भारत और पड़ोसी देशों की राजनीति: सत्ता परिवर्तन से मिले बड़े सबक

दक्षिण एशिया के नक्शे के सामने अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, भारत और श्रीलंका का प्रतिनिधित्व करते चार नेता, जो क्षेत्रीय राजनीति और सत्ता परिवर्तन को दर्शा रहे हैं।

भारत और पड़ोसी देशों में हुए सत्ता परिवर्तन से स्पष्ट है कि भारत का लोकतांत्रिक ढाँचा और फ़ेडरल स्ट्रक्चर किसी भी हिंसक बदलाव को असंभव बना देता है।

परिचय

भारत के पड़ोसी देशों (अफ़ग़ानिस्तान, मालदीव, श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल) में हाल के वर्षों में सत्ता परिवर्तन और राजनीतिक अस्थिरता ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। इन घटनाओं के केंद्र में कहीं आतंकवाद है, कहीं चीन का प्रभाव, तो कहीं आंतरिक असंतोष। दिलचस्प बात यह है कि इन परिस्थितियों में भारत ने अधिकतर मामलों में धैर्य, संतुलन और रणनीतिक सूझबूझ का परिचय दिया। यही कारण है कि भारत न केवल अपने लिए, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के लिए स्थिरता का स्तंभ बनकर खड़ा है।

अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान: आतंकवाद का उल्टा असर

जब अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की सत्ता आई तो पाकिस्तान ने ख़ुशी मनाई। उसे लगा कि वह भारत में आतंकवाद को और बढ़ा सकेगा। लेकिन समय ने करवट ली और तालिबान ने पाकिस्तान के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया।

भारत ने इस दौरान कोई उग्र प्रतिक्रिया नहीं दी। वह शांति से अपने काम में जुटा रहा। नतीजा यह हुआ कि आज तालिबान की गतिविधियाँ पाकिस्तान के लिए ही सिरदर्द बन चुकी हैं। यह घटना बताती है कि कभी-कभी शांत रहना ही सबसे बड़ा हथियार होता है।

मालदीव: “इंडिया आउट” से “इंडिया इज़ बैक” तक

मालदीव में मोहम्मद मोइज़्ज़ू की सरकार आने के बाद “इंडिया आउट” का नारा बुलंद हुआ। वह लगातार चीन का रुख करते रहे। भारत ने इसका सीधा जवाब देने के बजाय रणनीतिक तरीके से प्रतिक्रिया दी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने लक्षद्वीप में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई, जिससे मालदीव को संदेश गया कि भारत के पास भी विकल्प मौजूद हैं।

दो महीने के भीतर ही स्थिति बदल गई। “इंडिया आउट” का नारा गायब हो गया और मोइज़्ज़ू ने मान लिया कि भारत के बिना मालदीव नहीं चल सकता।

श्रीलंका: चीन की रणनीति और भारत की धैर्यपूर्ण भूमिका

श्रीलंका में चीन ने भारी निवेश किया। ऑर्गेनिक खेती की ज़िद और कर्ज़ के बोझ ने देश को तबाह कर दिया। हालात इतने बिगड़े कि लोग राष्ट्रपति भवन में घुस गए और राष्ट्रपति को देश छोड़ना पड़ा।

भारत ने इस संकट में मददगार की भूमिका निभाई। उसने श्रीलंका को आर्थिक संकट से बाहर निकालने में सहयोग किया। नई सरकार बनने के बाद भारत-श्रीलंका संबंध पहले से मजबूत हुए।

यह दर्शाता है कि भारत केवल रणनीतिक ही नहीं, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से भी काम करता है।

बांग्लादेश: आंदोलन, हिंसा और सत्ता परिवर्तन

शेख हसीना की सरकार आरक्षण विवाद के कारण आंदोलन का शिकार हुई। गोलीकांड ने आग में घी डालने का काम किया।

नतीजतन, शेख हसीना को देश छोड़ना पड़ा और हिंदू समुदाय पर हमले शुरू हो गए।

भारत ने इस बार सख़्ती दिखाई और निर्यात को प्रभावित कर दबाव बनाया। इसका असर यह हुआ कि बांग्लादेश की सेना को संवाद शुरू करना पड़ा। आने वाले चुनावों के बाद वहाँ की स्थिति बदलने की संभावना है।

नेपाल: कम्युनिस्ट प्रयोग की असफलता

नेपाल में कम्युनिस्ट शासन ने रोजगार और राजनीति दोनों को खोखला कर दिया। मीडिया भी पूरी तरह प्रभावित हुआ और हिंदू सांस्कृतिक मूल्यों पर प्रहार शुरू हो गए।

स्थिति और बिगड़ी जब सरकार ने सोशल मीडिया पर बैन लगाने की कोशिश की। साथ ही चीन की शह पर भारत विरोधी रुख अपनाया।

अंततः यह मॉडल असफल हो गया। अब जो भी सरकार बनेगी, उसे समझना होगा कि भारत से रिश्ते खराब करने का अर्थ है आत्मघात।

भारत का लोकतांत्रिक मॉडल क्यों अलग है?

1. फ़ेडरल स्ट्रक्चर

भारत में केवल केंद्र सरकार ही सर्वशक्तिमान नहीं है। राज्यों के पास शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और कानून-व्यवस्था जैसे कई अधिकार हैं।

तमिलनाडु, बिहार, कश्मीर, नागालैंड या गुजरात सभी की राजनीति अलग-अलग है। इसका अर्थ है कि कोई एक मुद्दा पूरे देश को हिंसा में नहीं झोंक सकता।

2. विविधता में एकता

भारत में न तो एक ही भाषा है, न एक ही बोली और न ही एक ही मुद्दा। यही विविधता उसे अतिरिक्त सुरक्षा देती है।

3. कम्युनिस्ट विचारधारा का अस्वीकार

भारत में आम जनता कम्युनिस्ट विचारधारा को लंबे समय से अस्वीकार करती आई है। केवल कुछ गुट या व्यक्ति ही इसे उठाने की कोशिश करते हैं, परंतु जनसमर्थन नहीं मिलता।

4. लोकतंत्र की ताक़त

भारत में लोग सड़कों पर सरकार की आलोचना करते हैं, सोशल मीडिया पर विरोध करते हैं और मीडिया हर रोज़ सत्ता को चुनौती देता है।

लेकिन अंततः जनता हिंसा से नहीं, बैलेट से बदलाव करती है।

हिंसक प्रयासों पर जनता का बैलेट से जवाब

भारत में भी हिंसक प्रयासों की झलक देखने को मिली।

• गणतंत्र दिवस पर ट्रैक्टर लेकर लालकिले पर चढ़ने वाले

• खालिस्तानी झंडा फहराने की कोशिश करने वाले

• महीनों तक सड़कें घेरकर बैठने वाले

• हिंसक घटनाओं में निर्दोषों की हत्या करने वाले

इन सभी हालात में सरकार ने गोली नहीं चलाई, बल्कि धैर्य दिखाया। इसका नतीजा यह हुआ कि आम जनता ने चुनाव में इन ताक़तों को नकार दिया।

निष्कर्ष

भारत और उसके पड़ोसी देशों की राजनीतिक यात्रा हमें एक बड़ा सबक देती है। जहाँ पड़ोसी देश बार-बार सत्ता परिवर्तन और अस्थिरता का शिकार होते हैं, वहीं भारत का लोकतांत्रिक ढाँचा और विविधता उसे मजबूत बनाए रखता है।

भारत में हिंसक सत्ता परिवर्तन की कल्पना करना मुश्किल है, क्योंकि यहाँ जनता किसी भी बदलाव के लिए हथियार नहीं, बैलेट बॉक्स पर भरोसा करती है।

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