प्रस्तावना: बदलती राजनीति और ट्रम्प की भूमिका
किसने सोचा था कि एक ही साल में राजनीति की तस्वीर इतनी तेजी से बदल जाएगी कि भारत और चीन गले मिलते दिखाई देंगे। यह दोस्ती या प्यार का मामला नहीं है, बल्कि शुद्ध रूप से व्यापारिक समीकरण है। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था को इस तरह हिला दिया है कि भारत, चीन और ब्रिटेन तक को नए रास्ते तलाशने पड़े।
आज जब चीन पर लगभग 40% और भारत पर करीब 50% टैरिफ लगाया गया है, तो अंतरराष्ट्रीय व्यापार की दिशा ही बदलती नजर आ रही है। असली सवाल यह है कि इसका फायदा किसे होगा—भारत को, चीन को या फिर अमेरिका को?
ट्रम्प और टैरिफ: वैश्विक व्यापार में भूचाल
टैरिफ की मार
अमेरिका में 40-50% महंगाई और टैरिफ झेलना आम जनता के लिए आसान नहीं है। परन्तु ट्रम्प का रुख साफ है… अमेरिकी हित पहले। इसी कारण उन्होंने भारत और चीन दोनों पर भारी टैरिफ थोप दिए।
भारत और चीन की मजबूरी
हालांकि गलवान घाटी के बाद दोनों देशों के बीच संबंध ठंडे पड़ गए थे, लेकिन आज व्यापार की मजबूरी उन्हें करीब ला रही है। भारत और चीन को एक-दूसरे की ज़रूरत थी और ट्रम्प की टैरिफ नीति ने यह रास्ता आसान कर दिया।
भारत-ब्रिटेन डील: नया जुगाड़ रास्ता
ब्रिटेन की भूमिका
अगर टैरिफ सच में लंबे समय तक बने रहते हैं, तो ब्रिटेन सबसे बड़ा लाभार्थी बन सकता है।
• भारत से ब्रिटेन को सामान बिना किसी ड्यूटी के जाएगा।
• वहीं से ब्रिटेन, अमेरिका को केवल 10% टैरिफ देकर आसानी से निर्यात कर सकेगा।
आईटी कंपनियों का खेल
भारतीय आईटी कंपनियां लंदन में शेल कंपनियां डालकर इस स्थिति का और फायदा उठा सकती हैं। यह एक तरह का “जुगाड़” है जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार की हकीकत को उजागर करता है।
ट्रम्प की उपलब्धियां: सकारात्मक और नकारात्मक कारण
लेखक के दृष्टिकोण से ट्रम्प को पसंद करने की दो बड़ी वजहें हैं—
सकारात्मक कारण
• वर्षों से लंबित भारत-ब्रिटेन डील को आगे बढ़ाना।
• वैश्विक व्यापार को नई दिशा देना।
नकारात्मक कारण
• चीन के साथ सीमा विवाद को इस हद तक सुलझाना कि चीन ने अरुणाचल प्रदेश की सीमा को स्वीकार लिया।
• गलवान में बफर जोन से चीनी सैनिकों की वापसी।
यह सब बदलाव अचानक नहीं हुआ बल्कि ट्रम्प की कठोर व्यापारिक नीतियों का नतीजा है।
चीन का भ्रम और भारत का स्पष्ट रुख
हाल ही में चीनी मीडिया यह प्रचार कर रहा है कि भारत ताइवान को चीन का हिस्सा मानने को तैयार है। लेकिन भारत का रुख हमेशा से स्पष्ट रहा है—
• हम ताइवान को स्वतंत्र देश नहीं मानते।
• साथ ही उसे चीन का हिस्सा भी स्वीकार नहीं करते।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने साफ कर दिया है कि भारत की नीति में कोई बदलाव नहीं आया है। यह चीन का प्रचार मात्र है, ताकि अमेरिका को चिढ़ाया जा सके।
बदलता वर्ल्ड ऑर्डर और भारत की रणनीति
यह सच है कि इस पूरे परिदृश्य में भारत सरकार की कोई बड़ी “जीत” नहीं है। बल्कि यह अमेरिका का ब्लंडर है जिसने विश्व व्यवस्था को हिला दिया।
भारत को इसे सकारात्मक रूप से लेना चाहिए क्योंकि—
• अगर टैरिफ नहीं लगते तो ब्रिटेन कभी डील साइन नहीं करता।
• गलवान पर बातचीत ठप पड़ी थी, अब रास्ता खुल गया।
• भारत को दक्षिण अमेरिकी, अफ्रीकी देशों और कनाडा के साथ रिश्ते सुधारने का मौका मिल सकता है।
उपसंहार: ट्रम्प और नया व्यापारिक संतुलन
डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों ने दिखा दिया है कि वैश्विक राजनीति में स्थायी दोस्ती या दुश्मनी कुछ नहीं होती। यह सब व्यापारिक समीकरणों पर आधारित है।
भारत-चीन का गलवान विवाद सुलझना, ब्रिटेन-भारत डील का आगे बढ़ना और अमेरिका पर टैरिफ का दबाव… ये संकेत हैं कि वर्ल्ड ऑर्डर में बदलाव हो रहा है।
भारत के लिए यह समय अवसरों को पहचानने और उनका लाभ उठाने का है। चाहे इसे सकारात्मक मानें या नकारात्मक, यह सच है कि ट्रम्प ने विश्व राजनीति को नया मोड़ दे दिया है।
