फाइव स्टार थ्योरी: मोदी सरकार की रणनीति और असफल आंदोलन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गहन विचार में बैठे हैं, पृष्ठभूमि में विरोध प्रदर्शनों और पुलिस टकराव के दृश्य दिखाई दे रहे हैं।

परिचय

भारत की राजनीति में रणनीति और धैर्य हमेशा निर्णायक भूमिका निभाते हैं। टीवी पर आने वाला फाइव स्टार चॉकलेट का विज्ञापन “कभी कुछ न करके भी देखो” आज की भारतीय राजनीति के लिए गहरा प्रतीक बन चुका है। जिस तरह विज्ञापन में लड़का बुज़ुर्ग महिला की मदद नहीं करता और अनजाने में उसकी जान बचा लेता है, उसी तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कई विवादास्पद आंदोलनों के दौरान कुछ न करके ही विपक्ष की चालों को नाकाम किया।

इस लेख में हम समझेंगे कि कैसे मोदी सरकार ने CAA आंदोलन, किसान आंदोलन और खालिस्तान समर्थित गतिविधियों को बिना लाठी-डंडे और गोली के काबू में किया और क्यों राहुल गांधी एंड कंपनी की रणनीतियाँ लगातार असफल होती रहीं।

फाइव स्टार थ्योरी और राजनीति

फाइव स्टार थ्योरी का सार यही है कि कभी-कभी राजनीति में प्रतिक्रिया न देना ही सबसे बड़ी प्रतिक्रिया होती है।

• विपक्ष चाहता है कि सरकार हिंसा करे, ताकि आंदोलन से नए नेता और दल पैदा हो सकें।

• लेकिन जब सरकार हिंसा नहीं करती और बस “देखती” रहती है, तो आंदोलन अपने आप कमजोर पड़ने लगता है।

CAA आंदोलन और सरकार की रणनीति

नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के विरोध में दिल्ली और अन्य राज्यों में महीनों तक धरना-प्रदर्शन चला।

• शाहीन बाग़ आंदोलन से लेकर जेएनयू और जामिया तक सड़कों पर भीड़ जुटाई गई।

• विदेशी मीडिया और “कामरेड गैंग” ने इसे बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश की।

• लेकिन सरकार ने कठोर बल प्रयोग से परहेज़ किया।

नतीजा

• आंदोलन धीरे-धीरे थक गया।

• कोरोना महामारी आने के बाद धरनाजीवी खुद बिखर गए।

• विदेशी फंडिंग पर कार्रवाई हुई और आंदोलन अपने आप खत्म हो गया।

किसान आंदोलन: टिकैत से खालिस्तानी एजेंडे तक

मोदी सरकार के लाए गए कृषि कानूनों का विरोध शुरू हुआ तो विपक्ष को एक और मौका मिला।

• महेंद्र सिंह टिकैत जैसे नेताओं ने जीवनभर जिन कानूनों की माँग की थी, वही कानून लाए गए थे।

• लेकिन कुछ खालिस्तानी समर्थकों और हरियाणा-पंजाब की राजनीति ने इसे अपने फायदे का आंदोलन बना दिया।

• दिल्ली बॉर्डर पर महीनों तक पिज़्ज़ा-पकौड़े और डीजे के साथ धरना चलता रहा।

घटनाक्रम

• लाल किले पर हिंसा, पुलिसकर्मियों पर हमले और महिलाओं के साथ अपराध की ख़बरें आईं।

• लेकिन सरकार ने हिंसक कार्रवाई से बचते हुए, धैर्यपूर्वक सिर्फ़ फंडिंग और साज़िश का पर्दाफ़ाश किया।

नतीजा

• समाज ने आंदोलन को “गुंडई” मान लिया।

• हरियाणा में भाजपा को सत्ता में वापसी मिली।

• आंदोलन थक कर खत्म हो गया।

खालिस्तान आंदोलन और विदेशी फंडिंग

खालिस्तान समर्थकों ने कनाडा और अमेरिका से लगातार फंडिंग पाई।

• पंजाब और विदेशों में मंदिरों पर हमले, हत्याएँ और बेअदबी के मामले सामने आए।

• प्रधानमंत्री के काफ़िले तक को घेरने की कोशिश हुई।

लेकिन केंद्र सरकार ने सीधी टक्कर लेने से परहेज़ किया।

• धीरे-धीरे जनता ने खालिस्तानियों की गुंडागर्दी पहचान ली।

• आंदोलन अपने चरम पर जाकर खुद ढह गया।

राजनीति में धैर्य की अहमियत

किसी भी आंदोलन का सबसे बड़ा उद्देश्य होता है नए नेता और नई राजनीतिक पार्टी को जन्म देना।

• जब सरकार हिंसा करती है, तो आंदोलन से “वीर” और “नेता” पैदा होते हैं।

• लेकिन जब सरकार चुप रहती है, तो आंदोलन कमजोर होकर अपने आप खत्म हो जाता है।

मोदी सरकार की यही रणनीति विपक्ष के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।

राहुल गांधी की रणनीति और असफलता

राहुल गांधी एंड कंपनी बार-बार आंदोलन खड़ा करने की कोशिश करती रही है।

• कभी CAA, कभी किसान आंदोलन, अब मतदाता सूची सुधार पर विवाद।

• लेकिन वे यह नहीं समझ पा रहे कि मोदी “फाइव स्टार रणनीति” से खेल रहे हैं।

तुलना

• बांग्लादेश की शेख हसीना ने आंदोलनकारियों को हिंसक तरीके से जवाब दिया और सत्ता गंवा दी।

• मोदी ने धैर्य दिखाया और विपक्षी रणनीतियों को विफल किया।

निष्कर्ष

भारतीय राजनीति में धैर्य एक ऐसी ताकत है, जो विरोधियों को खुद ही हरा देती है।

मोदी सरकार की फाइव स्टार रणनीति यानी “कुछ न करना” ने साबित किया है कि कभी-कभी चुप रहना सबसे बड़ा हथियार होता है।

राहुल गांधी और विपक्ष को यह समझना होगा कि जनता अब नौटंकी नहीं, बल्कि स्थिर और रणनीतिक नेतृत्व चाहती है।

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