क्या डोनाल्ड ट्रंप अब भारत के दुश्मन बन गए हैं? व्यापार युद्ध की उलझी परतें और हमारी रणनीति

कभी जिसे मित्र समझा जाता था, जब उसी की चालें हमारी जड़ों को काटने लगें तो सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या हम सही थे? क्या वह वास्तव में दोस्त था? अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में भारत और अमेरिका के संबंध एक नए शिखर पर पहुंचे थे। ट्रंप ने खुले मंचों से भारत की तारीफ की थी, ‘Howdy Modi’ जैसे आयोजन हुए, और ऐसा लगा कि भारत-अमेरिका एक आदर्श साझेदारी की ओर बढ़ रहे हैं।

लेकिन अब, टैरिफ्स लग गए हैं। अमेरिकी दवाब, व्यापारिक सौदों की शर्तें, और हमारी संप्रभु प्राथमिकताओं को दरकिनार करने की कोशिशें। ये सब क्या दर्शाते हैं? क्या ट्रंप भारत के लिए अब वह व्यक्ति नहीं रहे, जिसे समर्थन दिया जाए?

अमेरिका की ‘शर्तों वाली दोस्ती’: समझिए टैरिफ्स के पीछे की असल वजह

1. अमेरिकी हथियारों का जबरन सौदा?

टैरिफ लगाने की सबसे प्रमुख वजहों में से एक है भारत पर अमेरिकी रक्षा उपकरणों को खरीदने का अप्रत्यक्ष दबाव।

यदि भारत, रूस या फ्रांस जैसे देशों से सस्ते, तकनीकी रूप से बेहतर और उपयुक्त सैन्य उपकरण खरीद सकता है, तो अमेरिका चाहता है कि भारत उस विकल्प को ठुकराए और उसके F-35 जैसे हथियार खरीदे। महंगे, जटिल और कभी-कभी अप्रासंगिक।

2. सेना की राय भी दरकिनार?

यहां तक कि अगर भारतीय सेना किसी उपकरण को आवश्यक नहीं मानती, तो भी अमेरिका चाहता है कि भारत उनके उत्पाद खरीदे। रूस से वर्षों की सामरिक साझेदारी को एक झटके में तोड़ना। ये कैसे संभव है?

कृषि और डेयरी क्षेत्र पर हमला?

3. अमेरिकी डेयरी से भारतीय किसान खतरे में

भारत के डेयरी किसान शाकाहारी गायों पर आधारित परंपरागत डेयरी पद्धति पर चलते हैं। वहीं, अमेरिका की डेयरी इंडस्ट्री मांसाहारी चारे पर आधारित है। अमेरिका चाहता है कि भारत अपनी डेयरी मार्केट को उनके लिए खोले। मतलब, सस्ते में उत्पाद लाओ और भारतीय किसान की कमर तोड़ दो।

4. कृषि उत्पाद जो हम नहीं चाहते

भारत अपनी जलवायु, पर्यावरण और पोषण आवश्यकताओं के अनुसार खाद्य उत्पादन करता है। लेकिन अमेरिका चाहता है कि हम उनके GMO आधारित, पर्यावरण विरोधी कृषि उत्पादों के लिए बाजार खोलें।

5. सस्ता रूसी तेल नहीं चाहिए?

जब भारत ने रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदा और रिफाइन करके दुनिया को बेचना शुरू किया, तो अमेरिका की आंखों में खटकने लगा। सवाल उठता है, क्या हमें अपनी आर्थिक समझदारी छोड़ सिर्फ ट्रंप की ‘गुड बुक्स’ में रहने के लिए काम करना चाहिए?

ट्रंप: एक अनिश्चित ‘मित्र’?

6. एलन मस्क को भी नहीं बख्शा

एलन मस्क, जिसने ट्विटर को खरीदकर ट्रंप के लिए मंच फिर से खोला, उसे भी ट्रंप ने नजरअंदाज कर दिया। जब ट्रंप अपने सबसे बड़े समर्थक का साथ नहीं दे सके, तो भारत जैसे देश से भावनात्मक प्रतिबद्धता की उम्मीद क्यों?

7. जो कभी साथ था, अब नहीं

ट्रंप से समर्थन इसलिए था क्योंकि वह कम्युनिज्म, झूठे सेकुलरिज्म, रेडिकल फेमिनिज्म और ‘वोक’ संस्कृति के खिलाफ खड़ा दिखता था। लेकिन अब, जब वही ट्रंप हमारी प्राथमिकताओं के विरुद्ध खड़ा है, तो आलोचना भी जरूरी है।

क्या विदेश नीति अडिग होती है?

भारत की परंपरा है – “नियत परिवर्तनशील, नीति स्थिर”। हम रिश्तों में स्थिरता चाहते हैं, लेकिन नीतियों में लचीलापन भी आवश्यक है। जो आज हमारे हित में नहीं, उसे कल बदल देना ही समझदारी है।

निष्कर्ष: समर्थन भावना पर नहीं, हित पर आधारित हो

विदेश नीति कोई धार्मिक पुस्तक नहीं कि जो एक बार लिख दी गई, वही अंतिम सत्य हो। ट्रंप आज अगर भारत के खिलाफ शर्तें रखता है, भारत की बाजार, सेना और किसानों के हितों पर आघात करता है, तो उसका विरोध जायज है।

कूटनीति भावना से नहीं, स्वार्थ के सटीक आकलन से की जाती है। अगर टैरिफ लगते हैं, तो उसकी वजह अमेरिका की शर्तें हैं न कि भारत की जिद।

हम वही करेंगे, जो हमारे दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित में है। चाहे वो रूस से सस्ता तेल लेना हो या अमेरिकी चापलूसी से इनकार करना।

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