भारत-ब्रिटेन फ्री ट्रेड डील: मोदी सरकार की कूटनीतिक चालों ने बदल दी वैश्विक व्यापार की बिसात

दो दिन, चार बड़ी जीतें… भारत की नई विदेश नीति की धमक

बीते दो दिन भारतीय राजनीति और कूटनीति के लिए किसी चलचित्र जैसे रहे। घटनाएं ऐसी घटीं कि लगा जैसे प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति की पटकथा अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच चुकी हो। भारत और ब्रिटेन के बीच ऐतिहासिक फ्री ट्रेड डील पर सहमति, मालदीव का भारत के पक्ष में झुकाव, मोदी की 75% अप्रूवल रेटिंग, और इंदिरा गांधी का रिकॉर्ड तोड़ने वाला सफर। इन सबने मिलकर भारतीय राजनीति को एक नई ऊर्जा दे दी।

यह कहानी सिर्फ काग़ज़ों में साइन हुई संधियों की नहीं है, यह कहानी है सालों की मेहनत, टकराते हितों और नेतृत्व की दूरदृष्टि की, जो आज भारत को विश्व मंच पर एक निर्णायक ताकत बना रही है।

ब्रिटेन-भारत फ्री ट्रेड एग्रीमेंट: जो 2016 से लटका था, वो अब हकीकत बन गया

ब्रेक्ज़िट के बाद ठहराव, अब 150 अरब डॉलर के व्यापार की उम्मीद

2016 में डेविड कैमरन ने जब भारत-ब्रिटेन फ्री ट्रेड डील का ऐलान किया था, तो दिवाली की तारीख तय की गई थी। लेकिन ब्रेक्ज़िट की आँधी में सब उड़ गया। उसके बाद ब्रिटेन में पाँच प्रधानमंत्री आए, लेकिन यह डील कभी धरातल पर नहीं उतर सकी।

आज भारत और ब्रिटेन का व्यापार 50 अरब डॉलर के आसपास है, लेकिन अब, इस फ्री ट्रेड एग्रीमेंट के बाद, ये आंकड़ा 150 अरब डॉलर तक जा सकता है। इससे ब्रिटेन, चीन के बाद भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन सकता है।

अमेरिका के टैरिफ से पहले की चालाकी

यह डील ऐसे वक्त हुई है जब अमेरिका अपने आयातों पर टैरिफ बढ़ाने की योजना में है। इसलिए, भारत ने ऑस्ट्रेलिया, यूएई के बाद ब्रिटेन के साथ भी तेजी दिखाई। इससे पहले की वैश्विक मंदी या अमेरिकी संरक्षणवाद भारत के व्यापार को प्रभावित करे, सरकार ने प्री-इम्प्टीव एक्शन ले लिया।

बिखरी कोशिशें, एकजुट नेतृत्व: मोदी-स्टार्मर की जुगलबंदी

भीतर की खींचतान—जयशंकर, गोयल और राजनाथ

सौदेबाज़ी आसान नहीं थी। एस जयशंकर पहले खालिस्तानी चरमपंथ को मुद्दा मानते रहे, पीयूष गोयल मेक इन इंडिया के पक्ष में सख्त रुख अपनाए हुए थे, और राजनाथ सिंह बीच में एयरोस्पेस डील्स लेकर आ गए। यही कारण रहा कि यह डील अटकती रही।

जब नेतृत्व सामने आया, तभी डील हुई

ब्रिटेन की ओर से भी ऐसा ही हाल था। लेकिन जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ब्रिटिश पीएम कीयर स्टार्मर खुद सामने आए, तभी जाकर बात बनी। यही सबक है, जब तक नेतृत्व खुद सामने नहीं आता, कूटनीति में ताले नहीं खुलते।

मालदीव की घर वापसी: ‘इंडिया आउट’ से ‘इंडिया ऑन’ तक का सफर

2023 में जब राष्ट्रपति मुईज़्ज़ू सत्ता में आए, तो नारा था—“India Out”। लेकिन जब उन्हें मालूम पड़ा कि उनके मंत्रालय की मेजें तक भारत में बनी हैं, तो सच्चाई सामने आई। भारत ने 5000 करोड़ रुपये का ऋण देकर उन्हें अपने पाले में रखा।

यह रकम सुनने में ज्यादा नहीं लगती, लेकिन छोटे देशों में छोटे निवेश भी बड़ी रणनीतिक बढ़त बन जाते हैं। यदि भारत इस क्षण को ना पकड़ता, तो मालदीव जैसे छोटे देश चीन के ऋण-जाल में फँसकर बंदरगाह खो देते।

मोदी की अप्रूवल रेटिंग 75%: सात साल से दुनिया में पहले स्थान पर

एक वैश्विक चमत्कार

साल 2025 और प्रधानमंत्री मोदी की अप्रूवल रेटिंग 75% पर स्थिर। ये आंकड़ा केवल भारत नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर लोकप्रियता को दर्शाता है। मारग्रेट थैचर 4 साल टॉप पर रहीं थीं, लेकिन मोदी जी सात साल से लगातार शीर्ष स्थान पर हैं।

इस अप्रत्याशित लोकप्रियता ने यह साबित किया है कि सत्ता विरोधी लहर के बावजूद लोकप्रियता कायम रखी जा सकती है, अगर सरकार जन-हित में निर्णायक फैसले ले।

इंदिरा गांधी का रिकॉर्ड टूटा: अब सबसे लंबे लोकतांत्रिक शासन का ताज मोदी के नाम

रिकॉर्ड कब टूटा, किसी को खबर ही नहीं हुई

बहुतों को यह लगता रहा कि इंदिरा गांधी का रिकॉर्ड 2020 में ही टूट गया होगा, लेकिन आधिकारिक तौर पर अब यह मान्यता मिली है कि मोदी जी ने इंदिरा गांधी को पीछे छोड़ दिया है।

इंदिरा गांधी का कार्यकाल अधिकतर आपातकाल, धांधली और सत्ता संघर्ष से जुड़ा रहा, जबकि मोदी का कार्यकाल एक स्थिर लोकतांत्रिक नेतृत्व का प्रतीक रहा है। अगले साल तक, मोदी पं. नेहरू का रिकॉर्ड भी पीछे छोड़ देंगे।

अब क्या करना बाकी है: खाड़ी, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका पर निगाह

भारत अब खाड़ी देशों (सऊदी अरब, ओमान, बहरीन) और अफ्रीकी तथा लैटिन अमेरिकी देशों के साथ व्यापार युद्ध स्तर पर बढ़ाए, क्योंकि ये वे क्षेत्र हैं जहाँ एक बार निर्यात शुरू हुआ तो वो रुकता नहीं।

इन इलाकों में भारत के लिए विशाल संभावनाएं हैं, न केवल आर्थिक, बल्कि रणनीतिक भी। चीन की आक्रामक कूटनीति को संतुलित करने के लिए, भारत को अब नई मंडियों में गहराई से उतरना होगा।

निष्कर्ष: बूँद-बूँद से घड़ा भरता है, मगर भरना तभी संभव है जब हाथ में लोटा हो

ब्रिटेन के साथ हुई डील, मालदीव की वापसी, अप्रूवल रेटिंग का कमाल और इतिहास रचते मोदी। इन सबने मिलकर यह संदेश दिया है कि भारत की विदेश नीति अब केवल प्रतिक्रियावादी नहीं, बल्कि प्रगतिशील और आक्रामक है।

अब वक्त है नई दिशाओं में व्यापार, सुरक्षा और रणनीतिक साझेदारियाँ गहराने का। ब्रिटेन की डील केवल एक शुरुआत है। अब विश्व की बिसात पर भारत अपनी चालें तय कर रहा है, और इस बार राजा बनने की चाह भी है और तैयारी भी।

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