क्या कृत्रिम बारिश (Cloud Seeding) से सच में घटेगा प्रदूषण? जानिए सच्चाई और इसके खतरनाक परिणाम

क्या क्लाउड सीडिंग वाकई समाधान है?

हाल ही में दिल्ली सरकार ने ऐलान किया कि वह जुलाई के दूसरे सप्ताह में प्रदूषण घटाने के लिए क्लाउड सीडिंग के ज़रिए कृत्रिम बारिश कराएगी। सोशल मीडिया पर लोगों ने सवाल उठाए, वैज्ञानिकों ने चिंताएं जताईं, और सरकार ने प्रोग्राम को चुपचाप अगस्त-सितंबर तक टाल दिया।

लेकिन बड़ा सवाल यह है – क्या सच में एक दिन की बारिश से दिल्ली का प्रदूषण मिट जाएगा? और क्या यह तकनीक पर्यावरण के लिए सुरक्षित है? आइए, इस पूरे मुद्दे को वैज्ञानिक, सामाजिक और नीतिगत दृष्टिकोण से समझते हैं।

क्लाउड सीडिंग क्या है? (What is Cloud Seeding in Hindi)

क्लाउड सीडिंग एक ऐसी तकनीक है जिसमें बादलों में रासायनिक तत्वों (जैसे सिल्वर आयोडाइड, पोटैशियम आयोडाइड या ड्राई आइस) को छोड़ा जाता है ताकि वे नमी को संघनित करके बारिश का निर्माण करें। यह तकनीक मुख्यतः सूखा प्रभावित क्षेत्रों में जल संकट दूर करने, जंगल की आग बुझाने या खेती बचाने के लिए उपयोग में लाई जाती है।

प्रदूषण क्या है और यह कैसे फैलता है?

आज प्रदूषण सिर्फ धूल-धक्कड़ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह इंडस्ट्रियल युग की देन बन चुका है।

वातावरण में मौजूद प्रदूषक दो प्रमुख प्रकार के होते हैं:

• PM10 (Particulate Matter 10 माइक्रोमीटर): जो हमारी नाक, गले और म्यूकस द्वारा फिल्टर हो सकते हैं।

• PM2.5 और उससे छोटे कण: जो फेफड़ों में गहराई तक जाकर खतरनाक बीमारियों का कारण बनते हैं।

इन सूक्ष्म कणों का मुख्य स्रोत हैं:

• कोयला आधारित बिजली संयंत्र

• वाहनों से निकला धुआं

• औद्योगिक उत्सर्जन

• निर्माण कार्य और धूल

PM2.5 और नैनोस्केल प्रदूषक शरीर की प्राकृतिक रक्षा प्रणाली को चकमा देकर अंदर तक पहुंच जाते हैं और लिवर, हृदय और फेफड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं।

क्लाउड सीडिंग से प्रदूषण क्यों नहीं हटेगा?

✅ तथ्य यह है कि:

• कृत्रिम बारिश सिर्फ अस्थायी राहत देती है।

• कुछ घंटों के बाद ही प्रदूषक फिर हवा में फैल जाते हैं।

• इस प्रक्रिया में महंगे केमिकल्स का प्रयोग होता है, जो मिट्टी, जलस्रोतों और पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं।

❌ क्लाउड सीडिंग के खतरे:

• अनियंत्रित बारिश के कारण बाढ़ जैसी स्थिति।

• अन्य क्षेत्रों में सूखा, क्योंकि बादल एक जगह बरसा दिए गए।

• आयोडाइड आधारित रसायन भूमि और जल स्रोतों के लिए जहरीले सिद्ध हो सकते हैं।

• लंबे समय तक इसका प्रयोग मौसम चक्र में विकृति ला सकता है।

🚫 इतिहास में किसी ने भी प्रदूषण हटाने के लिए क्लाउड सीडिंग नहीं की

संसार भर में जहां-जहां कृत्रिम बारिश की गई, वह:

• जंगल की आग बुझाने

• सूखा प्रभावित क्षेत्रों में राहत

• खेती बचाने जैसे मामलों तक सीमित रही है।

दिल्ली जैसा महानगर, जहां प्रदूषण का कारण गाड़ियों, फैक्ट्रियों और बिजली उत्पादन की प्रणाली है – वहां इस तरह की बेमौसम बारिश कराना एक अस्थायी और असंगत समाधान है।

प्रदूषण रोकने के प्रभावी उपाय (Real Solutions for Pollution Control)

➡️ पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देना

➡️ ग्रीन एनर्जी (सौर, पवन) का विस्तार

➡️ पराली निस्तारण के लिए टेक्नोलॉजिकल उपाय

➡️ स्थानीय स्तर पर पानी के टैंकर से बौछार

➡️ बी-शहरों को विकसित कर जनसंख्या का पुनर्संतुलन

➡️ ऊर्जा खपत नियंत्रित करने की नीति

📌 निष्कर्ष: विज्ञान आधारित नीति बनाएं, चमत्कार नहीं

आज प्रदूषण एक ऐसी समस्या है जिसका समाधान एक दिन की कृत्रिम बारिश नहीं, बल्कि लंबी, योजनाबद्ध और वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाली नीति है। क्लाउड सीडिंग एक जोखिम भरी प्रक्रिया है जिसका प्रदूषण पर सीमित या नगण्य असर होता है, जबकि इसके पारिस्थितिक खतरे बहुत गंभीर हैं।

यदि सरकारें वाकई प्रदूषण को लेकर चिंतित हैं, तो उन्हें IITs और वैज्ञानिक संस्थानों से दीर्घकालिक समाधान तैयार कराने चाहिए।

क्योंकि आखिरकार — प्रदूषण एक दिन में नहीं फैला है, इसे खत्म करने में भी धैर्य और नीति दोनों चाहिए।

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