भारत-अमेरिका टैरिफ विवाद: आर्थिक ताकत, उद्योगपति और राष्ट्रीय स्वाभिमान

नरेन्द्र मोदी और डोनाल्ड ट्रम्प की मुलाकात, आर्थिक और कूटनीतिक वार्ता का प्रतीकात्मक दृश्य

भारत-अमेरिका टैरिफ विवाद: उद्योगपति, अर्थव्यवस्था और स्वाभिमान की कहानी

दुनिया में दो तरह के देश होते हैं… एक वो, जो अपने उद्योगपतियों को बोझ समझते हैं, और दूसरे वो, जो उन्हें राष्ट्र निर्माण का इंजन मानते हैं। अमेरिका दूसरे वर्ग में आता है, और शायद यही कारण है कि सिर्फ उसके तीन शहर… न्यूयॉर्क, लॉस एंजेलस और सैन फ्रैंसिस्को में ही 226 अरबपति रहते हैं, जबकि पूरे भारत में ये संख्या 283 है। पूरी दुनिया में अमेरिका के पास 925+ अरबपति हैं, जो भारत की कुल जनसंख्या के महज़ 20% में यह उपलब्धि पाते हैं। जनसंख्या में हम उनसे पाँच गुना बड़े हैं, लेकिन आर्थिक शक्ति में? अब भी बहुत पीछे।

यह कहानी सिर्फ टैरिफ विवाद की नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय चरित्र, आर्थिक सोच और उद्योगों की ताकत को समझने की है।

अमेरिका क्यों आर्थिक महाशक्ति है?

अमेरिका की ताकत उसकी सरकारों में नहीं, बल्कि उसके उद्योगपतियों में है। 19वीं सदी के मध्य से ही वहाँ का राजनीतिक तंत्र उद्योगों के इर्द-गिर्द बुना गया है। चुनाव वहाँ एक औपचारिकता है, असली शक्ति कॉर्पोरेट जगत के हाथों में है।

अमेरिका में लगभग सभी बड़े संस्थान प्राइवेट हैं। कोई भी बड़ा state-owned enterprise उनकी अर्थव्यवस्था का प्रमुख हिस्सा नहीं है। सरकारें वहाँ हमेशा उद्योगपतियों के साथ खड़ी रहती हैं, और जनता भी इसे देशहित का हिस्सा मानती है।

इसी का नतीजा है कि टेक्नोलॉजी, रोजगार, और टैक्स राजस्व में अमेरिका दुनिया का लीडर बना हुआ है।

भारत की समस्या: जलन और राजनीति

हम भारतीयों की एक आदत है… अम्बानी-अडानी को कोसना। हमारी खुद की कमाई महीने में एक लाख भी न हो, लेकिन अरबपतियों की संपत्ति पर हमें जलन जरूर होती है।

जबकि सच्चाई यह है कि इन्हीं के उद्योगों से लाखों लोगों के घर का चूल्हा जलता है, और सरकार को अरबों रुपये का टैक्स मिलता है।

तथ्य:

• अडानी और अंबानी की रिफाइनरियों में लाखों रोजगार हैं।

• इनके टैक्स से सरकारी खजाना भरता है, जिससे विकास परियोजनाएँ चलती हैं।

• इन्हीं जैसे और उद्योगपति चाहिए, ताकि भारत एक सच्ची आर्थिक महाशक्ति बन सके।

रूस के सस्ते तेल और निजी कंपनियाँ

तीन साल पहले जब रूस और वर्ल्ड मार्केट के तेल में $30 का अंतर था, तब प्राइवेट कंपनियों ने लॉन्ग-टर्म ट्रेड एग्रीमेंट कर लिया।

सरकारी कंपनियों (PSUs) ने ऐसा नहीं किया। नतीजा:

• जब अंतर घटकर $4 रह गया, तो PSUs ने तेल खरीदना कम कर दिया।

• खुदरा कीमतों में अंतर 2-4 रुपये ही आया, जिससे मुनाफा प्राइवेट कंपनियों का घटा।

यानी यह फायदा सिर्फ “दो उद्योगपतियों” का नहीं, बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा का था।

टैरिफ विवाद: असली खेल क्या है?

अमेरिका ने कुछ भारतीय सामानों पर टैरिफ बढ़ाने की बात की है। सतह पर देखें तो यह चिंता का विषय है। कीमतें बढ़ेंगी, इंडस्ट्रियल आउटपुट घट सकता है, और जॉब मार्केट प्रभावित होगा।

लेकिन नई टैरिफ नीति को गौर से पढ़ेंगे, तो पता चलेगा कि:

• जनरिक दवाएं, इलेक्ट्रॉनिक्स के कई प्रोडक्ट और आम जरूरत की वस्तुएं एक्सेम्प्टेड हैं।

• अमेरिका भारत से इम्पोर्ट किए बिना रह नहीं सकता, इसलिए यह दबाव की राजनीति है, न कि असली प्रतिबंध।

क्यों ज़रूरी है यह कड़ा रुख?

भारत यह संदेश दे रहा है कि वह घुटनों के बल नहीं चलेगा। अमेरिका के अहंकार को चुनौती देकर हम न केवल अपनी पोजीशन मजबूत कर रहे हैं, बल्कि दुनिया के अन्य देशों को भी संकेत दे रहे हैं कि भारत अपने स्वाभिमान पर समझौता नहीं करेगा।

यह रणनीति तात्कालिक परेशानी ला सकती है, लेकिन दीर्घकालिक लाभ देगी।

• अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा में बढ़ोतरी

• भविष्य के व्यापार समझौतों में बेहतर शर्तें

• घरेलू उद्योगों में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा

डीप स्टेट और असली ताकत की राजनीति

अमेरिका में राष्ट्रपति भी कई बार सिर्फ एक चेहरा होता है, असली खेल डीप स्टेट के हाथों में होता है।

ट्रम्प ने जब इसे चुनौती देने की कोशिश की, तो उन्हें भी पीछे हटना पड़ा। भारत का टैरिफ पर रुख इसी अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन के बीच रखा गया कदम है।

निष्कर्ष: धैर्य ही असली हथियार

भारत के पास अब ऐसे नेतृत्वकर्ता और नीति-निर्माता हैं जो विश्व व्यापार और कूटनीति की बारीकियों को समझते हैं। हमें बस धैर्य रखना है, क्योंकि “घुटनों पर रेंगने से बेहतर है कि तात्कालिक दर्द सह लिया जाए।”

यह विवाद अस्थायी है, लेकिन इससे मिलने वाला सम्मान और आत्मविश्वास स्थायी होगा। हमें उद्योगपतियों से जलने के बजाय, उन्हें बढ़ावा देना चाहिए। क्योंकि उन्हीं के बल पर भारत सच्ची आर्थिक महाशक्ति बनेगा।

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