भारत की विदेश नीति: डोवाल-जयशंकर युग का स्वर्णिम दौर

भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल की उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीर, जो भारत की विदेश नीति की मजबूती और रणनीतिक स्वायत्तता का प्रतीक है।

प्रस्तावना: विदेश नीति पर उठते सवाल और सच्चाई

भारत की विदेश नीति पर अक्सर बहस छिड़ जाती है। कुछ लोग कहते हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल या विदेश मंत्री एस. जयशंकर अपना काम सही तरीके से नहीं कर रहे। लेकिन ऐसा मानने वालों को शायद यह पता ही नहीं कि भारत ने कितनी लंबी यात्रा तय की है। वह दौर जब विदेश सचिव और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का चयन वॉशिंगटन डीसी से होता था, अब पीछे छूट चुका है।

आज भारत की विदेश नीति को असफल कहना न केवल गलत है बल्कि ऐतिहासिक तथ्यों को नजरअंदाज करना भी है।

2014 के बाद की विदेश नीति: दबावों के बीच रणनीतिक स्वायत्तता

2014 के बाद से भारत की विदेश नीति ने स्पष्ट रूप से यह दिखा दिया कि राष्ट्रीय हित और रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) किसी भी वैश्विक दबाव से ऊपर हैं।

• अमेरिका (विशेषकर ट्रंप प्रशासन) ने भारत पर दबाव बनाया कि वह रूस से तेल न खरीदे। लेकिन भारत ने अपने आर्थिक हितों को ध्यान में रखते हुए तेल खरीदा।

• चीन चाहता था कि भारत ताइवान से दूरी बनाए। इसके बावजूद भारत ने ताइवान के साथ रिश्ते बनाए रखे।

• अगर भारत इन दबावों में आकर झुक जाता, तभी कहा जा सकता था कि विदेश नीति असफल है।

शीत युद्ध का दौर: जब पाकिस्तान था अमेरिका का लाड़ला

1960 से 1980 के दशक के बीच भारत और पाकिस्तान दोनों ही अमेरिकी राजधानी वॉशिंगटन में डिप्लोमैटिक उपस्थिति रखते थे। लेकिन अमेरिका का झुकाव साफ तौर पर पाकिस्तान की ओर था।

पाकिस्तान की रणनीतिक किराएदारी

• पाकिस्तान ने अमेरिका को SEATO और CENTO जैसे सैन्य गठबंधनों में शामिल होकर सोवियत संघ के खिलाफ एक “फ़ॉरवर्ड बेस” ऑफर किया।

• बदले में उसे अमेरिकी प्रशासन और व्हाइट हाउस तक सीधी पहुंच मिली।

भारत की मुश्किलें

• भारतीय डिप्लोमैट्स को अमेरिकी अधिकारियों से मिलने के लिए महीनों इंतजार करना पड़ता था।

• कभी अचानक कॉल आ जाती तो भारतीय राजनयिक “सूट और मोज़े भागते-भागते पहनकर” दौड़ पड़ते थे ताकि मीटिंग का मौका न छूटे।

• गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement) के कारण अमेरिका भारत को “रिलक्टेंट पार्टनर” और “ट्रबलसम डेमोक्रेसी” कहता था।

भारत की विदेश नीति का बदलाव: 1998 के बाद का दौर

1998 के परमाणु परीक्षणों ने दुनिया को भारत की संप्रभुता का संदेश दिया। इसके बाद 2000 के दशक में IT सेक्टर, रक्षा सहयोग और आर्थिक साझेदारी के जरिए भारत ने अमेरिका के साथ अपने रिश्तों को नए मुकाम पर पहुँचाया।

नए रिश्तों की शुरुआत

• परमाणु समझौते और टेक्नोलॉजी सहयोग ने भारत को एक नए वैश्विक साझेदार के रूप में स्थापित किया।

• चीन के बढ़ते प्रभाव और पाकिस्तान की घटती उपयोगिता ने अमेरिका को भी भारत की अहमियत का एहसास कराया।

आज का भारत: दबाव नहीं, साझेदारी

आज भारत उस स्थिति में है जहाँ वह किसी भी महाशक्ति का पिछलग्गू नहीं बल्कि एक रणनीतिक साझेदार है।

रूस से ऊर्जा सहयोग: भारत ने अमेरिका की नाराजगी झेली लेकिन सस्ती ऊर्जा सुनिश्चित की।

चीन से टकराव: सीमा विवादों के बावजूद भारत ने अपनी नीति स्पष्ट रखी।

अमेरिका से सहयोग: रक्षा और तकनीकी साझेदारी के बावजूद भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर कायम है।

आलोचना क्यों होती है?

भारत की विदेश नीति की आलोचना करने वाले अक्सर केवल तत्कालीन घटनाओं को देखकर निष्कर्ष निकालते हैं। उन्हें यह समझना होगा कि:

• विदेश नीति का मूल्यांकन दशकों के संदर्भ में करना पड़ता है।

• हर निर्णय तत्काल प्रभाव के बजाय दीर्घकालिक रणनीतिक हितों को ध्यान में रखकर लिया जाता है।

निष्कर्ष: भारत की विदेश नीति का स्वर्णिम युग

आज भारत की विदेश नीति न केवल स्थिर है बल्कि रणनीतिक स्वायत्तता की सबसे सशक्त मिसाल है। 1960–80 के दशक का वह दौर जब वॉशिंगटन में भारतीय डिप्लोमैट्स को “वेटिंग लिस्ट” में रहना पड़ता था, बीत चुका है। अब भारत न तो किसी दबाव में झुकता है और न ही अपनी नीतियों से समझौता करता है।

यही कारण है कि इसे भारत की विदेश नीति का स्वर्णिम युग कहा जा सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1. भारत की विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता का क्या मतलब है?

रणनीतिक स्वायत्तता का मतलब है कि भारत अपनी विदेश नीति केवल अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर तय करता है, न कि किसी अन्य देश के दबाव में।

Q2. क्या भारत रूस से तेल खरीदने पर अमेरिका के दबाव में झुका?

नहीं, भारत ने अमेरिका के दबाव को नजरअंदाज करते हुए अपने हित में रूस से तेल खरीदना जारी रखा।

Q3. शीत युद्ध के दौर में अमेरिका भारत को कैसे देखता था?

शीत युद्ध के समय अमेरिका भारत को “ट्रबलसम डेमोक्रेसी” यानी मुश्किल लोकतंत्र मानता था और पाकिस्तान को प्राथमिकता देता था।

Q4. आज भारत-अमेरिका संबंधों की क्या स्थिति है?

आज भारत-अमेरिका संबंध रक्षा, तकनीकी और आर्थिक सहयोग में मजबूत हैं, लेकिन भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर कायम है।

Q5. क्या यह सच है कि पहले भारत की विदेश नीति वॉशिंगटन से तय होती थी?

हाँ, एक दौर में वॉशिंगटन का भारत की विदेश नीति पर गहरा प्रभाव था, लेकिन अब भारत स्वतंत्र और आत्मनिर्भर कूटनीति अपनाता है।

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