प्रस्तावना: क्यों चर्चा में है ORF और अम्बानी?
हाल के वर्षों में जब भी भारत की विदेश नीति, ऊर्जा सुरक्षा या अमेरिकी दबाव की बात होती है, तब एक नाम लगातार चर्चा में आता है—ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF)। यह थिंक टैंक न सिर्फ़ नीतिगत बहसों में प्रभावी भूमिका निभाता है, बल्कि इसके पीछे देश के सबसे बड़े कारोबारी घराने अम्बानी परिवार का हाथ भी माना जाता है।
कहा जाता है कि शुरुआत में ORF को धीरूभाई अंबानी ने खड़ा किया था। बाद में इसमें अमेरिकी एजेंसियों जैसे USAID और अन्य विदेशी फंडिंग का भी योगदान जुड़ा, लेकिन शुरुआती दौर में इसकी लगभग 90% फंडिंग रिलायंस समूह से आती थी। सवाल यह उठता है कि आखिर क्यों अंबानी परिवार को विदेश नीति और थिंक टैंक जैसे विषयों में इतनी दिलचस्पी रही है? इसका उत्तर हमें भारत की ऑयल लॉबी और पेट्रोडॉलर की राजनीति में मिलता है।
धीरूभाई और पेट्रोडॉलर: 1970 के दशक का खेल
1970 के दशक में जब दुनिया में पेट्रोडॉलर सिस्टम अस्तित्व में आया, तब हर उस कारोबारी को डॉलर की व्यवस्था के अनुरूप ढलना पड़ा जो तेल के कारोबार में था। धीरूभाई अंबानी ने भी यही किया।
• उस समय रिलायंस भारत की सबसे बड़ी निजी तेल कंपनी के रूप में उभरी।
• डॉलर से जुड़ाव के बिना तेल कारोबार संभव ही नहीं था।
• अमेरिका और सऊदी अरब की साझेदारी ने दुनिया को डॉलर आधारित ऊर्जा व्यापार में बांध दिया।
यानी शुरुआत से ही अंबानी समूह का हित इस बात से जुड़ा रहा कि पेट्रोडॉलर प्रणाली कायम रहे।
मुकेश अंबानी और Aramco: साझेदारी की राजनीति
2019 में मुकेश अंबानी ने सऊदी अरामको के साथ एक बड़ी डील की कोशिश की। अरामको दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी है और इसके मालिक सऊदी शेख हैं। यह दिखाता है कि रिलायंस ने हमेशा से तेल कारोबार में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए सऊदी-अमेरिकी गठजोड़ के साथ कदम मिलाने की कोशिश की है।
लेकिन 2024 में हालात बदल गए। सऊदी अरब ने पेट्रोडॉलर की 50 साल पुरानी व्यवस्था को आगे बढ़ाने से मना कर दिया। यह कदम वैश्विक राजनीति में भूचाल लाने वाला था।
रिलायंस का बदलाव: तेल से डिजिटल और फाइनेंशियल की ओर
अंबानी समूह ने बहुत पहले ही समझ लिया था कि तेल कारोबार हमेशा सुरक्षित नहीं रहेगा।
• 2021 के अंत तक, रिलायंस ने जियो को अलग कर दिया और नए बिजनेस मॉडल पर शिफ्ट करना शुरू किया।
• 2023 से, आधिकारिक रूप से जियो फाइनेंशियल सर्विसेज़ रिलायंस की नई सब्सिडियरी के रूप में सामने आई।
• मनोरंजन में डिज़्नी, वित्त में ब्लैकरॉक, मीडिया में CNN, और डिजिटल सेवाओं में गूगल-फेसबुक जैसे विदेशी पार्टनर चुने गए।
यानी तेल के साथ-साथ रिलायंस ने विदेशी साझेदारों को अपने नए बिजनेस मॉडल में जगह देकर भविष्य की तैयारी शुरू कर दी।
ORF और अमेरिकी लॉबी का रोल
यहाँ पर ORF की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
• अतीत में ORF ने डॉलर लॉबी को मजबूती देने का काम किया।
• आज जब भारत डीडॉलराइजेशन की दिशा में बढ़ रहा है और ब्रिक्स जैसे मंचों पर डॉलर के विकल्प की बात कर रहा है, तब ORF पर आरोप लगते हैं कि यह अभी भी अमेरिकी हितों के पक्ष में लॉबी करता है।
• आलोचक कहते हैं कि यह सीधे-सीधे रिलायंस के हितों की रक्षा है क्योंकि कंपनी को अपने भविष्य के बिजनेस के लिए अमेरिकी “सपोर्ट” चाहिए।
रूस, तेल और भारत: आधा सच और पूरा सच
कुछ लोग कहते हैं कि अंबानी ने रूस से सस्ता तेल खरीदकर बड़ा फायदा उठाया। लेकिन यह कहानी अधूरी है।
• अमेरिका ने खुद भारत को इजाज़त दी थी कि वह रूस से तेल खरीदे और उसे रिफाइन करके यूरोप को सप्लाई करे।
• इसका फायदा अमेरिका और यूरोप को भी हुआ क्योंकि वे सीधे रूस से तेल नहीं खरीद रहे थे, लेकिन भारत के जरिए उनकी ज़रूरत पूरी हो रही थी।
• इसी दौरान भारत सरकार ने इस पर विंडफॉल टैक्स लगाया ताकि घरेलू उपभोक्ता प्रभावित न हों।
अब जब अमेरिका खुद ज्यादा तेल बेचने की कोशिश कर रहा है (“ड्रिल बेबी ड्रिल”), तो उसे भारत और रूस की साझेदारी खटक रही है।
अंबानी और अमेरिकी दबाव: समझौता या मजबूरी?
रिलायंस जानता है कि तेल का युग सीमित है। अगले 10–15 सालों में वैकल्पिक ऊर्जा की ओर शिफ्ट होना ही होगा।
• अडानी पहले से इस क्षेत्र में बड़ा खिलाड़ी है।
• रिलायंस भी इस दिशा में कदम बढ़ा रहा है, लेकिन उसे अमेरिकी सहयोग की जरूरत है।
• इसलिए ORF जैसे मंचों से अमेरिकी हितों की पैरवी करना उसके बिजनेस मॉडल के लिए रणनीतिक हो सकता है।
अमेरिकी थिंक टैंक और भारतीय राजनीति
एक और पहलू यह है कि अमेरिकी थिंक टैंक अक्सर भारत की राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं।
• जब अमेरिका “इंडियन ऑयल लॉबी” को लेकर बयान देता है, तो इसका असर भारतीय राजनीति में विपक्ष और सरकार के बीच झगड़े के रूप में दिखता है।
• विपक्ष इसे सरकार पर “अंबानी-अडानी के लिए काम करने” का आरोप लगाकर भुनाता है।
• इस तरह ORF जैसे संस्थान न केवल विदेश नीति बल्कि घरेलू राजनीतिक नैरेटिव को भी प्रभावित करते हैं।
निष्कर्ष: ORF, अंबानी और भारत का भविष्य
आज ORF, रिलायंस और अमेरिकी लॉबी के रिश्ते केवल बिजनेस या थिंक टैंक तक सीमित नहीं हैं। यह सवाल भारत की आर्थिक स्वतंत्रता, ऊर्जा सुरक्षा और विदेशी दबावों से भी जुड़ा है।
• धीरूभाई अंबानी ने पेट्रोडॉलर युग में रिलायंस को खड़ा किया।
• मुकेश अंबानी ने इसे डिजिटल और फाइनेंशियल सेक्टर में बदलना शुरू किया।
• ORF इस पूरे सफर का एक “नीतिगत चेहरा” रहा है।
भारत के लिए चुनौती यह है कि वह डीडॉलराइजेशन की वैश्विक पहल और अपने कारोबारी हितों के बीच संतुलन बनाए।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
Q1. ORF क्या है और किसने इसे स्थापित किया?
ORF (ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन) एक भारतीय थिंक टैंक है, जिसकी नींव धीरूभाई अंबानी ने रखी थी। बाद में इसमें विदेशी फंडिंग भी जुड़ी।
Q2. रिलायंस ने तेल से डिजिटल बिजनेस की ओर क्यों रुख किया?
तेल कारोबार भविष्य में अस्थिर हो सकता है, इसलिए रिलायंस ने डिजिटल, फाइनेंशियल और मनोरंजन सेक्टर में विदेशी साझेदारों के साथ निवेश बढ़ाया।
Q3. क्या ORF अमेरिकी हितों के लिए लॉबी करता है?
आलोचकों का मानना है कि ORF अमेरिकी डॉलर हेजेमनी को बचाने के लिए लॉबी करता है। हालांकि, इसे रिलायंस के बिजनेस हितों की सुरक्षा भी कहा जा सकता है।
Q4. भारत रूस से तेल क्यों खरीदता रहा है?
भारत ने रूस से तेल इसलिए खरीदा क्योंकि यह सस्ता था और अमेरिका ने अप्रत्यक्ष रूप से इसकी इजाज़त दी थी ताकि यूरोप को रिफाइन किया तेल मिल सके।
Q5. रिलायंस और अडानी में क्या फर्क है?
अडानी ने वैकल्पिक ऊर्जा क्षेत्र में पहले से बड़ा निवेश किया है, जबकि रिलायंस अभी तेल से हटकर धीरे-धीरे डिजिटल और नई ऊर्जा की ओर शिफ्ट हो रहा है।
