ब्रिगेडियर नवीन और मरून बेरेट की गर्वगाथा

भारतीय सेना के पैराट्रूपर्स अपने कमांडरों के साथ समूह फोटो में, सभी सैनिक कैमोफ्लाज वर्दी और मरून बेरेट पहने हुए।

प्रस्तावना: परंपरा और अनुशासन के बीच टकराव

भारतीय सेना केवल हथियारों से नहीं, बल्कि परंपरा और गौरवशाली मूल्यों से चलती है। हर प्रतीक, हर चिह्न, हर रंग का अपना महत्व होता है। सेना के सबसे बहादुर दस्ते पैराट्रूपर्स (Para SF) का गर्व है उनका मरून बेरेट। एक रंग जो सिर्फ कपड़े का टुकड़ा नहीं, बल्कि बलिदान, साहस और अनुशासन का प्रतीक है।

इसी मरून बेरेट को लेकर भारतीय सेना में हाल ही में एक घटना घटी जिसने पूरे मुख्यालय तक हलचल मचा दी।

50 पैरा ब्रिगेड की मुलाकात: एक अहम पल

जब भारतीय सेना के प्रमुख जनरल मनोज पांडे ने 50 पैरा ब्रिगेड का दौरा किया, तो उनके साथ ब्रिगेडियर नवीन, कमांडर 50 पैरा ब्रिगेड मौजूद थे।

वे अपने मरून बेरेट में सैनिकों के सामने खड़े थे, मानो पूरे दस्ता का आत्मविश्वास उसी टोपी में समाया हो।

मगर तभी, एक वरिष्ठ अधिकारी ने धीमे स्वर में उन्हें याद दिलाया – “सर, नए प्रोटोकॉल के मुताबिक ब्रिगेडियर और उससे ऊपर के अधिकारी मरून बेरेट नहीं पहन सकते।”

ब्रिगेडियर नवीन का जवाब: आत्मसम्मान की ज्वाला

ब्रिगेडियर नवीन ने शांत किंतु दृढ़ स्वर में उत्तर दिया – 

“सर, मरून बेरेट पैराट्रूपर्स का जीवन है। अगर मैं, एक पैरा ब्रिगेड कमांडर, इसे नहीं पहनूँगा, तो मेरे जवान क्या सोचेंगे? यह मेरी पहचान है, और इस कुर्सी पर बैठने का अधिकार भी।”

उनकी बात में सिर्फ जिद नहीं थी, बल्कि सैनिकों के मनोबल का सवाल था।

ग्रुप फोटो का क्षण: परंपरा बनाम प्रोटोकॉल

बाद में जब ग्रुप फोटो का समय आया, तो वही वरिष्ठ अधिकारी फिर बोले। मजबूरी में ब्रिगेडियर नवीन ने अपनी मरून बेरेट उतार दी और उसे पास खड़े एक जवान को सौंप दिया।

वे चीफ़ ऑफ आर्मी स्टाफ के साथ तस्वीर में बैठे, लेकिन इस बार नंगे सिर।

यह तस्वीर दिल्ली पहुंची और चर्चा का विषय बन गई।

मुख्यालय की प्रतिक्रिया: सम्मान या अपमान?

दिल्ली पहुंचने के बाद, ADGPI टीम ने जब यह तस्वीर देखी तो कहा – “इसे प्रेस में नहीं भेज सकते। यह चीफ़ के बगल में बैठे एक ब्रिगेडियर का अपमान जैसा लगेगा।”

मामला इतना संवेदनशील हो गया कि इसे सीधे वाइस चीफ़ ऑफ आर्मी स्टाफ तक ले जाया गया।

अंतिम फैसला: मरून बेरेट का मान

वाइस चीफ़ का आदेश साफ था – “पैरा ब्रिगेड कमांडर सही हैं। वे एक स्वेच्छा से लड़ने वाले दस्ते के नेता हैं, जो भारतीय सेना के सबसे घातक सैनिक हैं। मरून उनकी रगों में बहता है। इसे उनसे छीना नहीं जा सकता। उन्हें मजबूर न करें।”

मामला वहीं समाप्त हो गया।

मरून बेरेट का महत्व: परंपरा जो आत्मा बन गई

भारतीय सेना में मरून बेरेट सिर्फ यूनिफॉर्म का हिस्सा नहीं है। यह बताता है कि पैराट्रूपर्स मौत को मात देकर आसमान से कूदते हैं, और हर जंग में दुश्मन के दिल में डर पैदा करते हैं।

यह कहानी बताती है कि—

• सेना में अनुशासन ज़रूरी है,

• मगर परंपरा और गर्व, अनुशासन से भी बड़ी शक्ति हैं।

निष्कर्ष: सलाम उस जज़्बे को

ब्रिगेडियर नवीन ने यह दिखा दिया कि नेतृत्व केवल आदेश मानने में नहीं, बल्कि अपने सैनिकों की आत्मा और पहचान की रक्षा करने में है।

आज उनकी यह कहानी भारतीय सेना के इतिहास में एक प्रेरणा बन चुकी है।

सच्चा सलाम ब्रिगेडियर नवीन और मरून बेरेट की उस परंपरा को, जो सैनिकों की नसों में बहती है।

FAQs (People Also Ask)

Q1. मरून बेरेट भारतीय सेना में किसका प्रतीक है?

मरून बेरेट पैराट्रूपर्स और विशेष बलों का प्रतीक है। यह साहस, बलिदान और अनुशासन की पहचान है।

Q2. ब्रिगेडियर नवीन की कहानी क्यों खास है?

क्योंकि उन्होंने प्रोटोकॉल से ऊपर अपने सैनिकों की परंपरा और आत्मसम्मान को रखा।

Q3. क्या उच्च पद पर पहुंचने के बाद अधिकारी मरून बेरेट नहीं पहन सकते?

नए प्रोटोकॉल में ऐसा प्रावधान था, लेकिन इस मामले के बाद स्पष्ट किया गया कि पैरा कमांडर मरून बेरेट पहन सकते हैं।

Q4. इस घटना से भारतीय सेना को क्या सीख मिली?

यह कि परंपरा और सैनिकों का मनोबल किसी भी नियम से बड़ा होता है।

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