अमेरिका-यूरोप संबंध और एशिया की नई शक्ति-संतुलन

अमेरिका-यूरोप संबंधों में तनाव और एशिया में भारत, चीन, रूस, जापान की बढ़ती भूमिका से वैश्विक शक्ति-संतुलन बदल रहा है।

प्रस्तावना: बदलता हुआ विश्व-क्रम

दुनिया की राजनीति तेज़ी से बदल रही है। अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के रिश्तों में जिस तरह तनाव बढ़ा है, उसने अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन को नए सिरे से गढ़ना शुरू कर दिया है। भारत और जापान भले ही अमेरिका के साथ अपने रिश्तों को मज़बूत बनाए रखना चाहते हैं, लेकिन वे उस स्थिति में नहीं जाना चाहते जहाँ पश्चिमी यूरोप पहुँच चुका है। एक ऐसी स्थिति जहाँ स्वतंत्र विदेश नीति और संप्रभुता लगभग समाप्त हो चुकी है।

अमेरिका-पश्चिमी यूरोप संबंध: सुरक्षा से शर्तों तक

अमेरिका की नई नीति

डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका ने साफ़ कर दिया कि “मुफ्त की सुरक्षा” का दौर खत्म हो चुका है। पश्चिमी यूरोप के देश लंबे समय से अमेरिकी सुरक्षा पर आश्रित रहे हैं। अब अमेरिका उन पर दबाव बना रहा है कि वे रक्षा बजट बढ़ाएँ, अमेरिकी लिक्विड गैस खरीदें और अपने बाज़ार अमेरिकी शर्तों के अनुसार खोलें।

पश्चिमी यूरोप की कमजोरी

पश्चिमी यूरोप की स्थिति अब ऐसी हो गई है कि वे अमेरिकी दबाव का मुकाबला नहीं कर पा रहे। कभी उपनिवेशवाद के जरिए पूरी दुनिया पर आधिपत्य जमाने वाले देश आज स्वयं “दूसरे दर्जे” की स्थिति में खड़े हैं। उनमें इतना भी साहस नहीं बचा कि वे रूस, भारत या चीन की तरह न्यूट्रल पोज़िशन ले सकें।

पश्चिमी देशों के सामने दो विकल्प

1. स्वतंत्र सुरक्षा व्यवस्था:

यदि यूरोप अमेरिका से अलग होकर अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी लेता है तो उसके बजट का बड़ा हिस्सा रक्षा में जाएगा। इसका असर इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण पर पड़ेगा। अंततः जनता में असंतोष और विद्रोह की संभावना बढ़ेगी।

2. अमेरिका पर निर्भरता:

दूसरा विकल्प है अमेरिकी शर्तों पर लगातार झुकना। इससे यूरोपीय देशों की संप्रभुता धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी, बेरोजगारी बढ़ेगी और अंततः वे स्वतंत्र देश कम और अमेरिकी उपग्रह राष्ट्र ज़्यादा लगेंगे।

वैश्विक शक्ति-संतुलन एशिया की ओर

एशिया का उभार

दुनिया का केंद्र अब पश्चिम से पूर्व की ओर खिसक रहा है। एशिया के पास न केवल विशाल जनसंख्या और संसाधन हैं बल्कि भारत, चीन, रूस और जापान जैसी बड़ी शक्तियाँ भी हैं।

• भारत: लोकतांत्रिक ताकत और तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था।

• चीन: दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा आर्थिक और सैन्य महाशक्ति।

• रूस: ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र में मज़बूत पकड़।

• जापान: तकनीक और वित्तीय क्षेत्र की ताकत।

जापान और चीन की संभावनाएँ

आज भले जापान और चीन के रिश्ते तल्ख़ हों, लेकिन क्षेत्रीय स्थिरता की ज़रूरत दोनों को करीब ला सकती है। यदि अमेरिका लगातार दबाव बनाता रहा तो जापान भी अपने एशियाई पड़ोसियों की ओर झुक सकता है।

ट्रंप की नीति: गलती या सोची-समझी रणनीति?

कई विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रंप लगातार “ब्लंडर” कर रहे हैं, लेकिन कुछ का मानना है कि यह उनकी सोची-समझी रणनीति है। वे चाहते हैं कि न केवल यूरोप बल्कि स्वयं अमेरिका के लोग भी “आरामतलब” जीवन से बाहर निकलें और वास्तविकताओं का सामना करें।

उन्होंने खुद कहा था कि उनकी नीतियों से अमेरिका का मार्केट प्रभावित हो सकता है, लेकिन यह आवश्यक है। इससे संकेत मिलता है कि ट्रंप की प्राथमिकता राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता और वास्तविक सुरक्षा पर है, न कि वैश्विक नेतृत्व की चमक-दमक पर।

भारत की रणनीति: संतुलित विदेश नीति

भारत ने अमेरिका और चीन दोनों के बीच संतुलन बनाकर अपनी स्थिति मज़बूत की है।

• भारत अमेरिका को यह संकेत देता है कि यदि उसकी संप्रभुता पर चोट की गई तो वह वैश्विक नेतृत्व को चुनौती देने से पीछे नहीं हटेगा।

• वहीं चीन के साथ भारत अभी सीधे जुड़ना नहीं चाहता, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर उसके साथ खड़े होने की क्षमता भी रखता है।

यह संतुलन भारत को एशिया और दुनिया की राजनीति में एक स्वतंत्र और मज़बूत स्थान देता है।

निष्कर्ष: नया विश्व-क्रम एशिया के पक्ष में

आज जो परिदृश्य दिख रहा है, उसमें अमेरिका-पश्चिमी यूरोप का गठबंधन धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहा है। भविष्य में सभी देशों को अपनी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी ख़ुद उठानी पड़ेगी।

भारत, चीन, रूस और जापान जैसे देश आने वाले दशकों में वैश्विक राजनीति का असली केंद्र बनेंगे। यदि एशियाई देश अपने मतभेदों को पीछे छोड़कर साझा सुरक्षा और आर्थिक सहयोग की दिशा में कदम बढ़ाते हैं, तो आने वाला युग “एशियाई सदी” साबित होगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Exit mobile version