दूसरे कारखाने का श्रमिक भी सीखता है कि उसे बेहतर तकनीक अपनानी है। अगर एक शहर स्मार्ट सिटी बनता है, तो आस-पास के कस्बे भी सुधरते हैं। यह “competitive upliftment” ही चीन की ताकत है और यही भारत को सीखने की ज़रूरत है।

भारत में बुलेट ट्रेन और तकनीकी विकास पर बहस

भारत में भी जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुलेट ट्रेन परियोजना की शुरुआत की, तब वही पुराना तर्क सुनाई दिया — “एक गरीब देश को ऐसी महंगी ट्रेन की क्या ज़रूरत?”

ऐसा कहने वाले अधिकतर वे नेता हैं जो खुद इंजीनियर हैं पर उनकी सोच “इंजीनियरिंग” की नहीं, बल्कि “राजनीतिक वकील” जैसी है।

उन्हें बुलेट ट्रेन में अवसर नहीं, केवल विरोध का मंच दिखता है। वे नहीं समझते कि ऐसी परियोजनाएँ न केवल परिवहन सुधारती हैं, बल्कि देश की तकनीकी क्षमता, रोजगार, और आत्मविश्वास भी बढ़ाती हैं।

भारत का तकनीकी उदय: मोदी का इंजीनियरिंग विज़न

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने शासनकाल में भारत को एक “तकनीकी राष्ट्र” में बदलने का संकल्प लिया है।

उन्होंने पारंपरिक राजनीति से हटकर एक नई दिशा दी — जो innovation-driven governance है।

कुछ प्रमुख कदम:

1. नोटबंदी (2016) – कैश आधारित भ्रष्टाचार को खत्म करने का प्रयास।

2. GST (2017) – एक समान कर प्रणाली जिसने अर्थव्यवस्था को एकीकृत किया।

3. UPI और आधार – डिजिटल लेन-देन को विश्व का सबसे सरल माध्यम बनाया।

4. DBT (Direct Benefit Transfer) – सब्सिडी सीधे लाभार्थी के खाते में।

5. आर्टिकल 370 का समापन – राष्ट्र के एकीकरण का साहसिक निर्णय।

6. सेमीकंडक्टर मिशन, स्पेस मिशन, मेक इन इंडिया – उच्च तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम।

इन सुधारों ने भारत के पुराने अभिजात वर्ग (elite class) को अस्थिर कर दिया जो दशकों से व्यवस्था पर नियंत्रण बनाए हुए थे। वहीं, मोदी ने गरीबों को नई शक्ति दी, जो अब “new elite class” बनकर उभर रहे हैं — जिन्होंने अब बैंक अकाउंट, गैस सिलेंडर, घर, और आत्मसम्मान पाया है।

“रचनात्मक विनाश” (Creative Destruction): मोदी मॉडल का सार

मोदी सरकार का सबसे बड़ा योगदान यही है कि उन्होंने भारत में एक “creative destruction” किया है। उन्होंने उस पुरानी व्यवस्था को तोड़ा जो विशेषाधिकारों पर टिकी थी।

पुराने अभिजात वर्ग — राजनेता, वकील, NGO लॉबी, मीडिया हाउस, और “intellectual” तबका…

जो दशकों तक विकास के नाम पर अपनी constituency (अपने हित समूह) बनाए हुए थे,

अब उन्हें डर है कि आम जनता अगर तकनीकी रूप से सशक्त हो गई, तो उनका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। इसीलिए वे बार-बार “विकास”, “बुलेट ट्रेन”, “टेक्नोलॉजी” या “अडानी-अंबानी” जैसे शब्दों से नफरत जताते हैं।

“अडानी-अंबानी” बनाम “टाटा-बिड़ला” वाली सोच

कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने कहा कि “उन्हें अडानी-अंबानी का कोई प्रोडक्ट नहीं दिखता।” यह बयान दर्शाता है कि भारत का पुराना राजनीतिक वर्ग अभी भी “औद्योगिक राष्ट्र” की नई सोच को नहीं समझ पाया है।

टाटा-बिड़ला ने जब तेल-साबुन-नमक बनाए, तब वे भी राष्ट्रनिर्माता थे। आज अडानी और अंबानी बिजली, डेटा, बंदरगाह, सौर ऊर्जा और नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर बना रहे हैं — जो आज के युग का “नया तेल” है। लेकिन जो लोग बीते युग की मानसिकता में जी रहे हैं, वे इस बदलाव को “खतरा” मानते हैं, न कि “अवसर”।

पर्यावरण और इंजीनियरिंग – चीन का दृष्टिकोण

डैन वांग लिखते हैं कि चीन पर्यावरण संरक्षण को बाधा नहीं मानता, बल्कि इंजीनियरिंग से समाधान खोजता है। अगर प्रदूषण है, तो वह नए फिल्टर बनाएगा; अगर नदी सूख रही है, तो वह नई नहर या डैम बनाएगा। यानी, समस्या को समाप्त करने की जगह समस्या को हल करने पर ध्यान देना यही इंजीनियरिंग दृष्टिकोण है।

भारत को भी यही दृष्टिकोण अपनाना होगा।

“पर्यावरण के नाम पर विकास रोको” वाली सोच छोड़कर “विकास के साथ पर्यावरण सुधारो” की दिशा में चलना होगा।

भारत को इंजीनियरिंग राष्ट्र बनाने के लिए आवश्यक कदम

1. शिक्षा में तकनीकी झुकाव बढ़ाना – इंजीनियरिंग, AI, और डिजाइन पर केंद्रित पाठ्यक्रम।

2. “Make in India” को और आक्रामक बनाना – सेमीकंडक्टर, स्पेस, और बायोटेक में निवेश।

3. Infrastructure diplomacy – एशिया और अफ्रीका में भारतीय तकनीकी परियोजनाएँ।

4. नौकरशाही में इंजीनियरिंग माइंडसेट – नीति में परिणाम-उन्मुख सोच।

5. Startup और innovation-friendly ecosystem – जहां युवा प्रयोग कर सकें, असफल हों और फिर सीखें।

निष्कर्ष: भारत की नई उड़ान

चीन की तरह भारत भी अब “इंजीनियरिंग राष्ट्र” बनने की दिशा में अग्रसर है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस परिवर्तन की नींव रख दी है। अब आवश्यकता है कि भारत के नीति-निर्माता, उद्योगपति, और नागरिक सभी मिलकर “वकील प्रधान मानसिकता” से बाहर आएं और “इंजीनियरिंग मानसिकता” अपनाएं।

क्योंकि आज की दुनिया में जो राष्ट्र इनोवेशन करता है, वही नेतृत्व करता है। भारत के पास जनसंख्या, प्रतिभा, और राजनीतिक स्थिरता तीनों हैं। अब बस जरूरत है उस डैन वांग वाले दृष्टिकोण की —

जहां हर भारतीय कंपनी यह कह सके:

“हमारी core competence पैसा कमाना नहीं, राष्ट्र बनाना है।”

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