प्रस्तावना: जब क्रिकेट पर छा गई राजनीति
क्रिकेट को हमेशा से जेंटलमैन गेम कहा जाता है, लेकिन भारत और पाकिस्तान के बीच जब-जब मुकाबला हुआ है, वह महज़ खेल नहीं रहा। वह राजनीति, भावनाओं और राष्ट्रवाद का आईना बन गया है। साल 1999 में मुंबई के वानखेडे स्टेडियम में घटी एक घटना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इस घटना ने न केवल भारत–पाक क्रिकेट को झकझोर दिया बल्कि दुनिया भर में यह सुर्खियों का हिस्सा बनी।
वानखेडे स्टेडियम का ऐतिहासिक मैच और रात की हलचल
1999 में पाकिस्तान की टीम भारत दौरे पर आने वाली थी। टेस्ट सीरीज़ का एक अहम मैच मुंबई के वानखेडे स्टेडियम में होना तय था। लेकिन मैच से कुछ ही दिन पहले रात के अंधेरे में एक ऐसी घटना घटी जिसने सबको हैरान कर दिया।
रिपोर्ट्स के अनुसार, शिवसेना कार्यकर्ता स्टेडियम में घुस आए। उनके हाथों में फावड़े, हथौड़े और लोहे की रॉड थीं। उनका सीधा निशाना पिच था। देखते ही देखते उन्होंने पिच पर गहरे गड्ढे खोद दिए और घास उखाड़ फेंकी। सुबह जब अधिकारी स्टेडियम पहुँचे, तो 22 गज का यह ट्रैक पूरी तरह बर्बाद नज़र आया।
शिवसेना का तर्क: “सीमा पर जंग और मैदान पर दोस्ती नहीं”
शिवसेना ने खुले तौर पर इस घटना की जिम्मेदारी ली और उसका स्पष्ट तर्क सामने रखा। उनका कहना था कि जब देश की सीमाओं पर गोलीबारी हो रही है और भारतीय जवान शहीद हो रहे हैं, तो पाकिस्तान के साथ क्रिकेट खेलना राष्ट्र का अपमान है।
शिवसेना नेताओं का नारा था – “सीमा पर जंग और मैदान पर दोस्ती, दोनों साथ नहीं चल सकते।” उनका मानना था कि क्रिकेट जैसी खेल भावना के लिए यह सही समय नहीं है और पाकिस्तान के साथ किसी भी तरह के खेल संबंध स्वीकार्य नहीं हैं।
बीसीसीआई और मुंबई पुलिस की परेशानी
इस घटना ने बीसीसीआई और मुंबई पुलिस दोनों को हक्का-बक्का कर दिया। अधिकारियों ने तुरंत पिच की मरम्मत शुरू की, लेकिन गड्ढों और क्षतिग्रस्त सतह को देखकर साफ हो गया कि इतने कम समय में पिच को खेलने योग्य बनाना असंभव है।
आखिरकार, बीसीसीआई को मजबूरन यह टेस्ट मैच मुंबई से शिफ्ट करना पड़ा। यह फैसला दर्शाता है कि कैसे राजनीति और सामाजिक तनाव खेल के आयोजन को भी प्रभावित कर सकते हैं।
1991 का भी था विवादित दौर
वानखेडे पिच खोदने की घटना पहली बार नहीं थी। इससे पहले भी 1991 में पाकिस्तान टीम के भारत दौरे पर विवाद हुआ था।
उस समय शिवसैनिकों ने केवल विरोध ही नहीं किया, बल्कि यह धमकी भी दी कि अगर पाकिस्तान टीम के साथ मैच हुआ तो वे मैदान में जहरीले सांप छोड़ देंगे। इस धमकी के बाद बीसीसीआई को पूरी सीरीज़ रद्द करनी पड़ी। इतना ही नहीं, सुरक्षा कारणों से मैदान पर सपेरे तक तैनात किए गए। यह घटना दर्शाती है कि भारत–पाक मुकाबले कितने संवेदनशील माने जाते रहे हैं।
भारत–पाक क्रिकेट पर असर
वानखेडे पिच खोदने की घटना का असर केवल उस मैच तक सीमित नहीं रहा। इसने भारत–पाक क्रिकेट संबंधों को और जटिल बना दिया।
पाकिस्तान ने इसे भारत की आंतरिक राजनीति का परिणाम बताया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस घटना की कड़ी आलोचना हुई। वहीं, भारतीय समाज में इस पर दो राय बनी—कुछ लोगों ने इसे राष्ट्रवाद का प्रतीक बताया, तो कुछ ने इसे खेल और भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि के खिलाफ कदम माना।
जनता की मिश्रित प्रतिक्रिया
यह घटना भारतीय जनता को दो हिस्सों में बाँट गई।
• समर्थन करने वाले लोगों का कहना था कि पाकिस्तान के साथ क्रिकेट खेलना जवानों की शहादत का अपमान है।
• विरोध करने वालों का मानना था कि खेल को राजनीति से जोड़ना भारत की साख को नुकसान पहुँचाने वाला कदम है।
यही कारण है कि यह बहस आज तक ज़िंदा है कि खेल को राजनीति से अलग रखा जाना चाहिए या नहीं।
वानखेडे की पहचान और यादगार “पिच खोदने वाली रात”
वानखेडे स्टेडियम भारतीय क्रिकेट की कई ऐतिहासिक यादों का हिस्सा रहा है। 2011 वर्ल्ड कप फाइनल में भारत की जीत इसी मैदान पर हुई थी। लेकिन जब भी इसका ज़िक्र होता है, 1999 की वह “पिच खोदने वाली रात” भी याद दिला दी जाती है। यह घटना केवल एक पिच खोदने की कहानी नहीं थी, बल्कि उस दौर की राजनीति, तनाव और उग्र राष्ट्रवाद का प्रतीक थी।
निष्कर्ष: खेल और राजनीति का टकराव
1999 की वानखेडे पिच खोदने की घटना हमें यह सिखाती है कि खेल और राजनीति एक-दूसरे से पूरी तरह अलग नहीं रह सकते। खासकर भारत–पाक मुकाबले केवल क्रिकेट नहीं होते, बल्कि भावनाओं, इतिहास और कूटनीति का संगम बन जाते हैं।
आज सुरक्षा इंतजाम कहीं अधिक कड़े हैं और इस तरह की घटना की संभावना कम है। फिर भी, यह घटना हमेशा याद दिलाती रहेगी कि अगर खेल को खेल की तरह देखा जाए, तो वही देशों के बीच पुल का काम कर सकता है, अन्यथा वह राजनीति की भेंट चढ़ सकता है।
