पूरा बॉलर या अधूरा ऑलराउंडर: टीम इंडिया की एक गलती जो सब कुछ बिगाड़ सकती है!

टीम इंडिया की सिलेक्शन रणनीति पर सवाल — पूरा बॉलर या अधूरा ऑलराउंडर? जानिए क्यों ये गलती हमें बड़े मैचों में बर्बाद कर सकती है।

परिचय: टीम इंडिया की चयन नीति पर बड़ा सवाल

क्रिकेट के मैदान पर आज सिर्फ बल्लेबाज़ी या गेंदबाज़ी से मैच नहीं जीते जाते, बल्कि सही टीम कॉम्बिनेशन से जीते जाते हैं। लेकिन टीम इंडिया इन दिनों एक अजीब ट्रेंड में फंसी हुई है… पूरा बॉलर छोड़कर अधूरा ऑलराउंडर खिलाना।

हाल ही में खेले गए दूसरे टी-20 मैच में जब हर्षित राणा को अर्शदीप सिंह की जगह खिलाया गया, तो क्रिकेट प्रेमियों के बीच एक नई बहस शुरू हो गई — क्या ये प्रयोग सही है?

राणा ने करीब तीस रन बनाए, लेकिन सवाल अब भी वहीं है… क्या एक बॉलर की जगह ऐसा खिलाड़ी खेलना समझदारी है जो सिर्फ “थोड़ा-थोड़ा सब कर सकता है”?

1. दुनिया के नंबर वन बॉलर को बाहर रखना — क्या ये सही रणनीति है?

किसी भी टीम में जब आप एक अच्छे बॉलर को सिर्फ इसलिए बाहर रखते हैं कि कोई नया खिलाड़ी “जरूरत पड़ने पर 20 रन बना सकता है”, तो यह सिलेक्शन नहीं, जोखिम होता है।

अर्शदीप सिंह जैसे बॉलर, जो पिछले कुछ महीनों में भारत के लिए मैच-विनर साबित हुए हैं, को सिर्फ इस कारण बैठाना कि “हर्षित राणा थोड़ी बहुत बैटिंग भी कर सकते हैं”, क्रिकेट की बुनियादी समझ के खिलाफ जाता है।

क्यों ये निर्णय गलत है?

• क्वालिटी बॉलर सिर्फ रन रोकने के लिए नहीं, बल्कि विकेट निकालने के लिए होता है।

• बिट्स एंड पीसेस ऑलराउंडर्स (यानी जो सब कुछ थोड़ा-थोड़ा करते हैं) कभी भी बड़े मैच में भरोसेमंद नहीं होते।

• 135 रन जैसी छोटी टोटल को डिफेंड करवाने के लिए मैच-विनर बॉलर चाहिए, न कि “कभी-कभार रन बनाने वाला”।

2. दुबे और राणा — दो-दो ‘हाफ ऑलराउंडर’ क्यों?

जब आप एक टीम में एक ऐसा प्लेयर रखते हैं जो थोड़ा बॉलिंग और थोड़ा बैटिंग कर सकता है, तो वो एक एक्सपेरिमेंट माना जाता है। लेकिन जब आप ऐसे दो प्लेयर एक साथ खिलाते हैं — जैसे शिवम दुबे और हर्षित राणा — तो यह टीम की बैलेंस को पूरी तरह बिगाड़ देता है।

कल्पना कीजिए

अगर इस टीम में राणा की जगह अर्शदीप और दुबे की जगह रिंकू सिंह को जोड़ दिया जाए तो अचानक टीम ज़्यादा मजबूत, भरोसेमंद और संतुलित लगने लगती है। क्योंकि वहाँ आपके पास विकेट निकालने वाला बॉलर और डेथ ओवर में फिनिश करने वाला स्पेशलिस्ट होता है।

3. रन रोकने वाला या विकेट लेने वाला बॉलर?

आज का क्रिकेट रन रोकने से नहीं, विकेट निकालने से जीता जाता है। लेकिन जब कोई पार्ट-टाइम बॉलर जैसे शिवम दुबे ओपनिंग बॉलिंग करते हैं, तो उनका मकसद सिर्फ “रन रोकना” होता है विकेट लेना नहीं।

Unpopular लेकिन सच

• एशिया कप फाइनल में दुबे ने शुरुआती ओवर डाले और रन कम दिए, तो इसे “मास्टरस्ट्रोक” कहा गया।

• लेकिन अगर उसी स्थिति में अर्शदीप होते, तो दो विकेट निकाल सकते थे और मैच वहीं खत्म हो सकता था।

• पाकिस्तान जैसी टीम के खिलाफ शुरुआती विकेट का महत्व सिर्फ रन रोकने से कहीं ज़्यादा होता है।

4. नीतीश रेड्डी: करियर का गलत इस्तेमाल

यही कहानी नीतीश रेड्डी के साथ भी दोहराई जा रही है। टीम मैनेजमेंट उन्हें “ऑलराउंडर” की तरह इस्तेमाल करना चाहता है, लेकिन सवाल है — क्या वो असल में ऐसे खिलाड़ी हैं?

समस्या यह है कि:

• वो न तो ऐसा बॉलर हैं जो आपको लगातार विकेट दिला सकें।

• और न ही ऐसा बल्लेबाज़ जिसे आप आठवें नंबर पर भेजकर “मैच फिनिश” की उम्मीद करें।

अगर आप उन्हें हर मैच में 8वें नंबर पर उतारेंगे, तो वो कभी अपनी बल्लेबाज़ी साबित नहीं कर पाएंगे। ऊपर के बल्लेबाज़ अच्छा खेल गए तो उनके पास खेलने का मौका नहीं रहेगा, और अगर जल्दी आउट हो गए तो उनके पास “स्टैंड करने” वाला कोई नहीं होगा।

इस तरह टीम उन्हें एक सीमित भूमिका में कैद कर रही है, जो उनके करियर के लिए घातक साबित हो सकती है।

5. टीम कॉम्बिनेशन की पुरानी गलती दोहराना

भारतीय क्रिकेट का इतिहास देखें तो ये गलती नई नहीं है। हमने यही गलती ऑस्ट्रेलिया टेस्ट टूर में की थी, जब टीम तीन ही प्रॉपर बॉलर्स के साथ उतरी थी।

इंग्लैंड में भी यही गलती दोहराई गई और नतीजा वही, असंतुलित टीम और हार की कगार पर खड़ी स्थिति।

हालात तो सिराज ने बचा लिए

वो तो अच्छा हुआ कि हैरी ब्रूक ने एक गलत शॉट खेल दिया और मोहम्मद सिराज ने बेहतरीन स्पेल डाल दिया, वरना नतीजा कुछ और होता। आज वही गलती टीम फिर से वाइट-बॉल क्रिकेट में कर रही है, सिर्फ इस सोच में कि “हर खिलाड़ी थोड़ा बहुत सब कुछ कर ले।”

6. छोटे फॉर्मेट में गलती छिप सकती है, लेकिन बड़ी टीमों के खिलाफ नहीं

आज वर्ल्ड क्रिकेट में बड़ी टीमें कम रह गई हैं लेकिन जो हैं, वो एक्सपोज़ कर देती हैं कि आपकी टीम कितनी बैलेंस्ड है। कमज़ोर टीमों के खिलाफ आप “bits & pieces players” के साथ जीत सकते हैं, लेकिन ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड या साउथ अफ्रीका जैसी टीमों के सामने ये रणनीति ढह जाती है।

क्यों?

• क्योंकि वहाँ हर खिलाड़ी स्पेशलिस्ट होता है।

• वहाँ कोई खिलाड़ी सिर्फ इसलिए नहीं खेलता कि वो “थोड़ा-थोड़ा सब कर लेता है।”

• और वहीं हम “ऑलराउंडर” के नाम पर टीम में ऐसे खिलाड़ियों को भर देते हैं जो किसी एक क्षेत्र में भी एक्सपर्ट नहीं हैं।

7. संतुलन का असली मतलब क्या है?

क्रिकेट में संतुलन का मतलब यह नहीं है कि हर खिलाड़ी थोड़ा-थोड़ा सब करे। संतुलन का मतलब है हर खिलाड़ी अपनी भूमिका में मास्टर हो।

उदाहरण

• अगर आपके पास 5 बॉलर हैं, तो उनमें से कम से कम 3 ऐसे हों जो किसी भी दिन मैच जिता सकें।

• अगर आपके पास 6 बल्लेबाज़ हैं, तो उनमें 2 ऐसे हों जो किसी भी दिन अकेले मैच निकाल सकें। यही असली संतुलन है न कि 7 बल्लेबाज़ और 3 अधूरे बॉलर।

8. भारत को क्या करना चाहिए? (Practical Solution)

अगर टीम इंडिया को वर्ल्ड कप या बड़ी सीरीज़ में अच्छा प्रदर्शन करना है, तो उसे कुछ मूलभूत बातें समझनी होंगी:

1. स्पेशलिस्ट बॉलर की अहमियत को समझें। अर्शदीप, सिराज जैसे खिलाड़ियों को “बैटिंग नहीं आती” के कारण बाहर बैठाना मूर्खता है।

2. ऑलराउंडर की परिभाषा तय करें।
हार्दिक पंड्या या रवींद्र जडेजा जैसे खिलाड़ी असली ऑलराउंडर हैं — जो दोनों विभाग में मैच जिता सकते हैं।

3. युवा खिलाड़ियों का सही इस्तेमाल करें।
नीतीश रेड्डी जैसे खिलाड़ियों को गलत पोज़िशन में मत फंसाइए। उन्हें वहीं खेलने दीजिए जहाँ वो चमक सकते हैं।

4. संतुलन के नाम पर समझौता बंद करें। टीम में सिर्फ इसीलिए किसी को जगह न दें कि “कभी ज़रूरत पड़ी तो काम आ जाएगा।” क्रिकेट में “कभी ज़रूरत पड़ेगी” वाले खिलाड़ी, अक्सर “जब ज़रूरत होती है” तब नाकाम रहते हैं।

निष्कर्ष: एक गलती जो सब कुछ बर्बाद कर सकती है

भारत के पास प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। समस्या सिर्फ इतनी है कि हम सही समय पर सही खिलाड़ी को सही भूमिका नहीं दे पाते। “पूरा बॉलर या अधूरा ऑलराउंडर” की यह बहस सिर्फ तकनीकी नहीं, यह टीम की रणनीति की आत्मा से जुड़ी है।

अगर हमने अभी भी यह समझ नहीं बदली कि “थोड़ा-थोड़ा सब कुछ करने वाले” खिलाड़ी कभी “पूरा कुछ जीताने” वाले नहीं बनते, तो आने वाले बड़े टूर्नामेंट्स में टीम इंडिया का वही हश्र होगा जो कई बार पहले हो चुका है —

क्वालिटी से ज़्यादा क्वांटिटी पर भरोसा करने की गलती।

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