भारत को चाहिए स्वदेशी दृष्टिकोण, न कि पश्चिमी पैमाने

एक भारतीय पुरुष सफेद कुर्ता पहने चिंतनशील मुद्रा में खड़ा है, उसके पीछे एक अमेरिकी जोड़ा मुस्कुराता हुआ दिखाई दे रहा है और दाईं ओर अमेरिकी झंडा लगा है।

प्रस्तावना: पश्चिमी पैमानों से क्यों नापी जाती है हमारी प्रगति?

आज की दुनिया में देशों का मूल्यांकन अक्सर पश्चिमी एजेंसियों के पैमानों से किया जाता है। जैसे कि हैप्पीनेस इंडेक्स, ग्लोबल रेटिंग्स, यूनिवर्सिटी रैंकिंग या आर्थिक आकलन। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये पैमाने हमारी असली स्थिति और सांस्कृतिक विशिष्टताओं को दर्शाते हैं?

कल्पना कीजिए – हैप्पीनेस इंडेक्स में यह मानदंड रखा गया कि “देश की कितनी आबादी ने हवाई यात्रा की है।” यानी अगर आप बैलगाड़ी में सफर कर खुश हैं, तो वह ‘खुशी’ पश्चिमी मानक पर खुशी ही नहीं मानी जाएगी। क्या यह तार्किक है?

पश्चिमी रेटिंग सिस्टम: एकतरफा दृष्टिकोण

1. शिक्षा और अव्यवहारिक मानक

हमारी यूनिवर्सिटियों का मूल्यांकन इस आधार पर होता है कि वहाँ स्विमिंग पूल या विदेशी इंफ्रास्ट्रक्चर है या नहीं।

लेकिन वास्तविकता यह है कि हमारे छात्र AI, टेक्नोलॉजी और इनोवेशन में आगे हैं। क्या यह उचित है कि उन्हें उस पश्चिमी छात्र से कम आंका जाए जो शानदार कैंपस से निकलकर नशे में डूब जाता है?

2. सांस्कृतिक और सामाजिक असमानताएँ

भारत में अब भी संयुक्त परिवार, रिश्तेदारी, त्यौहार और सामाजिक मेल-जोल को जीवन की खुशी का आधार माना जाता है।

लेकिन पश्चिम में, जहाँ व्यक्तिगत जीवन सर्वोपरि है, वहाँ इन चीज़ों की कोई अहमियत नहीं। तो फिर सवाल उठता है की “क्या पश्चिमी मॉडल से भारत को आँकना सही है?”

स्वदेशी दृष्टिकोण की जरूरत क्यों?

1. मानसिक गुलामी से मुक्ति

भारत शारीरिक रूप से स्वतंत्र है, लेकिन मानसिक रूप से अब भी पश्चिमी मानकों से बंधा हुआ है। जब तक हम अपने स्वदेशी दृष्टिकोण को प्राथमिकता नहीं देंगे, तब तक वास्तविक स्वतंत्रता अधूरी रहेगी।

2. स्वदेशी OTT और सांस्कृतिक शक्ति

आज चीनी और जापानी सिनेमा अपने OTT प्लेटफॉर्म्स पर अपनी संस्कृति का प्रचार कर रहा है। उनके शो में उनकी सभ्यता और मूल्य स्पष्ट दिखते हैं।

इसके विपरीत भारत विदेशी वेब सीरीज़ और फिल्मों पर निर्भर हो गया है, जहाँ अपशब्द, हिंसा और विकृत हास्य को “कूल” दिखाया जाता है। हमें यहाँ स्वदेशी सामग्री की ज़रूरत है, ताकि आने वाली पीढ़ी भारतीय संस्कृति से जुड़ी रहे।

समाज में पश्चिमी प्रभाव: नुकसान के पहलू

• त्यौहार मज़ाक बन चुके हैं – दिवाली, होली जैसे पर्व अब सिर्फ छुट्टियों और पिकनिक का बहाना बन रहे हैं।

• पारिवारिक रिश्तों में दूरी – छुट्टियाँ बचाने के चक्कर में लोग विवाह जैसे पारिवारिक अवसर टालने लगे हैं।

• भाषा और व्यवहार का बदलाव – बड़ों का सम्मान कम होना और अपशब्दों का प्रयोग अब फैशन माना जाने लगा है।

स्वदेशी पूंजीवाद: भारत का अपना रास्ता

भारत को न केवल संस्कृति में बल्कि अर्थव्यवस्था में भी स्वदेशी मॉडल चाहिए।

• अगर झारखंड के खनिज संसाधनों को विदेशी पूँजीपति निकालते हैं, तो यह पश्चिमी पूंजीवाद है।

• लेकिन यदि वही काम झारखंड के लोग करें और अडानी जैसे भारतीय उद्यमी उसे बाजार तक पहुँचाएँ, तो यह भारतीय पूंजीवाद कहलाएगा।

यह मॉडल समानता और आत्मनिर्भरता दोनों को बढ़ावा देता है।

धर्म और संस्कृति: असली भारतीय दृष्टिकोण

भारत की सभ्यता हमेशा से व्यापक और संतुलित रही है।

• मज़हब में स्त्रियों से पर्दा करने की शिक्षा मिलती है, लेकिन हमारे धर्म में स्त्रियाँ शस्त्र धारण करती थीं और राजदरबार में बराबरी से बैठती थीं।

• मज़हब कहता है “पराई स्त्री का स्पर्श पाप है”, जबकि हमारे शास्त्र कहते हैं परगमन (अत्याचार/अत्यधिक नियंत्रण) गलत है।

यानी हमारी परंपरा स्त्रियों को सम्मान और बराबरी देती है, जबकि पश्चिमी और मज़हबी पैमाने संकीर्ण दृष्टिकोण पेश करते हैं।

समाधान: आधुनिकता हाँ, पश्चिमवाद नहीं

हमें यह स्वीकार करना होगा कि भारत को आधुनिक तकनीक, प्रगति और खुले विचार की आवश्यकता है, लेकिन अंधी नकल नहीं।

• हमें विज्ञान चाहिए लेकिन अपनी संस्कृति के साथ।

• हमें प्रगति चाहिए लेकिन अपने मूल्यों के साथ।

• हमें आधुनिकता चाहिए, पश्चिमीकरण नहीं।

निष्कर्ष

भारत को आज सबसे अधिक आवश्यकता है कि वह अपने स्वदेशी पैमानों और मूल्यों से खुद को आंके।

पश्चिमी दृष्टिकोण हमेशा हमें अधूरा और कमतर दिखाएगा, क्योंकि उसकी तुला ही अलग है।

इसलिए हमें स्वदेशी शिक्षा, स्वदेशी OTT, स्वदेशी पूंजीवाद और स्वदेशी सांस्कृतिक मॉडल की ओर बढ़ना होगा। यही हमारी असली आज़ादी होगी।

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