भारत-चीन संबंध और क्वाड-ब्रिक्स की कूटनीति

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग आपस में हाथ मिलाते हुए, पीछे भारत और चीन के राष्ट्रीय ध्वज।

भारत-चीन संबंधों, क्वाड और ब्रिक्स की राजनीति में मोदी सरकार की विदेश नीति कैसे संतुलन और राष्ट्रीय हितों पर आधारित है, जानें विस्तार से।

परिचय: भारत के सामने संतुलन की चुनौती

आज की वैश्विक राजनीति में भारत का स्थान सबसे जटिल और महत्वपूर्ण है। एक ओर चीन और अमेरिका जैसे महाशक्तियों के बीच टकराव है, वहीं दूसरी ओर रूस, यूरोप, जापान और मुस्लिम देशों के बीच बदलते समीकरण हैं। इस दौर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति का मूल मंत्र है “प्रतिसंतुलन के माध्यम से संतुलन”।

भारत न तो पूरी तरह अमेरिका पर झुक सकता है और न ही चीन या रूस के पाले में जा सकता है। ऐसे में भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका विशाल उपभोक्ता बाजार और सबसे बड़ा मध्यम वर्ग है। लेकिन यही शक्ति उसकी कमजोरी भी बन जाती है, क्योंकि वैश्विक ताकतें इसी बाजार पर नज़र गड़ाए बैठी हैं।

अमेरिका, रूस और चीन की ताकतें बनाम भारत की स्थिति

अमेरिका की श्रेष्ठता

• टेक्नोलॉजिकल सुपरपावर

• सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था

• यूरोप का नस्लीय और राजनीतिक समर्थन

रूस की ताकत

• विनाशकारी हथियार और टेक्नोलॉजी

• तेल और गैस के विशाल भंडार

• चीन जैसा स्थायी खरीदार

चीन की पकड़

• 18 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था

• वैश्विक सप्लाई चेन और रेयर अर्थ मिनरल्स पर नियंत्रण

• ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक और सैन्य उत्पादन का बड़ा स्रोत

भारत की हकीकत

भारत के पास अभी न तो पूर्ण हथियार आत्मनिर्भरता है और न ही विकसित देशों जैसी प्रति व्यक्ति आय। लेकिन इसके पास है दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता वर्ग, जिसकी वजह से अमेरिका, चीन और यूरोप भारत को हल्के में नहीं ले सकते।

क्वाड और ब्रिक्स के बीच भारत की भूमिका

क्वाड की वास्तविकता

क्वाड का गठन अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच चीन को संतुलित करने के लिए किया गया था। लेकिन:

• ऑस्ट्रेलिया सप्लाई चेन के लिए चीन पर निर्भर था।

• सैन्य जिम्मेदारी लगभग पूरी तरह अमेरिका पर थी।

• भारत के आने के बाद ही क्वाड को वास्तविक मजबूती मिली।

ब्रिक्स की राजनीति

ब्रिक्स (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) को अमेरिका पश्चिमी दबदबे के विकल्प के रूप में देखता है।

• चीन चाहता है कि ब्रिक्स करेंसी लाकर डॉलर को चुनौती दे।

• भारत इससे बचता है, क्योंकि इससे चीनी युआन को फायदा होगा।

• भारत रूपए को अंतरराष्ट्रीय विनिमय मुद्रा बनाने की दिशा में प्रयासरत है।

भारत का मध्यम वर्ग: सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ी कमजोरी

मोदी सरकार की सबसे बड़ी चुनौती है घरेलू संतुलन।

• मध्यम वर्ग (शहरी उपभोक्ता) भारत की खूबसूरत बेटी है, जिसकी चाहत अमेरिका और चीन को है।

• गरीब और किसान वर्ग वह अपाहिज बेटी है, जिसे मज़बूत बनाने के लिए सरकार खर्च करती है।

अमेरिका चाहता है कि भारत कृषि और डेयरी सेक्टर खोल दे।

चीन चाहता है कि भारत सस्ते इलेक्ट्रॉनिक सामान के लिए दरवाज़ा खोले और ताइवान-तिब्बत पर दबाव कम करे।

मोदी सरकार इस दोराहे पर फंसी है, अगर अमेरिका को खुश करें तो चीन नाराज़ होगा, और चीन से समीकरण साधें तो अमेरिका दबाव बढ़ाएगा।

अमेरिका की रणनीति और भारत की चुनौती

अमेरिका बार-बार भारत को घेरने की कोशिश करता रहा है।

• 1965, 1974 और 1998 में प्रतिबंधों से भारत को झटका देने की कोशिश।

• हाल ही में टैरिफ बढ़ाकर आर्थिक दबाव बनाने की नीति।

• बांग्लादेश में सैन्य अड्डे की मांग, ताकि भारत पर निगरानी रखी जा सके।

लेकिन अमेरिका भी जानता है कि भारत को अलग-थलग करना संभव नहीं है। इंडो-पैसिफिक में भारत की नौसैनिक शक्ति और सामरिक स्थिति उसके लिए अनिवार्य है।

चीन और पाकिस्तान की जटिलता

चीन के लिए सबसे बड़ी चिंता है पाकिस्तान की अविश्वसनीयता।

• सी-पैक में अरबों डॉलर निवेश फंसा हुआ है।

• पाकिस्तान अमेरिका और चीन दोनों की गोदी में बैठा है।

• ऑपरेशन सिंदूर के बाद चीन को भारत की सैन्य क्षमता का अहसास हुआ।

इसी कारण चीन भारत से संबंध सुधारने की कोशिश करता है, लेकिन ऐतिहासिक सीमा विवाद और तिब्बत का मुद्दा बाधा बने हुए हैं।

भारत के प्राकृतिक सहयोगी: जापान और इजरायल

आज की स्थिति में भारत के सबसे नज़दीकी सहयोगी जापान और इजरायल हैं।

• जापान: चीन के बढ़ते प्रभाव से चिंतित, इसलिए भारत का स्वाभाविक साझेदार।

• इजरायल: सैन्य तकनीक और आतंकवाद विरोधी सहयोग में भारत का भरोसेमंद साथी।

हालांकि, दोनों ही देशों के अपने द्वैत और सीमाएं हैं, इसलिए भारत को पूरी तरह उन पर निर्भर नहीं होना चाहिए।

मोदी सरकार की संतुलनकारी विदेश नीति

मोदी की विदेश नीति पूरी तरह राष्ट्रीय स्वार्थ पर आधारित है, न कि निजी भावनाओं पर।

• आज अमेरिका से दूरी, कल ट्रम्प को शांति का मसीहा कहना भी संभव।

• आज चीन के साथ बातचीत, कल नौसैनिक शक्ति से उसकी सप्लाई चेन ब्लॉक करना भी संभव।

• आज रूस से तेल खरीद, कल अमेरिकी F-35 डील भी संभव।

• आज अरब देशों से दोस्ती, कल इजरायल को सैन्य सहयोग देना भी संभव।

यानी भारत की विदेश नीति का मूल है “संतुलन साधना और राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखना”।

निष्कर्ष: भारत का रास्ता कठिन लेकिन मजबूत

भारत आज उस मोड़ पर खड़ा है जहां हर कदम वैश्विक राजनीति को प्रभावित करता है।

• अमेरिका को डर है भारत कहीं ब्रिक्स और रूपए की ताकत से डॉलर की पकड़ न ढीली कर दे।

• चीन को चिंता है कि भारत क्वाड के जरिए उसकी महत्वाकांक्षाओं पर रोक न लगा दे।

• रूस भारत को ऊर्जा और सैन्य साझेदार के रूप में देखता है।

लेकिन सच्चाई यह है कि भारत के पास अब किसी एक खेमे में जाने की गुंजाइश नहीं है। उसे हर परिस्थिति में संतुलन बनाना होगा और राष्ट्रीय स्वार्थों को सर्वोपरि रखना होगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Exit mobile version