नाइजीरिया यात्रा में पीएम मोदी को GCON सम्मान मिला। भारत-नाइजीरिया ऊर्जा साझेदारी से क्रूड आयल और LNG पर G2G डील का नया अध्याय शुरू।
प्रस्तावना: अफ्रीका की धरती पर भारत की नई ऊर्जा कूटनीति
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नवंबर 2024 में हुई नाइजीरिया यात्रा केवल एक राजनयिक यात्रा नहीं थी, बल्कि भारत-अफ्रीका संबंधों के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुई। इस यात्रा के दौरान नाइजीरियन राष्ट्रपति बोला अहमद ने प्रधानमंत्री मोदी को देश का सर्वोच्च सम्मान “ग्रैंड कमांडर ऑफ़ द ऑर्डर ऑफ़ नाइजर (GCON)” प्रदान किया। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच ऊर्जा, तकनीकी सहयोग और निवेश से जुड़े कई अहम समझौते हुए।
भारत ने नाइजीरिया को केवल एक बैकअप सप्लायर मानने की नीति छोड़कर उसे ऊर्जा सुरक्षा का स्थायी स्तंभ बनाने का निर्णय लिया। यह कदम न केवल भारत की ऊर्जा रणनीति को मजबूती देता है बल्कि ग्लोबल साउथ के देशों को भी एक नया विकल्प प्रस्तुत करता है।
भारत-नाइजीरिया समझौते: ऊर्जा साझेदारी की नई राह
1. क्रूड आयल और एलएनजी पर G2G डील
भारत सरकार ने नाइजीरिया से स्पष्ट कहा कि वह लॉन्ग-टर्म गवर्नमेंट टू गवर्नमेंट (G2G) डील करने को तैयार है। इस डील के अंतर्गत क्रूड ऑयल और एलएनजी (Liquefied Natural Gas) की सीधी खरीद होगी, जिससे मध्यस्थ कंपनियों की भूमिका घटेगी और दोनों देशों को लाभ मिलेगा।
2. तकनीकी और अवसंरचनात्मक सहयोग
भारत ने नाइजीरिया में केवल तेल खरीदने तक ही खुद को सीमित नहीं किया, बल्कि वहां पाइपलाइन बिछाने, सुरक्षा प्रबंधन, गैस को सीएनजी में कन्वर्ट करने, बॉटलिंग और शहरी पाइपलाइन नेटवर्क तैयार करने की पेशकश भी की। यह कदम नाइजीरिया की ऊर्जा अवसंरचना को मजबूत करेगा और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पैदा करेगा।
3. निवेश और औद्योगिक सहयोग
भारतीय कंपनियों ने नाइजीरिया में बड़े पैमाने पर निवेश करने की हामी भरी है। इससे अफ्रीका में भारत की मौजूदगी और गहरी होगी और नाइजीरिया को अपनी अर्थव्यवस्था को विविधता देने का मौका मिलेगा।
अमेरिका को झटका: भारत का स्वतंत्र ऊर्जा निर्णय
रूस से तेल आयात को लेकर विवाद पहले से ही चल रहा था। इसी बीच अमेरिकी कंपनियों को लगा कि भारत दबाव में आकर अमेरिका से क्रूड आयात करेगा। लेकिन भारत ने इसके विपरीत कदम उठाया।
भारत ने अमेरिका को स्पष्ट संदेश दिया—“जो हमें बेहतर डील देगा, हम उसी के साथ जाएंगे।”
यह रुख भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को दर्शाता है। नाइजीरिया से डील के बाद भारत ने दिखा दिया कि वह केवल पश्चिमी दबाव में चलने वाला देश नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने वाला राष्ट्र है।
अफ्रीका के अन्य देशों की रुचि: लीबिया और अंगोला आगे बढ़े
नाइजीरिया-भारत डील का असर केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहा। अब लीबिया और अंगोला भी भारत से ऊर्जा समझौते करने को इच्छुक हैं। पहले ये देश अमेरिकी दबाव और राजनीतिक अस्थिरता के डर से पीछे हटते रहे, लेकिन अब नाइजीरिया के कदम से उन्हें भी भरोसा मिला है।
अफ्रीकी क्रूड की विशेषता
नाइजीरिया, लीबिया और अंगोला के तेल में सल्फर की मात्रा कम होती है। इससे इन्हें रिफाइन करना आसान और सस्ता होता है। भारत जैसे देश के लिए यह बड़ा लाभ है, जहां तेल की मांग लगातार बढ़ रही है।
ब्राजील और साउथ अफ्रीका भी तैयार
भारत के इस कदम ने न केवल अफ्रीकी देशों को प्रभावित किया बल्कि ब्राजील और साउथ अफ्रीका जैसे देश भी अब इन अफ्रीकी राष्ट्रों से इसी तरह की डील करने की योजना बना रहे हैं।
इससे स्पष्ट है कि भारत की नाइजीरिया यात्रा ने एक डोमिनो इफेक्ट पैदा किया है, जिससे अफ्रीका वैश्विक ऊर्जा मानचित्र पर नई ताकत के रूप में उभर सकता है।
ग्लोबल साउथ के लिए नया अवसर
आज की भू-राजनीतिक स्थिति में जब पश्चिमी देश अक्सर संसाधनों को हथियार बनाकर दबाव डालते हैं, तब भारत का यह निर्णय ग्लोबल साउथ के देशों को आत्मनिर्भरता की दिशा में ले जा सकता है।
फायदे:
• अफ्रीकी देशों को स्थायी और बड़े खरीदार मिलेंगे।
• भारत को ऊर्जा सुरक्षा और सस्ता, स्वच्छ क्रूड मिलेगा।
• ग्लोबल साउथ के देशों के बीच साझेदारी और विश्वास बढ़ेगा।
भविष्य की चुनौतियाँ और संभावनाएँ
हालांकि यह डील कई अवसर लाती है, लेकिन चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं।
• नाइजीरिया में सुरक्षा और राजनीतिक अस्थिरता का खतरा।
• पाइपलाइन और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर बड़े निवेश की आवश्यकता।
• अमेरिकी और यूरोपीय दबाव का निरंतर सामना करना।
लेकिन भारत ने साफ संकेत दिया है कि वह लॉन्ग-टर्म गेम खेल रहा है। यह रणनीति न केवल भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगी बल्कि अफ्रीका में नए आर्थिक मार्ग भी खोलेगी।
निष्कर्ष: भविष्य की ऊर्जा राजनीति में भारत-अफ्रीका की साझेदारी
प्रधानमंत्री मोदी की नाइजीरिया यात्रा केवल एक राजनयिक उपलब्धि नहीं थी, बल्कि यह भारत की स्वतंत्र और आत्मनिर्भर ऊर्जा नीति का प्रतीक भी है।
भारत ने अमेरिका और पश्चिमी देशों के दबाव से अलग हटकर अफ्रीका की ओर रुख किया है। इससे न केवल भारत को दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा मिलेगी बल्कि अफ्रीकी देशों की किस्मत भी बदल सकती है।
जैसा कि कहा गया है—“जो देश इस आर्थिक युद्ध का सामना अपने दम पर करेंगे, उनके लिए भविष्य नए अवसरों से भरा होगा।”
भारत ने नाइजीरिया की धरती से यही संदेश पूरी दुनिया को दिया है।
