अमेरिका की कृषि नीति और भारत का साहसिक इनकार

डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिकी कृषि नीति पर भाषण देते हुए, पीछे मक्का के खेत और अनाज की बोरियों की पृष्ठभूमि में

जब व्यापार नीति बन जाए भविष्य की क्रांति की चिंगारी

21वीं सदी के इस अस्थिर विश्व में जब नेता वैश्विक मंचों पर मुस्कुरा रहे होते हैं, तब बैकग्राउंड में एक अदृश्य जंग चल रही होती है… व्यापार की जंग। और इस जंग का सबसे खतरनाक हथियार बन चुका है… कृषि।

अमेरिका, जिसकी केवल 20-25 प्रतिशत आबादी ही ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, आज अपनी कंपनियों के लिए नए कृषि बाजारों की तलाश में है। लेकिन सवाल ये है कि जिन देशों में उसकी कृषि पहुंच जाती है, वहाँ फिर किसी और की कोई जगह क्यों नहीं बचती?

अमेरिकी कृषि साम्राज्यवाद और मिलावट की संस्कृति

अमेरिका के कृषि उत्पादों में गुणवत्ता के साथ-साथ एक अनोखी मिलावट भी छुपी होती है… व्यावसायिक चालाकी की मिलावट। उदाहरण लीजिए नारियल के तेल का। जहाँ भारत में नारियल को पूजा में पवित्र माना जाता है, वहीं अमेरिका में उसे चमकदार बनाने के लिए पशु की चर्बी तक मिला दी जाती है।

यही नहीं, अमेरिका की बड़ी-बड़ी कंपनियाँ जब किसी देश की कृषि सप्लाई चेन में प्रवेश करती हैं, तो वो सिर्फ व्यापार नहीं करतीं, पूरा सिस्टम निगल जाती हैं।

ट्रम्प की नीति – राष्ट्रपति नहीं, व्यापारी की बोली

डोनाल्ड ट्रम्प की रणनीति अलग है। वे अमेरिका को व्यापार के जरिए ताकतवर बनाना चाहते हैं। चाहे इसके लिए विदेश नीति को ही ताक पर क्यों न रखना पड़े।

2024 के चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी को सबसे बड़ा समर्थन अमेरिका के ग्रामीण इलाकों से मिला। यही ट्रम्प का मूल आधार है, और अब वे उन किसानों को खुश करने के लिए दुनिया भर से अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए बाजार खोलवाना चाहते हैं।

ये कोई कूटनीतिक सौदा नहीं है यह खुला व्यापार युद्ध है।

जिन देशों ने डील की, उन्हें भुगतना पड़ेगा

आज जिन देशों ने अमेरिका से ट्रेड डील की है, उन्होंने शायद आग से खेला है। आने वाले 15-20 वर्षों में कई देशों में हालात रूसी क्रांति जैसे बन सकते हैं। क्योंकि इतिहास गवाह है… सेना, किसान और छात्र। इन तीनों को नजरअंदाज करना घातक हो सकता है।

भारत, चीन और रूस – अडिग त्रिकोण

आज भी अगर कोई देश अमेरिकी दबाव में नहीं झुका है, तो वो हैं – भारत, चीन और रूस।

• चीन में अभी कम्युनिस्ट विचारधारा का ही वर्चस्व है।

• रूस में पुतिन समर्थकों की पकड़ मजबूत है।

• और भारत में संघ परिवार की सत्ता कम से कम अगले दशक तक स्थिर नजर आ रही है।

इसका मतलब है कि ये देश जल्दी किसी वैश्विक दबाव के आगे नहीं झुकेंगे। उनके पास झुकने का विकल्प ही नहीं है।

भारत की रणनीति – सहयोग भी, स्वाभिमान भी

भारत सरकार ने अमेरिका को यह साफ संदेश दे दिया है “हम नहीं डरते।”

भारत जानता है कि उसे:

• अमेरिका की मेडिकल टेक्नोलॉजी चाहिए,

• वहाँ के एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस से ज्ञान चाहिए।

इसलिए भारत ट्रेड डील से भाग नहीं रहा, बल्कि अपने किसानों के हित सुरक्षित रखकर ही उसे आगे बढ़ा रहा है। भारत कोई अधीन राष्ट्र नहीं, एक संप्रभु शक्ति है।

15 साल बाद की दुनिया और भयावह होगी

अब सोचिए, यदि किसी देश की कृषि जनसंख्या 20% भी बची है और वो अमेरिका से समझौता कर चुका है, तो उसके भविष्य में क्या बचेगा?

1917 की रूसी क्रांति ने रूस को यूरोप से अलग कर दिया।

1979 के ईरानी बदलाव ने पूरी व्यवस्था बदल डाली।

ऐसे ही कई देश अगले दशक में राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल के शिकार होंगे।

भारत का मौका – विरोधियों का नेता बनने का समय

जब पूरी दुनिया बदलेगी, और अमेरिका के खिलाफ आवाजें उठेंगी, तब भारत को सिर्फ ग्लोबल साउथ का नेता नहीं, बल्कि विश्व नेतृत्व की भूमिका निभानी होगी।

अभी भारत जिस तरह से ट्रेड डील में बैलेंस बना रहा है, वह एक राजनीतिक चतुराई नहीं, बल्कि रणनीतिक बुद्धिमत्ता है।

निष्कर्ष – यह सिर्फ डील नहीं, भविष्य की दिशा है

कृषि आज केवल खाद्य सुरक्षा का मामला नहीं रहा, यह राजनीतिक प्रभुत्व और सत्ता संतुलन का उपकरण बन गया है।

भारत ने आज तक अमेरिकी दबाव के सामने घुटने नहीं टेके, और अगर आगे भी वो किसानों के हितों की रक्षा करता रहा, तो वह न केवल अपने भविष्य को सुरक्षित करेगा, बल्कि पूरी दुनिया में एक नेतृत्वकर्ता के रूप में उभरेगा।

अब वक्त है साहसिक निर्णय लेने का, क्योंकि दुनिया बदल रही है।

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