भारत की विदेश नीति पर अमेरिका, चीन और पाकिस्तान की चुनौतियाँ। जानें कैसे जयशंकर की कूटनीति ने भारत की स्थिति को मज़बूत बनाया।
परिचय: भारत की विदेश नीति पर उठते सवाल
हाल के दिनों में भारत की विदेश नीति को लेकर कई मंचों और सोशल मीडिया पर आलोचनाएँ सामने आई हैं।
कुछ लोगों का तर्क है कि पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व ने कूटनीति में भारत को पछाड़ दिया है। यह तर्क सुनने में भले ही तीखा लगे, लेकिन सच्चाई इससे कहीं गहरी और जटिल है।
भारत आज ऐसे दौर में खड़ा है जहां उसे एक साथ अमेरिका, चीन और पाकिस्तान जैसे तीन बड़े देशों से निपटना पड़ रहा है। इस जटिल अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में संतुलन बनाए रखना, राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना और आर्थिक स्थिरता बनाए रखना – ये किसी भी देश के लिए चुनौतीपूर्ण कार्य हैं।
अमेरिका और पाकिस्तान: पुराने गठबंधन का नया विश्लेषण
अमेरिका की दोहरी नीति
इतिहास गवाह है कि अमेरिका ने अधिकतर समय पाकिस्तान का साथ दिया है।
चाहे वह 1971 का भारत-पाक युद्ध रहा हो या कश्मीर के इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन पर अमेरिकी डिप्लोमेट रॉबिन रफाएल का विवादास्पद बयान — अमेरिका की नीति हमेशा “रणनीतिक हित” के इर्द-गिर्द घूमती रही।
अमेरिका ने पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की तस्करी, आतंकवाद को बढ़ावा और मानवाधिकार उल्लंघनों को नजरअंदाज किया।
इन सबके बावजूद, भारत ने हमेशा अपने आत्मसम्मान और स्वतंत्र नीति को बनाए रखा।
कांग्रेस काल में भारत-अमेरिका संबंध दिखावटी दोस्ती पर आधारित रहे, जबकि अंदर ही अंदर अमेरिका पाकिस्तान को “फ्रंटलाइन स्टेट” के रूप में उपयोग करता रहा। यह सबक भारत ने गहराई से सीखा — कि विदेशी प्रशंसा से ज़्यादा ज़रूरी है आत्मनिर्भरता और स्वतंत्र सोच।
पाकिस्तान की विदेश नीति: आत्मघाती लक्ष्य का खेल
पाकिस्तान की विदेश नीति दशकों से एक ही उद्देश्य पर केंद्रित रही है — “भारत को नीचा दिखाना और कश्मीर को कब्ज़े में लेना।”
लेकिन इस नीति का परिणाम क्या निकला?
आर्थिक पतन और सामाजिक अस्थिरता
1980 के दशक में पाकिस्तान की प्रति व्यक्ति आय भारत से अधिक थी।
आज विश्व बैंक के आंकड़े बताते हैं कि पाकिस्तान की प्रति व्यक्ति आय भारत की आधी रह गई है।
जहां भारत टेक्नोलॉजी, डिजिटल पेमेंट और विनिर्माण में दुनिया के शीर्ष देशों में पहुंच गया है, वहीं पाकिस्तान आर्थिक कर्ज, आतंकवाद और अस्थिर राजनीति के दलदल में फँसा हुआ है।
उसकी सेना ने सत्ता पर ऐसा कब्ज़ा किया कि वहाँ का प्रधानमंत्री एक “सजावट की वस्तु” बनकर रह गया।
कूटनीति का असली लक्ष्य आंतरिक स्थिरता होता है, लेकिन पाकिस्तान ने अपनी विदेश नीति को केवल “भारत विरोध” तक सीमित रखा। परिणामस्वरूप, उसकी आंतरिक सुरक्षा और आर्थिक व्यवस्था दोनों चरमरा गईं।
भारत की विदेश नीति: आत्मसम्मान और संतुलन का प्रतीक
डॉ. एस. जयशंकर – कूटनीति के माहिर खिलाड़ी
भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर विश्व के उन चुनिंदा नेताओं में से हैं जिनका करियर चार दशकों से अधिक समय तक कूटनीति में बीता है।
वे चीन और अमेरिका में भारत के राजदूत रह चुके हैं और उन्होंने भारत की विदेश नीति को “संतुलन और आत्मसम्मान” के दो स्तंभों पर खड़ा किया है।
डॉ. जयशंकर का यह मानना है कि —
“भारत की विदेश नीति किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों के पक्ष में है।”
उनकी कूटनीतिक रणनीति में भावनाओं की जगह यथार्थ और दीर्घकालिक सोच को प्राथमिकता दी जाती है।
अनुभव से बनी टीम
भारत के विदेश सचिव विक्रम मिश्री, जिन्होंने चीन में राजदूत के रूप में कार्य किया, और तीन वर्षों तक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल के अधीन उप-सलाहकार रहे। यह दिखाता है कि भारत की वर्तमान विदेश नीति सिर्फ राजनीतिक बयानबाज़ी पर नहीं, बल्कि व्यवहारिक अनुभव पर आधारित है।
अमेरिकी दबाव और भारतीय जवाब
हाल ही में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जैसे नेताओं ने भारत पर आर्थिक और सामरिक दबाव बढ़ाने की कोशिश की।
लेकिन भारत ने संयम और संतुलन से जवाब दिया।
सोचिए अगर भारत अमेरिका को खुश करने के लिए
• रूस से तेल खरीदना बंद कर दे,
• BRICS छोड़ दे,
• UPI को बंद कर दे,
• या कश्मीर पर अमेरिकी मध्यस्थता स्वीकार कर ले,
तो क्या भारत की स्वतंत्र विदेश नीति बची रह पाएगी?
भारत ने इन सभी दबावों का सामना करते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि वह किसी के अधीन नहीं, बल्कि साझेदारी के आधार पर वैश्विक राजनीति में भाग लेता है।
यूरोप का अनुभव: तुष्टिकरण की राजनीति की कीमत
ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों ने दशकों तक अमेरिका की हर बात मानी। परिणामस्वरूप उनकी ऊर्जा नीति रूस पर निर्भर हो गई और मध्य पूर्व के संकटों का खामियाजा शरणार्थी संकट के रूप में भुगतना पड़ा।
भारत ने इन गलतियों से सबक लिया।
भारत का रुख स्पष्ट है —
“न तुष्टिकरण, न टकराव — केवल संतुलन और आत्मसम्मान।”
भारत की कूटनीतिक उपलब्धियाँ: सफलता के साक्षी
युद्ध क्षेत्रों से नागरिकों की सुरक्षित वापसी
भारत ने हाल के वर्षों में कई संकटों के दौरान अपने नागरिकों को युद्ध क्षेत्रों से सुरक्षित निकाला —
• ऑपरेशन राहत (यमन)
• ऑपरेशन गंगा (यूक्रेन)
• सीरिया और अफगानिस्तान से मानवीय मिशन
इन अभियानों ने दुनिया को दिखाया कि भारत न केवल अपने नागरिकों का ख्याल रखता है, बल्कि संकट की घड़ी में दूसरों के लिए भी उम्मीद की किरण है।
कतर से नौसैनिकों की रिहाई
कतर में मृत्यु दंड पाए 8 भारतीय नौसैनिकों को वापस लाना भारत की कूटनीति की ऐतिहासिक जीत थी।
यह विजय धमकी या दबाव से नहीं, बल्कि संवाद और समझदारी से हासिल हुई।
यही है भारत की “शांत लेकिन प्रभावी” विदेश नीति की असली ताकत।
आर्थिक स्थिरता और वैश्विक संकटों से सुरक्षा
यूक्रेन, यमन, लीबिया जैसे देशों में युद्ध और तेल संकट के बावजूद भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को स्थिर रखा।
• पेट्रोल की कीमतें नियंत्रित रहीं।
• मुद्रास्फीति दर सीमित रही।
• रुपये का मूल्य स्थिर रहा।
यह सब संभव हुआ क्योंकि भारत ने ऊर्जा स्रोतों को विविध बनाया और रूस से सस्ती कच्चे तेल की डील कर के अपने उपभोक्ताओं को राहत दी।
भारत की विदेश नीति के असली लक्ष्य
विदेश नीति का अंतिम उद्देश्य केवल “दुनिया में पहचान बनाना” नहीं, बल्कि देश के भीतर शांति, स्थिरता और समृद्धि सुनिश्चित करना है।
भारत ने इस दिशा में कई ठोस कदम उठाए हैं —
• ग्लोबल साउथ का नेतृत्व
• G20 की सफल अध्यक्षता
• BRICS और SCO में सक्रिय भूमिका
• भारत-मध्य पूर्व-यूरोप कॉरिडोर (IMEC)
• रुपये में अंतरराष्ट्रीय व्यापार और डिजिटल डिप्लोमेसी
इन पहलों ने भारत को एक “नीति निर्माता” से बढ़ाकर “नीति निर्धारक शक्ति” बना दिया है।
कूटनीति पर आलोचना: समझ की कमी या राजनीतिक दृष्टि?
भारत की विदेश नीति की आलोचना अक्सर दो कारणों से होती है —
1. राजनीतिक पूर्वाग्रह
2. कूटनीतिक गहराई की समझ का अभाव
कूटनीति कोई तात्कालिक परिणाम देने वाली नीति नहीं होती। यह एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है जिसमें धैर्य और रणनीति की आवश्यकता होती है।
भारत की नीतियों के परिणाम धीरे-धीरे लेकिन स्थायी रूप से सामने आएंगे। यही विदेश नीति की असली सफलता होती है।
निष्कर्ष: आत्मनिर्भर विदेश नीति ही भारत की ताकत
भारत की विदेश नीति आज उस मुकाम पर है जहाँ वह किसी भी देश के इशारों पर नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर निर्णय लेता है।
यह वही नीति है जिसने भारत को
• अंतरराष्ट्रीय संकटों में स्थिर रखा,
• आर्थिक रूप से सुरक्षित बनाया,
• और सामरिक दृष्टि से स्वावलंबी बनाया।
जो राष्ट्र आत्मसम्मान नहीं बेचता,
वही दीर्घकाल में सच्चा विश्व नेता बनता है।
भारत की विदेश नीति आज इसी विचार पर खड़ी है… संतुलित, आत्मविश्वासी और दीर्घदृष्टि से परिपूर्ण।
