पाकिस्तान की डगमगाती कूटनीति और भारत-अमेरिका-चीन के बीच बदलते समीकरण

पाकिस्तान – एक रहस्य, एक रणनीति या सिर्फ़ एक मोहरा?

1967 में जॉन रोलैंड ने अपनी चर्चित किताब “A History of Sino-Indian Relation: Hostile Coexistence” में एक सटीक भविष्यवाणी की थी — पाकिस्तान एक ऐसा देश है जिसे गोरों ने एक उपकरण की तरह बनाया, ताकि वह रूस, चीन, मिडिल ईस्ट और भारत को संतुलित कर सकें। पर छह दशक बीत जाने के बाद भी यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि पाकिस्तान किसकी ओर है। चीन के साथ मिलकर पश्चिम के खिलाफ़ या पश्चिम से हाथ मिलाकर चीन की मुख़ालफ़त में?

पाकिस्तान की विदेश नीति एक भटके हुए जहाज़ की तरह है, जिसकी दिशा और पतवार, कभी वॉशिंगटन से नियंत्रित होती है, तो कभी बीजिंग से। लेकिन इस भू-राजनीतिक उथल-पुथल में सबसे ज़्यादा जो पिस रहे हैं, वो हैं बलूचिस्तान के नागरिक और पाकिस्तान के आम लोग।

चीन से दोस्ती, लेकिन बलूचिस्तान की आग

पाकिस्तान ने बलूचिस्तान में चीन के लिए अरबों डॉलर का निवेश सुनिश्चित किया, जिससे ग्वादर पोर्ट और ऊर्जा परियोजनाएं शुरू हो सकें। मगर इससे पहले कि चीन को कोई ठोस लाभ मिल पाता, बलूच विद्रोह ने पूरे क्षेत्र को जलाकर रख दिया। आए दिन हमले, गैस पाइपलाइनों पर ब्लास्ट और चीनी इंजीनियरों को निशाना बनाना। ये सब पाकिस्तान को यह बताने के लिए काफी हैं कि सिर्फ़ निवेश से स्थायित्व नहीं आता, जनता की भागीदारी और भरोसे की ज़रूरत होती है।

अब अमेरिकी कार्ड – तेल के बहाने से

बलूचिस्तान के गुप्त तेल भंडार को अब पाकिस्तान अमेरिका को दिखा रहा है। वाशिंगटन से उम्मीद लगाई जा रही है कि वो इन रिज़र्व्स को विकसित करे, जिससे पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को राहत मिले। इस सिलसिले में डोनाल्ड ट्रंप का बयान चौंकाता है — “एक दिन पाकिस्तान भारत को तेल बेचेगा।”

लेकिन क्या वास्तव में पाकिस्तान तेल बेचने की नीयत रखता है? यदि हाँ, तो आज तक खुद ने तेल क्यों नहीं निकाला? दरअसल पाकिस्तान की सेना और हुक्मरानों की वास्तविक रणनीति है भय की राजनीति। चीन को भारत-अमेरिका का डर दिखाना और अमेरिका को चीन-भारत की धौंस देना।

वसूली की राजनीति और असफल परियोजनाएँ

गैस पाइपलाइनें ज़रूर बिछाई गईं, लेकिन उनका संचालन सेना की लाशों की कीमत पर हुआ। हर दिन बलूच गुरिल्ला हमलों में पाकिस्तानी सैनिक मारे जाते हैं। पाकिस्तान के लिए यह रणनीति एक दोधारी तलवार बन गई है। ना वो चीन को संतुष्ट कर पा रहा है, ना अमेरिका को।

भारत की समझदारी और संतुलन नीति

जब अमेरिका ने भारत पर 25% टैरिफ का दबाव डाला, तब भी भारत की प्रतिक्रिया संयमित और स्पष्ट थी। प्रधानमंत्री ने संसद में ट्रंप के युद्ध में हस्तक्षेप के झूठे दावों को सिरे से खारिज किया और बिना किसी शोर-शराबे के अमेरिका के निमंत्रण को भी अस्वीकार कर दिया।

यह वही भारत है जिसने 35 साल पहले डंकल प्रस्ताव को ठुकरा दिया था, तब भी कांग्रेस झुक गई थी लेकिन किसान संगठनों के आंदोलन ने देश के कृषि हितों की रक्षा की। आज भी भारत ने न तो किसी ट्रंप कॉल का इंतजार किया, न ही प्रतिनिधिमंडल भेजा।

ट्रंप का ‘डेड इकॉनमी’ बयान – हताशा की झलक

ट्रंप ने भारत की अर्थव्यवस्था को “डेड इकॉनमी” कहकर एक हास्यास्पद टिप्पणी की है। एक ऐसी अर्थव्यवस्था जो दुनिया की चौथी सबसे बड़ी है और 6% से अधिक की गति से बढ़ रही है, उसे “डेड” कह देना अमेरिका की कुंठा और हताशा को दर्शाता है। भारत अब वह देश नहीं जो किसी बाहरी दबाव में आ जाए।

निष्कर्ष: पाकिस्तान की रणनीति, भारत की नीति और अमेरिका की असफलता

पाकिस्तान आज भी एक ग्लोबल स्ट्रेटेजिक मोहरा है, जिसकी दिशा और उद्देश्य स्पष्ट नहीं हैं। बलूचिस्तान में अस्थिरता, चीन से संबंधों की जटिलता, और अमेरिका को आमंत्रित करने की कोशिशें। यह सब उसकी अवसरवादी और वसूली-आधारित नीति को उजागर करता है।

वहीं दूसरी ओर, भारत ने संतुलन, समझदारी और आत्मविश्वास से न केवल अपने हितों की रक्षा की है, बल्कि दुनिया को यह दिखा दिया है कि वह एक निर्भरशील लोकतंत्र और उभरती हुई महाशक्ति है, जिसे न तो ट्रंप की धमकियाँ रोक सकती हैं और न ही पाकिस्तान की चालबाज़ियाँ।

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